आरएसएस 140 देशों के प्रतिनिधियों के साथ करेगी इफ्तार पार्टी
नई दिल्ली। देश की सियासत में इस बार रमजान के माह में नयी शुरुआत हो रही। एक तरफ जहां कांग्रेस हर साल इफ्तार पार्टी का आयोजन करती थी उसने इस बार इफ्तार पार्टी नहीं करने का फैसला लिया है। जबकि आऱएसएस ने इस बार इफ्तार पार्टी की शुरुआत की है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस बार इफ्तार पार्टी नहीं करने का फैसला लिया है। इफ्तार पार्टी की बजाय इस बार कांग्रेस जरूरतमंद लोगों की मदद करेगी। ऐसे में माना जा रहा है कि कांग्रेस एक नयी पहल की शुरुआत करने जा रही है। इस वर्ष कांग्रेस की स्थित हर साल की तुलना में अलग है, कांग्रेस की सहयोगी दल टीएमसी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सबसे आगे थी लेकिन जिस तरह से टीएमसी ने कांग्रेस ने नाता तोड़ा उसने पार्टी की स्थिति को बदला है।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और टीएमसी के अलगाव के बाद कांग्रेस ने सीपीआई से गठबंधन कर लिया। माना जा रहा है कि बसपा और सपा भी कांग्रेस अध्यक्ष की इफ्तार पार्टी का हिस्सा नहीं होगे। इन दोनों ही पार्टियों ने पिछली बार की इफ्तार पार्टी में अपने वरिष्ठ नेताओं को नहीं भेजा था।
स्थानीय पार्टियां यूपी के अहम चुनाव से पहले किसी भी तरह का गलत संदेश देने से बच रही है। लोकसभा चुनाव में जिस तरह से भाजपा ने एकतरफा जींत हासिल की उसे देखते हुए बसपा और सपा काफी एहतियात बरत रही हैं। सेक्युलर दल के अगुवा के तौर पर और मोदी विरोधी दल के अग्रणी के तौर पर देखे जा रहे नीतीश कुमार भी आने वाले समय में कांग्रेस के साथ जाते नहीं दिख रहे हैं, ऐसे में कांग्रेस ने अपनी रणनीति बदलने को मजबूर हो रही है।
अब यहां जो खास बात है वह है कि आरएसएस की मुस्लिम राष्ट्रीय मंच दो जुलाई को इफ्तार पार्टी का आयोजन करेगी। आरएसएस अपनी मुस्लिम विरोध छवि से उबरने की कोशिश कर रही है। इस इफ्तार पार्टी के लिए 140 देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है जिसमें पाकिस्तान के हाई कमिश्नर भी शामिल हैं। दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों की तुलना के नजर से इस रणनीति में आरएसएस कांग्रेस की तुलना में अधिक आगे दिख रही है, जिसकी अहम वजह है कि भाजपा की मौजूदा राजनैतिक स्थिति बेहतर है।
कांग्रेस देश के सभी बड़े राज्यों को अपने हाथ से गंवा चुकी है, कर्नाटक अब एकलौता राज्य कांग्रेस के पास बचा है। लोकसभा में पार्टी की खराब स्थिति और राज्यो में बिगड़ती हालत को देखते हुए अन्य क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस से दूरी बना रही हैं। ऐसे में 2002 के गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी के लिए यह बड़ा मौका है जब वह मुस्लिमों के प्रति अपनी छवि को सुधार सकते हैं।












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