Congress National Convention: 64 साल बाद गुजरात की याद, इस अधिवेशन से कांग्रेस को कितना फायदा? क्या है रणनीति?
Congress National Convention: साल 1961 में जब कांग्रेस ने गुजरात के भावनगर में अपना आखिरी राष्ट्रीय अधिवेशन किया था तब पार्टी हिंदुस्तान की सियासत की राजनीतिक धुरी थी। जब 64 साल बाद उसी गुजरात में एक बार फिर से 8 अप्रैल 2025 को दो दिवसीय अधिवेशन हुआ तब राजनीति में एक नई हलचल शुरू हो गई।
कहते हैं समय के साथ हालात बदल जाते हैं, इस 64 सालों में देश की राजनीति में बहुत कुछ बदला है। गुजरात, जिसे एक समय कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था, अब भाजपा का अभेद्य किला बन गया है। ऐसे में, जब 6 दशक के अंतराल के बाद कांग्रेस अधिवेशन के लिए गुजरात को चुनती है तो यह महज एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई भी है।

सवाल ये है कि क्या गुजरात मॉडल से कांग्रेस एक बार फिर धुरी पर लौटने की कोशिश में है? कांग्रेस ने 64 साल बाद गुजरात को क्यों चुना? बिना किसी कमान के पार्टी अपना खोया अस्तित्व कैसे पाएगी? इन सभी सवालों के जवाब विस्तार से जानिए..
Congress National Convention: 64 साल बाद गुजरात की याद?
ये सभी जानते हैं कि जब-जब देश में नई राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत गुजरात से हुई है सत्ता में हवा ने अपना रुख मोड़ा है। गुजरात में सामाजिक समरसता देखने को मिलती है। अलग-अलग कम्युनिटी के लोग एक लंबे समय से एक साथ शांति से रह रहें हैं। 2002 के बाद से वहां न तो दंगे हुए या न ही दंगे जैसी स्थिति बनी।
इस मॉडल को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाया जा रहा है। पिछले कुछ सालों से गुजरात देश की राजनीति में 'सेंटर ऑफ अट्रैक्शन' बना हुआ है इसलिए इस अधिवेशन के लिए गुजरात से अच्छा कोई राज्य नहीं था।
1970- 80 के दशक में गुजरात में कांग्रेस की जड़ें बहुत गहरी थीं। अहमद पटेल, माधवसिंह सोलंकी जैसे नेताओं ने राज्य की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया। लेकिन 2001 में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य में भाजपा का जो उभार हुआ, उसने कांग्रेस की नाव डूब सी गई।
2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हालत और भी चिंताजनक हो गई। आम आदमी पार्टी के मैदान में उतरने से कांग्रेस का जनाधार और भी खिसक गया। ऐसे में अधिवेशन का आयोजन ऐसे राज्य में करना, जहां पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है, एक साहसिक और रणनीतिक कदम माना जा सकता है।
पार्टी पुरानी परंपरा को जीवंत कर रही
इमरजेंसी लगने से पहले तक कांग्रेस का अधिवेशन देश के अलग-अलग राज्यों में और नए शहरों में हुआ करता था। 2002 में पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथ में आई और उसके बाद अधिवेशन सिर्फ दिल्ली में होने लगा जब पार्टी हर तरफ से कमजोर होने लगी है तब कांग्रेस की नींद टूटी है कि नए राज्य में अधिवेशन करने से पार्टी की छवि बदलेगी और उसे अपनी ताकत का अंदाजा होगा।
Congress National Convention: गुजरात में अधिवेशन से पार्टी को कितना फायदा?
दिल्ली के बजाय गुजरात में कांग्रेस ने अपना अधिवेशन करके एक तरह से ये संदेश देने कि कोशिश की है कि पार्टी अभी भी एक्टिव मोड में है। वहीं लोकसभा चुनाव के बाद से राहुल गांधी खुद दो बार गुजरात का दौरा कर चुके हैं।
कांग्रेस हाईकमान ये जानता है कि अगर गुजारत मॉडल टूटा तो इसका असर पूरे देश में होगा।
आने वाले समय में बिहार और अगले साल तमिलनाडु देश में ये दो अहम चुनाव भी होने हैं। ऐसे में ये अधिवेशन काफी अहम माना जा रहा है और हो सकता है कि इससे एक नया मॉडल निकले जो कांग्रेस के लिए तिनके का सहारा बन सके। देखिए कांग्रेस के पास शीर्ष नेतृत्व की कमी है लेकिन पार्टी अपनी नई उभरती पीढ़ी को आगे ला रही है। इस अधिवेशन को मीडिया लाइमलाइट दे या ना दे लेकिन इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के अंदर ये संदेश जरूर जाएगा कि अब पार्टी गुजरात में सक्रिय हो गई है।
Congress National Convention: बिना सेनापति, कैसे लड़ेगी सेना?
कांग्रेस की वापसी में कई रोड़े हैं और सबसे बड़ा पत्थर कांग्रेस में नेतृत्व की कमी है। राहुल गांधी का नेतृत्व अक्सर सवालों के घेरे में रहा है। प्रियंका गांधी को अब तक पार्टी में निर्णायक भूमिका में नहीं दिखी हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने के बावजूद नेतृत्व को लेकर स्पष्टता नहीं है।
गुजरात में कांग्रेस की राज्य इकाई भी आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है। न स्थानीय चेहरा, न संगठन की स्पष्ट दिशा। ऐसे में अधिवेशन के जरिए पार्टी क्या दिशा तय कर पाएगी, यह देखने वाली बात होगी।
Congress National Convention: इसके पिछे क्या है रणनीति?
कांग्रेस की इस अधिवेशन के आड़ में जमीनी स्तर से फिर से पार्टी को खड़ा करना चाहती है। अधिवेशन के जरिए न सिर्फ कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाने का प्रयास हो रहा है, बल्कि यह संदेश देने की कोशिश भी है कि पार्टी अभी खत्म नहीं हुई है।
गुजरात में अधिवेशन एक प्रतीक हो सकता है यह दर्शाने के लिए कि कांग्रेस अभी भी मैदान में है। 64 साल बाद गुजरात में अधिवेशन कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का अवसर है। यदि पार्टी इस मौके का उपयोग आत्म-विश्लेषण और नए रोडमैप के लिए करती है, तो यह उसका पुनर्जन्म हो सकता है।












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