कांग्रेस इस फॉर्मूले से मध्यप्रदेश में भाजपा और बसपा दोनों को देगी मात
नई दिल्ली। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस का बीएसपी के साथ गठबंधन न होना कांग्रेस के लिए बड़े नुकसान के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि राहुल गांधी खुद कह चुके हैं कि गठबंधन होता तो अच्छा रहता लेकिन नहीं होने से भी इन चुनावों में कांग्रेस की संभावना पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कांग्रेस मध्यप्रदेश में इस वक्त एक नए फॉर्मूले पर काम कर रही है ताकि अगर उसे बीएसपी की वजह से कोई नुकसान होता भी है तो वो कहीं और से इसकी भरपाई करे। कांग्रेस के सूत्रों का कहना कि पार्टी के नेता मध्यप्रदेश में अगड़ी जातियों के नेताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं। कांग्रेस के नेता ऊपरी जाति के मतदाताओं पर फोकस कर रहे हैं जो शिवराज सरकार से नाराज हैं और उसके खिलाफ वोट दे सकते हैं।

अगड़ों को लुभाने की कोशिश
ये आम धारणा है कि इस बार प्रदेश में सवर्ण मतदाता बीजेपी के साथ खड़े नहीं रहेंगे इसलिए कांग्रेस इन्हें अपने पाले में करने के लिए इनसे लगातार बात कर रही है। ऊपरी जाति के नेता कांग्रेस के नेताओं से परिचित हैं। वो पार्टी अध्यक्ष कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी को जानते हैं। कांग्रेस के ये सभी बड़े नेता पार्टी के अंदर के ऊपरी जाति के नेताओं की मदद से अगड़ों के बड़े नेतओं के संपर्क में हैं।
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समुदाय को मिल रही है अहमियत
फिलहाल ये साफ है कि न तो कांग्रेस और न ही बीजेपी के पास सवर्णों को तुरंत देने के लिए कुछ है केवल अच्छे संबंध स्थापित करने की कोशिश है। अगड़ों को फायदा तभी हो सकता है अगर कांग्रेस सरकार बनाती है और इसी को लेकर समुदाय कांग्रेस की मदद कर सकता हैं। सवर्ण समुदाय इस बात से खुश लग रहा है कि कांग्रेस के नेता उसके पास उसका साथ मांगने के लिए आ रहे हैं क्योंकि अभी तक कोई भी उनसे बात नहीं कर रहा था।
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हम साथ हैं का संदेश
कांग्रेस ऊपरी जाति को ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बीएसपी के साथ गठबंधन नहीं करना एक सोची समझी रणनीति के तहत लिया गया फैसला है। सवर्णों के प्रदर्शनों के दौरान कांग्रेस के कई नेता निशाने पर आए लेकिन उन्होंने किसी तरह की कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी। कहा जाता है कि जब सुरक्षा एजेंसियों ने कांग्रेस नेताओं से कार्रवाई करने के लिए संपर्क भी किया तो उन्होंने रिपोर्ट करने से इनकार कर दिया। यानी कांग्रेस सवर्णों का गुस्सा भी प्यार के साथ पी गई। लेकिन दूसरी ओर बीजेपी के मंत्रियों ने उनके खिलाफ प्रदर्शनों पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। कांग्रेस के लिए ये दांव 2.5 प्रतिशत वोटों के स्विंग पर निर्भर करेगा और अगर पार्टी इसे अपने पक्ष में लाने में सफल होती है तो वो सरकार बना सकती है।

बीजेपी के लिए परेशानी
अनुमान के मुताबिक प्रदेश में लगभग 13 प्रतिशत ऊंची जाति की आबादी है और मोटे तौर पर इसमें 5.7 प्रतिशत ब्राह्मण, 5.3 प्रतिशत राजपूत और 2 प्रतिशत वैश्य है जबकि 42 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), 14 फीसदी अनुसूचित जाति और 22 प्रतिशत लोग अनुसूचित जनजाति के हैं। विंध्य प्रदेश में ऊंची जातियों का प्रभुत्व है यहां ब्राह्मणों की सबसे ज्यादा जनसंख्या 14 प्रतिशत है और मध्य भारत में राजपूतों का अनुपात लगभग 9 प्रतिशत है। इन इलाकों में ये अगड़ी जातियां बीजेपी के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर सकती हैं और कांग्रेस की भविष्य की संभावनाओं को बेहतर बना सकती हैं। तो उगर अगड़ी जातियों के मतदाता ‘नोटा' का बटन दबाने के बजाए कांग्रेस का साथ देते हैं तो बीजेपी के लिए प्रदेश में उसकी 15 साल की सत्ता को बचा पाना मुश्किल हो जाएगा।
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