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वर्ष 1528 से 2015 तक का बाबरी विवाद, मस्जिद के नीचे था मंदिर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में आज भी राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद जिंदा है। 6 दिसंबर यानि बाबरी विध्वंश के दिन यह मुद्दा हर साल फिर से जिंदा हो जाता है।

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वर्ष 1992 में 6 दिसंबर के दिन कार सेवकों ने बड़ी संख्या में बाबरी मस्जिद पर इकट्ठा होकर इस मुख्य ढांचे को गिरा दिया था। जिसके बाद से यह मुद्दा आज भी कोर्ट की दीवारों की ठोकरें खा रहा है।

लेकिन आज हम आपको बाबरी मस्जिद विध्वंश की शुरुआत और इतिहास को वर्ष दर वर्ष विस्तार से बतायेंगे कि कैसे यह मुद्दा देशव्यापी मुद्दा बन गया।

1528- बाबर ने यहां एक मस्जिद का निर्माण कराया जिसे बाबरी मस्जिद कहते हैं लेकिन कुछ हिंदुओं के अनुसार इसी जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था।

1853- इस जगह पर पहली धार्मिक हिंसा हुई।

1859- अंग्रेजी हुकूमत ने इस जगह को चारों ओर से तारों से घेरवा दिया जहां पूजा के लिए अलग और हिंदुओं के लिए अलग पूजा की व्यवस्था की गयी।

1949- पहली बार किसी ने यहां भगवान राम की मूर्ती को मस्जिद के भीतर रख दिया। जिसके विरोध में मुस्लिमों ने कोर्ट में सिविल सूट फाइल कर दिया जिसके जवाब में हिंदुओं ने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। जिसके बाद सरकार ने इस जगह को विवादित मानते हुए यहां ताला लगा दिया

1984- हिंदुओं ने एक कमेटी का निर्माण किया जिसमें इस भगवान राम की जन्मस्थली को आजाद किये जाने के साथ भव्य राम मंदिर के निर्माण की मांग की गयी। जिसकी अगुवाई विश्व हिंदू परिषद ने की थी।

इसी समय तत्कालीन भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने इस मिशन की कमान अपने हाथों में ली।

1986- जिला जज ने आदेश दिया कि मस्जिद के विवादित दरवाजे को खोला जाए और हिंदुओं को पूजा करने की इजाजत दी जाए। जिसके विरोध में मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का निर्माण किया।

1989- वीएचपी ने बड़ा अभियान शुरु करते हुए मस्जिद के पास राम मंदिर की नींव डाली।

1990- वीएचपी के कार्यकर्ताओं ने आंशिक रूप से मस्जिद को नुकसान पहुंचाया। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्र शेखर ने दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की कोशिश की।

1991- उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनीं।

1992- वीएचपी, शिवसेना, भाजपा, के कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। जिसके बाद देशभर में दंगे भड़क गये जिसमें 2000 से अधिक लोग मारे गये।

1998- भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में गठबंधन की सरकार बनायी जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री चुना गया।

2001- एक बार फिर से बाबरी विध्वंश की सालगिरह पर तनाव बढ़ गया और वीएचपी ने राम मंदिर निर्माण की मांग की।

2002- प्रधानमंत्री ने अपने कार्यालय में अयोध्या सेल बनाया जिसमें कई वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघन सिंह को शामिल किया गया जिन्हें हिंदू और मुसलमान नेताओं से बात करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी।

फरवरी 2002- भाजपा ने यूपी के चुनाव के मैनीफेस्टों में राम मंदिर निर्माण का जिक्र नहीं किया। वीएचपी ने 15 मार्च तक मंदिर निर्माण की तारीख को तय किया। सैकड़ों कार्यकर्ता अयोध्या में जमा हुए। गोधरा जा रही ट्रेन जिसमें 58 कारसेवक अयोध्या जा रहे थे उन्हें जिंदा जला दिया गया।

मार्च 2002- गुजरात में दंगे भड़के जिसमें 1000 से 2000 लोगों की हत्या हुई जिसमें ज्यादातर मुस्लिम थे।
अप्रैल 2002- तीन हाई कोर्ट ने अयोध्या की जमीन किसकी है मामले की सुनवाई शुरु की।
जनवरी 2003- भूगर्भवैज्ञानिकों ने कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या की जमीन की खुदाई शुरु की जिसमें यह पता लगाने को कहा गया था क्या यहीं पर भगवान राम का जन्म हुआ था।

अगस्त 2003- सर्वे में यह बात सामने निकलकर आयी कि मस्जिद के नीचे मंदिर था। लेकिन भूगर्भवैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर मुसलमानों ने विरोध किया और उसे नकार दिया।

प्रधानमंत्री वाजपेयी ने हिंदू आंदोलनकारी रामचंद्र दास परमहंस की अंतिम संस्कार स्थल पर कहा कि वह परमहंस की आखिरी इच्छा जरूर पूरा करेंगे और अयोध्या में मंदिर जरूर बनवायेंगे। हालांकि उन्होंने आशा जतायी कि कोर्ट की तरफ से फैसला आ जाए समझौते से इस मामले का हल हो जाए।

सितंबर 2003- कोर्ट ने सात हिंदू नेताओं के खिलाफ बाबरी विध्वंश के मामले में केस दर्ज करने का आदेश दिया। लेकिन इसमें आडवाणी के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं किया गया।

अक्टूबर 2004- आडवाणी ने कहा कि उनकी पार्टी आज भी अपने वायदे पर कायम है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होगा और इसे कोई टाल नहीं सकता है।

2005- मुस्लिम आतंकियों ने बाबरी इलाके में जीप का इस्तेमाल करते हुए धमाका किया लेकिन पुलिस की मुठभेड़ में पांचों आतंकियों को मौत के घाट उतार दिया।

जून 20009- लिब्राहन कमिशन ने अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें 17 साल पहले बाबरी मस्जिद के विध्वंश की वजहों को उजागर किया गया था।
नवंबर 2009- संसद में लिब्राहम आयोग की रिपोर्ट पर जमकर हंगामा हुआ जिसमें कई हिंदू और भाजपा नेताओं के शामिल होने की बात कही गयी थी।

सितंबर 2010- इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कि अयोध्या के विवादित जगह को तीन लोगों में बांटा जाए। जिसमें कहा गया कि मुस्लिम संगठन को एक तिहाई हिस्सा, हिंदू संगठन को दूसरा हिस्सा जबकि निर्मोही अखाड़ो को तीसरा हिस्सा दिया जाए। मुख्य स्थल जहां बाबरी मस्जिद को गिराया गया था उसे हिंदू संगठन को दिया गया था जिसे मुस्लिम संगठन ने चुनौती दी

मई 2011-हिंदू और मुस्लिम संगठनों के हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया

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