Collegium Vs NJAC:कॉलेजियम सिस्टम पर पुनर्विचार वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार

Collegium system Vs NJAC: चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ ने गुरुवार को उस रिट याचिका पर विचार करने की सहमति दे दी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायिक नियुक्तियों के लिए मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम पर पुनर्विचार की मांग की गई है। याचिका में एनजेएसी को भी फिर से जिंदा करने की बी मांग की गई है, जिसे 2015 के अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने रद्द कर दिया था। गौरतलब है कि कॉलेजियम सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने इसपर सवाल उठाए थे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति करने के लिए बनी कॉलेजियम सिस्टम संवैधानिक व्यवस्था नहीं है। यह एक अदालती आदेश से चल रही है।

एनजेएसी को पुनर्जीवित करने की भी मांग

एनजेएसी को पुनर्जीवित करने की भी मांग

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग ( NJAC) को पुनर्जीवित करने की मांग की गई है। एनजेएसी एनडीए सरकार की ओर से संसद से पारित एक व्यवस्था थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने अक्टूबर 2015 में रद्द कर दिया था। कॉलेजियम सिस्टम जजों की नियुक्ति के लिए करीब 29 साल से जारी व्यवस्था है, जिसका संविधान में कोई जिक्र नहीं है। हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे अस्पष्ट बताते हुए इसपर सवाल खड़े किए थे। मौजूदा याचिका उसी के बाद छिड़ी बहस के बीच डाली गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पर जताई सहमति

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पर जताई सहमति

मैथ्यूज जे नेदुमपारा और बाकी वकीलों ने याचिका में कहा है कि अक्टूबर, 2015 में संवैधानिक बेंच के फैसले से 'जनता की इच्छा' को नाकाम कर दिया गया था। क्योंकि, एनजेएसी मेकेनिज्म 99वां संविधान संशोधन के द्वारा लाया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कॉलेजियम सिस्टम पर पुनर्विचार करने और एनजेएसी को पुनर्जीवित करने की मांग वाली याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है।

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की मांग

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता की मांग

याचिका पर सुनवाई के दौरान सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस बात की ओर इशारा किया कि कॉलेजियम सिस्टम अदालत के एक फैसले के बाद आया था। कॉलेजियम सिस्टम 1993 में 9 जजों की बेंच के जरिए लाया गया था। इस दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह भी हैरानी जताई कि क्या एक रिट याचिका के जरिए अदालती फैसले को चुनौती दी जा सकती है। याचिका में मांग की गई है कि न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी और खुली होनी चाहिए। रिक्तियों का नोटिफिकेशन जारी होना चाहिए और बेंच का हिस्सा बनने के 'सभी योग्य और इच्छुकों' का आवेदन आमंत्रित किया जाना चाहिए। उम्मीदवारों के खिलाफ अपनी आपत्ति जाहिर करने के लिए जनता को भी अनुमित मिलनी चाहिए।

जजों की नियुक्ति-तबादला कॉलेजियम करता है

जजों की नियुक्ति-तबादला कॉलेजियम करता है

कॉलेजियम सिस्टम के खिलाफ दायर याचिका में दलील दी गई है कि 'जजों की नियुक्ति के कॉलेजियम सिस्टम की वजह से याचिकाकर्ताओं और हजारों वकीलों को समान अवसर से वंचित किया गया है, जो कि योग्य, मेधावी और लायक हैं। कॉलेजियम को बदलने के लिए एक मेकेनिज्म समय की मांग है।' गौरतलब है कि कॉलेजियम सिस्टम के तहत सीजेआई की अगुवाई वाले पांच सदस्यीय कॉलेजियम (मौजूदा समय में 6) जजों की नियुक्ति और तबादलों पर फैसला करता है और अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजता है।

एनजेएसी क्या था ?

एनजेएसी क्या था ?

जबकि, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग ( NJAC) के लिए 6 सदस्यों का प्रस्ताव था। इस आयोग की अगुवाई भी सीजेआई को देने की व्यवस्था थी। उनके अलावा सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम जज, केंद्रीय कानून मंत्री और देश की दो जानी-मानी हस्तियों को भी सदस्य बनाने का प्रस्ताव था। जिन दो हस्तियों को आयोग में शामिल किया जाना था, उनका चुनाव प्रधानमंत्री, सीजेआई और लोकसभा में नेता विपक्ष को करना था। नेता विपक्ष की स्थिति नहीं रहने पर लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता इसमें शामिल किए जाने थे। सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा आपत्ति इसी व्यवस्था पर थी।

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