महबूबा मुफ्ती की असफलता है कश्मीर का बिगड़ा माहौल
श्रीनगर। शुक्रवार की शाम से ही कश्मीर घाटी में तनाव की स्थिति है। हिजबुल मुजाहिद्दीन के जम्मू कश्मीर कमांडर बुरहान वानी की मौत ने घाटी को छह वर्षों बाद फिर से एक ऐसी आग में झोंक दिया है जिसके जल्दी शांत होने की उम्मीद कम ही नजर आ रही है। अब तक इस हिंसा में करीब 23 लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग घायल हैं।

याद आया 11 अगस्त 2008 का दिन
शनिवार को पूरी घाटी में जो माहौल था उसने लोगों को 11 अगस्त 2008 का वह दिन याद दिला दिया जब एक विरोध प्रदर्शन रैली में करीब 500,000 लोग शामिल हुए थे। विशेषज्ञों की मानें तो घाटी के माहौल में साफ तौर पर जम्मू
कश्मीर की पीडीपी और बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार की असलफता नजर आती है।
सुरक्षाबलों पर हमले
बुरहान वानी की मौत के एक दिन बाद शनिवार को जब घाटी में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए तो एक बार को ऐसा लगा कि सुरक्षा के इंतजामों को इन विरोध प्रदर्शनों के लिए तैयार ही नहीं रखा गया था।
घाटी में कर्फ्य लगा दिया गया और पुलिस स्टेशनों के अलावा कश्मीर में स्थित सुरक्षाबलों के कैंपों पर हमले होने लगे। इसके बाद आंसू गैस और गोलियों की बौछार का दौर शुरू हुआ।
पुलिस स्टेशन पर भी कब्जा
हालात उस समय और भी डरावने हो गए जब भीड़ ने एक पुलिस स्टेशन पर ही कब्जा कर लिया और पुलिस वालों को बंधक बना लिया। उनके हथियार लूट लिए गए और कुछ पुलिस वालों की भी मौत हो गई।
जिन लोगों ने घाटी में 90 का दशक देखा है वे सभी आज एक ही बात कह रहे हैं कि करीब 28 वर्षों बाद भी घाटी के हालात जस के तस हैं।
चुनौतियों से निबटने की कोई तैयारी नहीं
आज के समय में पुलिस और सुरक्षाबलों को पूरी ट्रेनिंग दी गई है। उन्हें हथियार मुहैया कराए गए हैं और हजारों करोड़ों रुपयों का निवेश सिर्फ पुलिस और सुरक्षाबलों के लिए हुआ है।
एक सीनियर ऑफिसर के मुताबिक इस बात से हर कोई वाकिफ था कि बुरहान वानी अगर मरता है तो फिर इस तरह के हालात पैदा हो सकते हैं। लेकिन किसी भी चुनौतियों से निबटने के लिए कोई प्रयास ही नहीं किए गए।












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