योगी के सामने गोरखपुर में कमल खिलाने की चुनौती
उत्तर प्रदेश की गोरखपुर संसदीय सीट पर हो रहे उपचुनाव के नतीजे 14 मार्च को आएंगे.
पिछले 29 सालों से यहां के सांसद का पता गोरखनाथ मंदिर का रहा है. साल 1998 से लगातार पांच बार इस सीट से योगी आदित्यनाथ निर्वाचित हुए. उनसे पहले उनके गुरु और श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अगुआ रहे महंत अवैद्यनाथ 1989 से लगातार तीन चुनावों में यहां का प्रतिनिधित्व करते थे.
शायद इसीलिए इस बार का चुनाव बेहद ख़ास हो गया है .
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी ये साबित करने में जी जान से जुटी है कि परंपरागत रूप से मंदिर के प्रभाव वाली ये सीट योगी के उम्मीदवार न रहने के बावजूद पार्टी के पास ही रहेगी.
उधर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इसे एक अभूतपूर्व अवसर के रूप में देख रहे हैं.
अरसे से विपक्षी पार्टियां ये शिकायत करती रही हैं कि गोरखपुर संसदीय सीट का चुनाव गोरक्षपीठ के प्रति धार्मिक -आध्यात्मिक लगाव के चलते जनता के लिए राजनीतिक कम और आस्था का चुनाव ज्यादा बन जाता है.
इस बार योगी मैदान में नहीं हैं और वे ये शिकायत नहीं कर पायेंगे.
एक्शन में योगी
ये बात और है कि उम्मीदवार न होने के बावजूद योगी इससे कहीं बड़ी भूमिका में मौजूद हैं.
पिछले कुछ दिनों में उन्होंने ताबड़तोड़ जनसभाएं की हैं और हर बार उन्होंने साल भर पुरानी हो रही अपनी सरकार के कामकाज के बूते जनता से अपना पुराना सहयोग बरकरार रखने की अपील की है.
दरअसल ये चुनाव राजनीतिक नजरिए से योगी के लिए भी बहुत अहम है.
मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में वो पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं. राष्ट्रीय राजनीति में कर्नाटक से लेकर त्रिपुरा तक के चुनावों में पार्टी की ओर से प्रभावी इस्तेमाल के बाद उनकी छवि और कद में इजाफा हुआ है. ऐसे में उनके लिए अपनी परंपरागत सीट पर पार्टी को प्रभावशाली जीत दिलाना बेहद जरूरी है.
कांग्रेस का दावा
गोरखपुर संसदीय सीट हालांकि परंपरागत रूप से हिंदुत्व की राजनीति और बीजेपी के लिए मुफ़ीद रही है लेकिन इस बार माहौल थोड़ा बदला बदला दिखता है.
विपक्षी दल किसी भी कीमत पर इस चुनाव में बाजी पलटने के लिए आतुर हैं और इसके लिए वे कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहते.
कांग्रेस ने यहां से पेशे से चिकित्सक और सामाजिक रूप से बेहद सक्रिय डॉक्टर सुरहिता करीम को अपना प्रत्याशी बनाया है.
मूल रूप से से बंगाली समुदाय से ताल्लुक रखने वाली सुरहिता चटर्जी के पति डॉ वजाहत करीम एक मशहूर चिकित्सक और फिल्म निर्माता के तौर पर अपनी पहचान रखते हैं और कांग्रेस को उम्मीद है कि वह डॉक्टर सुरहिता के रूप में हिंदू मुस्लिम दोनों तबकों में अपनी पैठ बना पाएगी.
2012 के महापौर चुनाव में भी वे कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में बहुत मजबूती से लड़ी थी और कांग्रेस को उसी प्रदर्शन की पुनरावृत्ति की उम्मीद है.
गठजोड़ होगा हिट?
लेकिन पिछले हफ्ते 23 साल से प्रदेश की राजनीति में एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी रही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अचानक गठजोड़ ने मामले में नाटकीय मोड़ ला दिया है.
सपा शुरू से इस चुनाव को जातीय समीकरणों के जादुई रसायन के बूते जीतना चाहती थी. इसीलिए उसने इस बार यादव या मुस्लिम प्रत्याशी की बजाय उस निषाद समुदाय के हाथों पार्टी का झंडा सौंपा जो इस इलाके में आबादी और राजनीतिक सक्रियता दोनों ही नजरिए से सबसे ताकतवर तबका माना जाता है.
गोरखपुर संसदीय सीट के 19 लाख 50 हज़ार वोटरों में निषादों की संख्या लगभग साढे तीन लाख के बीच बताई जाती है. सपा के रणनीतिकारों को लगता है कि यदि निषाद समुदाय के साथ लगभग आठ फ़ीसदी दलित वोटर और नौ फ़ीसदी मुस्लिम वोटर आ जाएं तो ये सीट भाजपा के लिए 'वाटर लू' साबित हो सकती है.
समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी प्रवीण निषाद इस इलाके में बहुत कम समय में काफी तेजी से उभरी निषाद पार्टी के संयोजक डॉ संजय निषाद के बेटे हैं जिन्होंने पिछले दिनों पिछड़े मुसलमानों में गहरी पैठ रखने वाली पीस पार्टी के साथ मिलकर अब सपा का दामन थाम लिया है.
मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढाई कर चुके प्रवीण निषाद पिता की तरह ही छापामार किस्म की लडाइयों के शौक़ीन दिखते हैं जिसमें सुर्खियाँ आसानी से हासिल होती हैं.
दावे में कितना दम
मंगलवार की सुबह परिवार सहित गोरखनाथ मंदिर पहुँच कर गोरक्षनाथ के गुरु रहे मछेंदर नाथ की मूर्ति के सामने माथा नवाने वाले प्रवीण ने बीबीसी से कहा, "एक हिंदू धर्मानुयायी होने के नाते आशीर्वाद मांगने का अधिकार तो सबको है".
जाहिर है कि वे इस राजनीतिक जंग में भाजपा के उस अमोघ अस्त्र को बेअसर करने की कोशिश में हैं जो जातियों में विभाजित हिन्दू समुदाय को एक समूह में बदलने की कूवत रखता है.
तो क्या सपा-बसपा के इस गठजोड़ ने खुद को राष्ट्रीय विकल्प के बतौर साबित करने को बेकरार कांग्रेस को इस लडाई में पीछे धकेल दिया है?
कांग्रेस के स्थानीय रणनीतिकार और पार्टी के पुराने नेता सैयद जमाल अहमद इसे ख़ारिज करते हुए कहते हैं, "ये सिर्फ कागज़ी गणित है. बीस साल से परस्पर घृणा रखने वाली दोनों पार्टियों के काडर अभी भी एक दूसरे के संग नहीं दिख रहे."
हालांकि बसपा के कोआर्डिनेटर घनश्याम खरवार ने बीबीसी से कहा, "बहनजी के अनुशासित कार्यकर्ता उनके आदेश के बाद पूरी ताकत से सपा प्रत्याशी के प्रचार में जुट गए हैं. वे दिखावटी प्रचार में नहीं,जमीनी फर्क पैदा करने में भरोसा रखते हैं."
नतीजे पर नज़र
दरअसल विपक्षियों को 1999 का लोकसभा चुनाव दोहराने की उम्मीद है जब निषादों के कद्दावर नेता रहे जमुना निषाद ने निषाद,मुस्लिम और यादव वोटों के बूते योगी आदित्यनाथ को बेहद कड़ी टक्कर दी थी. उस चुनाव में योगी की जीत का अंतर महज सात हज़ार वोटों तक सिमट गया था.
उन्हें लगता है कि इस बार योगी के प्रत्याशी न होने से ये खाई भी पट जायेगी.
लेकिन भाजपा भी आश्वस्ति के शिखर पर है. डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक यहां विधायक रहे केंद्रीय राज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ल कहते हैं, "अगर 2018 में भी वे 1999 की सोच रहे हैं तो जाहिर है कि उन्हें बीस सालों के बदलाव की खबर ही नहीं."
ठीक एक हफ्ते बाद इसका मुकम्मल जवाब मिल ही जाएगा.
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