नए साल में बीजेपी के सामने चुनावी राज्यों में कहां कैसी है चुनौती ? जानिए
2023 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। एक तरह से ऐसा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले सेमीफाइल होने वाला है। भारतीय जनता पार्टी के सामने चुनौती सबसे ज्यादा है,कई राज्यों में उसकी सरकारें हैं।

भारतीय जनता पार्टी की चुनावी राजनीति के लिहाज से नया साल बहुत ही अहम रहने वाला है। क्योंकि, इस साल कई राज्यों में चुनाव होने हैं, जहां पर पार्टी सत्ता में है। पार्टी का परफॉर्मेंस कैसा रहता है, उससे 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए भी एक जमीन तैयार हो सकती है। हालांकि, विधासभा चुनावों और लोकसभा चुनावों का पैटर्न एक हो यह कतई जरूरी नहीं है। क्योंकि, पिछली बार विधानसभा चुनावों में भाजपा राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पिछड़ गई थी। लेकिन, लोकसभा चुनावों में उसने सारे चुनावी पंडितों को नई तरह की चुनावी शिक्षा लेने को मजबूर कर दिया था। एक बार फिर से बीजेपी के लिए यह साल चुनावी राजनीति के हिसाब से कुछ प्रदेशों में बहुत ही चुनौतीपूर्ण रहने वाला है।

चुनावी राजनीति में भाजपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है 2023
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले 2023 बीजेपी के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण साल है। इस समय 16 राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं। मौजूदा साल में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, जिनमें से कई में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं। हालांकि, भाजपा के पक्ष में ब्रैंड मोदी का जलवा अभी भी बरकरार है। लेकिन, पहले झारखंड में और हाल में हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के जो नतीजे आए है, उसने पार्टी नेतृत्व का दिमाग ठनका दिया है। दोनों राज्यों में एंटी-इंकंबेंसी और स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ आंतरिक मतभेदों ने बीजेपी की जीत के रथ को रोक दिया है। भाजपा के महासचिव अरुण सिंह ने ईटी से कहा है, '2023 बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोकसभा चुनावों से पहले वाला साल है। 2014 के बाद से हमारी संगठनात्मक क्षमता कई गुना बढ़ गई है। मोदी सरकार की ओर से शुरू की गई कई योजनाएं लगभग 80% आबादी तक पहुंच चुकी है। मोदी के नेतृत्व में हुए कार्य और मजबूत संगटन के माध्यम से हम 2023 में और 2024 के लोकसभा चुनावों में बड़ी सफलता हासिल करने जा रहे हैं। '

कर्नाटक विधानसभा चुनाव
भाजपा की पहली चुनौती कर्नाटक होगी, जहां चार महीने में विधानसभा होने वाला है। पार्टी ने यहां के सबसे दिग्गज और बुजुर्ग नेता बीएस येदियुरप्पा की जगह उनके मुकाबले युवा चेहरे बसवराज बोम्मई को सरकार की कमान दी हुई है। दोनों प्रभावी लिंगायत समुदाय से हैं। येदियुरप्पा को पार्लियामेंट्री बोर्ड में जगह देकर भाजपा ने सम्मानित तरीके से कमान उनके हाथों से अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की कोशिश की है। पार्टी की सरकार है, इस वजह से निश्चित तौर पर उसके सामने एंटी-इंकंबेसी की भी चुनौती होगी। वैसे प्रदेश के भाजपा-इंचार्ज अरुण सिंह ने कहा है, 'इस समय तक कर्नाटक में कांग्रेस की तुलना में हम आगे हैं। हमारे सीएम बोम्मई की छवि सामान्य आदमी की है। येदियुरप्पा जी हमारे सबसे बड़े और सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। बीजेपी के लिए सर्वश्रेष्ठ देने के लिए दोनों मिलकर काम कर रहे हैं। यहां कोई एंटी-इंकंबेंसी नहीं है। आने वाले दिनों में दूसरे दलों के कई नेता बीजेपी में शामिल होने वाले हैं।'

मध्य प्रदेश में साल के अंत में चुनाव
मध्य प्रदेश में साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। शिवराज सिंह चौहान राज्य में सबसे ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले नेता बन चुके हैं। उनके कई मंत्रिमंडलीय सहयोगी भी लंबा वक्त गुजार चुके हैं। राज्य में मौजूदा सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी के भी दावे किए जा रहे हैं। नगर निकाय चुनावों में कांग्रेस से भाजपा को नुकसान भी हुआ है। गुजरात चुनाव के बाद यहां भी पार्टी में उस मॉडल को अपनाने की बात उठ रही है, जहां कई वरिष्ठ नेताओं को चुनाव से पहले आराम करने के लिए कह दिया गया था। उनकी जगह पर नए चेहरों पर दांव लगाया गया और सफलता भी मिली है। मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती कांग्रेस से आए नेताओं की भी है, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ आए थे। सही मायने में भाजपा के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल एमपी में ही बताया जा रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह (गुजरात में आम आदमी पार्टी की जीत का दावा किया था) बीजेपी की हार को लेकर लिखित गारंटी भी देने के लिए तैयार हैं। भाजपा फिलहाल राज्य में आदिवासी और दलित वोटरों को अपने साथ बनाए रखने के लिए जोरदार कवायद में जुटी हुई है।

राजस्थान विधानसभा चुनाव
राजस्थान की स्थिति बीजेपी के हिसाब से अलग है। उसे लगता है कि यहां कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ जबर्दस्त माहौल है। कांग्रेस के अंदर की भयंकर गुटबाजी और हिमाचल प्रदेश की तरह हर पांच साल बाद सरकार बदलने की परंपरा से भाजपा की उम्मीदें सातवें आसमान पर हैं। लेकिन, हकीकत ये है कि पूर्व सीएम वसुंधरा राजे और प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के बीच की गुटबाजी भी किसी से छिपी नहीं है; और यह भाजपा की सेहत के लिए ठीक नहीं है। अरुण सिंह राजस्थान में भी बीजेपी के इंचार्ज हैं। उनके मुताबिक, 'जन आक्रोश यात्रा को लोगों की ओर से बहुत बढ़िया समर्थन मिला है और बीजेपी के सभी नेताओं ने यात्रा में हिस्सा लिया है। हम अब जन आक्रोश सभा आयोजित कर रहे हैं और नेताओं के बीच कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि सभी चाहते हैं कि पार्टी चुनाव जीते।'

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव
नेतृत्व के मामले भाजपा के लिए छत्तीसगढ़ में कुछ-कुछ कर्नाटक जैसी स्थिति है। तीन बार के मुख्यममंत्री रमन सिंह अब भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और पार्टी अभी तक उनके कद का प्रदेश का कोई नेता नहीं तलाश पाई है, जो कांग्रेस की भूपेश बघेल की सरकार को टक्कर दे सके। बीजेपी काफी कोशिश कर रही है। पिछले 6 महीनों में प्रदेश नेतृत्व में काफी बदलाव किया है। पिछले साल अगस्त में आदिवासी नेता विष्णु देव साई की जगह अरुण साव को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। उसी महीने नारायण चंदेल को नेता विपक्ष बनाया था। साव और चंदेल दोनों ही ओबीसी हैं और पार्टी इनके माध्यम से सीएम बघेल को चुनौती देना चाहती है, जो ओबीसी समाज से आते हैं। सितंबर में भाजपा ने पार्टी इंचार्ज डी पुरंदेश्वरी की जगह वरिष्ठ नेता ओम माथुर को जिम्मेदारी सौंपी है।












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