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Caste Census: जाति जनगणना कराने में मोदी सरकार के सामने आएगी ये 5 चुनौतियां?

Caste Census: भारत में जाति जनगणना एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र बन गया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जाति जनगणना कराने का फैसला लिया है। सरकार ने कहा है कि जातियों की गणना को आने वाली जनगणना में शामिल किया जाएगा। भारत में विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दल और सामाजिक संगठन इसकी मांग कर रहे थे।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत में जाति जनगणना कराना आसान है? असल में जाति आधारित जनगणना को कराना, मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी...ये कहीं से भी एक सीधा और सरफ रास्ता तो नहीं है। इसके पीछे कई संवैधानिक, तकनीकी, राजनीतिक और विधायी चुनौतियां हैं। आइए इन सभी पहलुओं पर एक नजर डालते हैं?

Caste Census

🔴 1. संवैधानिक संशोधन करना होगा

भारत में वर्तमान जनगणना प्रक्रिया भारतीय जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत की जाती है। जिसमें धर्म, भाषा, लिंग, और सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को शामिल किया जाता है। इसमें जाति को रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया इस कानून के दायरे में नहीं आती। ऐसे में जाति धारित विस्तृत जनगणना को लागू करने के लिए संविधान या संबंधित अधिनियमों में संशोधन की जरूरत पड़ सकती है। यह विधायी प्रक्रिया लंबी, जटिल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकती है लेकिन मोदी सरकार की संसद में संख्या को देखते हुए इसमें कम चुनौती आएगी।

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🔴 2. जातियों की श्रेणी में राज्यों के बीच अंतर और कोडिंग की समस्या

भारत के अलग-अलग राज्यों में जातियों की वर्गीकृत सूचियां Gen, OBC, SC, ST एक-दूसरे से काफी अलग हैं। एक ही जाति किसी राज्य में ओबीसी मानी जाती है तो दूसरे में सामान्य वर्ग में आती है। उदाहरण के लिए बिहार-झारखंड में 'बनिया' obc कैटेगरी में आते हैं लेकिन यूपी और दिल्ली ये सामान्य कैटेगरी में आते हैं। इसके अलावा, देशभर में हजारों उपजातियां और स्थानीय जातीय समूह मौजूद हैं, जिनका मानकीकरण और कोडिंग करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।

सटीक आंकड़े तभी निकल सकते हैं जब जातियों की पहचान, नामकरण और वर्गीकरण में एकरूपता लाई जा सके, जो मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।

🔴 3. सारणीकरण (Tabulation) में मुश्किल

2011 में मनमोहन सिंह की सरकार ने जाति जनगणना कराई थी। लेकिन इसके आंकड़े आज तक पूरी तरह सार्वजनिक नहीं हो सके। वजह? डेटा इतना असंगठित और विसंगतिपूर्ण था कि उसे सारणीकरण (Tabulation) बेहद मुश्किल हो गया।

जातियों के आंकड़े को लेकर मनमोहन सिंह की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि एकत्रित किए गए आंकड़ों में काफी गलतियां हैं, इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। 2021 में एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कहा गया का कि 1931 में जब जातिगत जनगणना हुई थी, तब जातियों की संख्या 4 हजार 137 थी लेकिन 2011 की जनगणना में जातियों की संख्या उपजातियों समेत बढ़कर 46 लाख से ज्यादा हो गई। यह आंकड़ा सही नहीं हो सकता है।

अगर करोड़ों परिवारों से मिली जातिगत जानकारी को स्पष्ट और उपयोगी रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सका, तो नीति निर्माण के लिहाज से उसकी कोई खास उपयोगिता नहीं रह जाती। सरकार को जातियों के सारणीकरण करने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

🔴 4. राजनीतिक चुनौती: आंकड़े सार्वजनिक करना जोखिम भरा

जाति जनगणना के आंकड़ों को सार्वजनिक करना मोदी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो सकता है। 2011 की जनगणना के जातिगत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जाने के पीछे सरकार का डर था। सरकार को शक था कि आंकड़ों से सामाजिक असमानता और राजनीतिक समीकरणों में उथल-पुथल मच सकती है।

आज भी यही डर बना हुआ है, आंकड़े सामने आने पर जातियों के अनुपात के आधार पर आरक्षण, संसाधन वितरण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांगें तेज हो सकती हैं, जिससे मोदी सरकार को संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।

🔴 5. विधायी चुनौती: आरक्षण को लेकर छिड़ जाएगी नई बहस

जाति जनगणना के बाद आरक्षण को लेकर बहस छिड़ सकती है। मान लीजिए अगर जातिगत जनगणना में यह सामने आता है कि कुछ पिछड़े वर्गों की जनसंख्या बहुत अधिक है, तो उनके लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग तेज हो सकती है। अलग-अलग जाति के लोग अपने विकास के लिए फिर से आरक्षण की मांग करने लगेंगे। वहीं सुप्रीम कोर्ट का 50% आरक्षण सीमा वाला फैसला भी इस रास्ते में बाधा बन सकता है।

इसका मतलब ये कि सरकार को या तो संविधान में संशोधन करना होगा, या फिर न्यायिक प्रक्रिया से गुजरते हुए नई आरक्षण नीति गढ़नी होगी, जो अपने आप में एक राजनीतिक संघर्ष का विषय बन सकता है।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि जाति जनगणना तकनीकी रूप से जितनी जटिल है, राजनीतिक रूप से उससे कहीं ज्याद संवेदनशील मुद्दा बन चुकी है। मोदी सरकार के सामने एक ओर सामाजिक न्याय की मांगें हैं तो दूसरी ओर आंकड़ों के गलत इस्तेमाल और सामाजिक विभाजन की आशंका भी है। मोदी सरकार को इस दिशा में इन सभी आयामों पर बेहद सावधानी से कदम रखना होगा।

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