Caste Census: 50 प्रतिशत आरक्षण का दायरा तोड़ना चाहते हैं राहुल गांधी, क्या है यह आरक्षण सीमा?
Caste Census: भारत में जाति आधारित आरक्षण और उसकी अधिकतम सीमा को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। दरअसल, पीएम नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्र सरकार ने 30 अप्रैल को जनगणना के साथ-साथ जातिगत आंकड़ों को शामिल करने की मंजूरी दी है। इस घोषणा के बाद राहुल गांधी ने एक बार फिर आरक्षण पर 50% की अधिकतम सीमा को हटाने की वकालत की।
राहुल गांधी ने कहा कि यह सीमा देश के सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों, दलितों और आदिवासियों की प्रगति में रुकावट बन गई है। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि 50% की सीमा को समाप्त किया जाए, क्योंकि यह हमारे देश की प्रगति और सामाजिक न्याय के मार्ग में बाधा है। कहा कि आरक्षण की सीमा 50% से अधिक होनी चाहिए।

क्या है यह 50% की आरक्षण सीमा?
आरक्षण पर 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा किसी संवैधानिक प्रावधान से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से विकसित हुई है। इसकी शुरुआत 1962 में एमआर बालाजी केस से हुई थी, लेकिन 1992 के इंदिरा साहनी (मंडल आयोग) मामले में नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
2006 में, एम नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यों को किसी भी आरक्षण की घोषणा करने से पहले समुदायों के पिछड़ेपन और समग्र प्रभाव पर मात्रात्मक डेटा एकत्र करना चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि अगर राज्य ऐसा नहीं कर पाता है, तो अनुच्छेद 16 में समानता का अधिकार खत्म हो जाएगा।
वहीं, मार्च 2021 में, सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण के बारे में एक मामले की सुनवाई करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से इस बारे में राय मांगी कि क्या वे आरक्षण पर अदालत द्वारा अनिवार्य 50 प्रतिशत की सीमा को पार करने के पक्ष में हैं। यह अलग बात है कि मई 2021 में न्यायालय ने मराठा कोटा को 'असंवैधानिक' घोषित कर दिया।
संविधान क्या कहता है?
भारत का संविधान अनुच्छेद 15(4) और 16(4) के तहत राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देता है। यह प्रावधान शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की संवैधानिक अनुमति देता है।
2018 के 102वें संविधान संशोधन के तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को संवैधानिक दर्जा मिला, जिससे अब केंद्र सरकार को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को अधिसूचित करने की शक्ति प्राप्त है।
क्या 50% सीमा का उल्लंघन किया गया है?
कई राज्यों ने 50 प्रतिशत की सीमा को पार करने की असफल कोशिश की है। कुछ सफल भी हुए हैं। उदाहरण के लिए,
तमिलनाडु में 69% आरक्षण है, जिसे 1993 में कानून बनाकर 9वीं अनुसूची में डाला गया ताकि इसे न्यायिक समीक्षा से बचाया जा सके। उत्तर पूर्वी राज्यों में संविधान द्वारा विशेष प्रावधान के तहत 50% से अधिक आरक्षण की अनुमति दी गई है। सुप्रीम कोर्ट के 1992 के फैसले के बाद, तमिलनाडु विधानसभा ने 1993 में अपने 69 प्रतिशत कोटे को किसी भी तरह के हस्तक्षेप से बचाने के लिए कानून पारित किया।
क्या आने वाले समय में बदलाव संभव है?
जाति जनगणना के ज़रिए अगर सरकारों के पास सटीक और व्यापक डेटा आता है, तो वे सुप्रीम कोर्ट में जाकर यह दलील दे सकती हैं कि देश की सामाजिक हकीकत बदल चुकी है और 50% की सीमा अब पर्याप्त नहीं है। लेकिन यह प्रक्रिया लंबी और न्यायिक समीक्षा से गुजरने वाली होगी।
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