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कैंसर पीड़ित बंसती ज़रूरतमंदों के लिए जी रहीं जिंदगी

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    बसंती गोप
    NIRAJ SINHA/BBC
    बसंती गोप

    निहायत साधारण परिवार की महिला बसंती गोप. उम्र 47 साल. पिछले दो साल से कैंसर से जूझती हुई. जुनून बस एकः जिंदगी जीना ग़रीब, बेबस, रोगी, लाचार, असहाय बच्चों और लावारिसों के लिए.

    इस मुहिम में वो दिन-रात का फ़र्क और तमाम किस्म की अड़चनें और ताने की कभी परवाह नहीं करतीं. ज़हन में यह भी नहीं आता कि सुर्खियां मिले या कोई उनकी वाहवाही करे.

    झारखंड में चाईबासा के बरकंदास टोली की रहने वाली यह महिला पूरे देश में सर्वश्रेष्ठ पैरा लीगल वॉलेंटियर चुनी गई हैं. पिछले नौ नवंबर को दिल्ली में उन्हें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने इस सम्मान से नवाज़ा.

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    बसंती गोप
    NIRAJ SINHA/BBC
    बसंती गोप

    19 सालों से मुहिम

    बसंती गोप चाईबासा लौटीं, तो सबसे पहले बेटियां- पूजा और सुमन से पूछा कि उनकी सेवा के लायक कोई मामला सामने आया है क्या.

    साथ ही पांच साल की बच्ची सपना को सीने से लगाया. नवजात के तौर पर लावारिस हाल में सड़क किनारे पड़ी इस बच्ची का बसंती ने कई दिनों तक इलाज कराया और अब तीसरी बेटी के तौर पर पाल रही हैं.

    बसंती बताती हैं कि सपना के लिए उन्होंने पेट काटकर बीमा कराया है, साल में नौ हज़ार रुपये प्रीमियम भरती हैं ताकि भविष्य में किसी तकलीफ़ का सामना नहीं करना पड़े.

    पिछले 19 साल से ये महिला चाईबासा के सुदूर आदिवासी इलाकों और शहरी क्षेत्र की बस्तियों और तंग मोहल्लों में आदिवासी महिलाओं, बच्चों, कुष्ठ-मानसिक रोगियों और फुटपाथ पर रहने वाले असहायों की मदद करती रही हैं. साथ ही क़ानूनी जागरूकता अभियान चलाती हैं.

    साल 2005 में चाईबासा ज़िला विधिक सेवा प्राधिकार में उनका चयन पैरा लीगल वॉलंटियर के रूप में हुआ. इसके बाद उनकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा बढ़ गई.

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    बसंती गोप
    NIRAJ SINHA/BBC
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    वॉलंटियर की अहम भूमिका

    चाईबासा ज़िला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव केके मिश्रा बताते हैं कि आदिवासी इलाकों में डायन हत्या, मानव तस्करी, नशापान से तंग होते घर-परिवार, घरेलू हिंसा, बाल श्रम जैसे मामलों के बीच इन वॉलंटियर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है.

    इन वॉलंटियरों को बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाता है. तब ये डोर टू डोर अभियान के साथ कैंप लगाकर लोगों की सहायता करती हैं. कई मौके पर पीड़ितों को क़ानूनी सहायता के लिए प्राधिकार की तरफ़ से वकील भी मुहैया कराए जाते हैं.

    प्राधिकार के कामों से पता चला कि देश में क़रीब अस्सी हज़ार वॉलंटियर हैं और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकार ने न्यायिक मशीनरी के लिए उन्हें देवदूत की संज्ञा दी है.

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    बसंती गोप
    NIRAJ SINHA/BBC
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    ग़रीबी- तकलीफ़ की पीड़ा

    मैट्रिक पास बसंती पिछड़ी जाति से आती हैं. वो बताती हैं कि घर की माली हालत कभी अच्छी नहीं रही. ग़रीबी और तकलीफों का मर्म वो खूब जानती हैं. तब लगता है कि दूसरों के दुख-मुसीबत में काम आना ही इंसानियत है.

    बसंती सवाल करती हैं- लावारिस हाल में पड़ी लाश को उठाना या पुलिस से कहकर उठवाना, देर रात किसी ग़रीब गर्भवती को अस्पताल पहुंचाना, बेबस मानसिक रोगियों की पहचान कर, ओझा गुनी-झाड़-फूंक के फ़रेब से निकालकर अस्पताल पहुंचाना बस इतना ही तो काम है. अब इसके लिए कुछ महिलाएं छी-छी कर ताने मारती रहें, उन्हें परवाह नहीं.

    चाईबासा ज़िला विधिक सेवा प्राधिकार के सचिव केके मिश्रा बताते हैं कि बसंती, चाईबासा इलाके में 'मदर टेरेसा' के नाम से जानी जाती हैं. सैकड़ों लावारिस लाशों का उन्होंने दाह संस्कार कराया है. यही काम उन्हें भीड़ में अलग करता है.

    लेकिन बसंती का बड़प्पन कहिए कि उनका ज़ोर इस पर है कि मदर अद्भुत और एक थी. वो बस मामूली इंसान हैं.

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    बसंती गोप
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    रात्रि पाठशाला और कुष्ठ रोगी

    बसंती बताती हैं कि आदिवासी महिलाओं और बच्चों के बीच रात्रि पाठशाला और कुष्ठ रोगियों की सेवा से उन्होंने अपनी मुहिम शुरू की थी. ठंड में ग़रीबों के लिए घर-दुकान जाकर कपड़े इकट्ठे करना और बांटना वो नहीं भूलतीं.

    प्रताड़ित महिलाओं को साहस दिलाना तथा काउंसिलिंग करना-कराना भी उनकी दिनचर्या में शामिल है.

    गांवों में पड़े बेबस मानसिक रोगियों को खोज-खोजकर वो रांची मानसिक आरोग्यशाला में ले जाती हैं. उनका कहना था कि महिला मानसिक रोगी को अस्पताल पहुंचाना, भर्ती कराना तथा वापस घर लाना कठिन काम है. लेकिन वो पीछे नहीं हटतीं.

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    बसंती गोप
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    बसंती गोप

    घर-परिवार का साथ

    इसी कड़ी में आदिवासी महिला रोबारी पूर्ति कहती हैं कि दीदी ने उनकी ज़िंदगी बदल दी. अब वो कमाने भी लगी हैं.

    उनके पति दिलीप कुमार गोप ने इन कामों के लिए उन्हें कभी हतोत्साहित नहीं किया. पति पहले भुजिया-दालमोट बनाने वाले के यहां काम करते थे. फिर अपना ही छोटा-सा कारोबार शुरू किया. अब यह काम उनका बेटा संभाल रहा है.

    बकौल बसंती शुरुआती दिनों में दोनों बेटी पूजा और सुमन इन कामों की वजह से अक्सर नाराज होती थीं. लेकिन कॉलेज में पढ़ाई के साथ उनकी समझदारी बढ़ी और वे दोनों भी पैरा लीगल वॉलंटियर के तौर पर काम करने लगी हैं.

    वो बताती हैं कि साल भर से इस काम में चार हज़ार रुपये मिलने भी लगे हैं, वरना वो दौर और दिन नहीं भूल सकतीं जब बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, मालगाड़ी पर सवार होकर या कई मील पैदल चलकर सुदूर इलाकों में जाती थीं.

    बसंती की बेटी पूजा और सुमन एक स्वर में कहती हैं उन्हें अपनी मां पर नाज़ है. पूजा को डायन प्रथा और नशा से बर्बाद होते घर-परिवार के मामले बेहद आहत करते हैं. इसलिए उन लोगों ने जागरूकता के लिए इप्टा के बैनर तले नाटक मंडली का भी गठन किया है.

    चाईबासा विधिक सेवा प्राधिकार के अध्यक्ष, ज़िले के प्रधान न्यायाधीश महेंद्र कवि कहते हैं कि बसंती ने ज़िले के साथ देश का मान बढ़ाया है. बेशक वो संघर्षशील और खुले ख़्यालों की महिला है.

    चाईबासा की एक अन्य पीएलवी सुजाता गोप कहती हैं कि बसंती दीदी जिन राहों से गुजरते हुए यह सब करती हैं, वो सबके लिए मुमकिन नहीं.

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    पिछले साल स्तन कैंसर की चपेट में आने के बाद भी इस महिला ने हिम्मत नहीं हारी. वो बताती हैं कि कोलकाता में इलाज चल रहा है. पहले से बेहतर स्थिति है.

    उनका कहना है कि प्रशासन तथा स्वयं सहायता समूहों की तरफ से आर्थिक मदद भी मिलती रही है. इस हालात में अपनी जिम्मेदारियों को छोड़ने का जी नहीं करता, इस पर वो कहती हैं कि 'लगता है कि यह जंग भी जीत लूंगी. सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ा है. हिम्मत हमारी और दुआएं और उन गरीबों, बेबसों और आप सबों की.'

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    BBC Hindi
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    English summary
    Cancer survivor living life for the needy

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