CAG की रिपोर्ट में खुलासा, 2.5 लाख करोड़ खर्च के बाद भी नहीं बढ़ सकी ट्रेनों की रफ्तार
नई दिल्ली, 18 अप्रैल। भारतीय रेल अपनी लेट-लतीफी के लिए जानी जाती है। इस समस्या का समाधान करने के लिए भारतीय रेल ने 2.5 लाख करोड़ रुपए पिछले एक दशक के समय में खर्च किए, जिससे कि रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर किया जा सके। 2016-17 में मिशन रफ्तार के तहत ट्रेनों की रफ्तार को बेहतर करने के लिए इसकी शुरुआत की गई थी। लेकिन सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया है कि भारतीय रेल ना तो ट्रेनों की रफ्तार को बढ़ाने में सफल हुआ है और ना ही ट्रेनों को सही समय पर इसके गंतव्य स्थान तक पहुंचाने में सफल रहा है।

सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा
सीएजी ने संसद में बजट सत्र के दौरान जो ऑडिट रिपोर्ट पेश की है उसके अनुसार रेलवे ट्रेनों के संचालन को सही समय पर करने में विफल रहा है। मिशन रफ्तार के तहत रेलवे ट्रेन की रफ्तार को 50 किलोमीटर प्रति घंटे से बढ़ाकर 75 किलोमीटर प्रति घंटे तक करना चाहती थी। वहीं मालगाड़ी की रफ्तार को 25 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ाकर 50 किलोमीटर प्रति घंटा तक करने की लक्ष्य था। इस लक्ष्य को 2021-22 तक पूरा करना था।

रफ्तार जस की तस
सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार मालगाड़ी ट्रेन की रफ्तार तमाम कोशिशों के बाद भी 23.6 किलोमीटर प्रति घंटा तक ही रह सकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019-20 तक मेल और एक्सप्रेस ट्रेन की औसत रफ्तार 50.6 किलोमीटर प्रति घंटा रही जबकि मालगाड़ी की रफ्तार 23.6 किलोमीटर प्रति घंटा रही है। रेलवे मंत्रालय के अनुसार ट्रेनों में यात्रियों की बढ़ती संख्या की वजह से ट्रेनों की रफ्तार पर दबाव बढ़ रहा है।

क्या है रेलवे का जवाब
सीएजी की रिपोर्ट के जवाब में रेल मंत्रालय ने कहा है कि यात्री सेवाओं में लगातार काफी तेजी से वृद्धि हो रही है। भारतीय रेल ने हर साल औसत रूप से 200 ट्रेनों की शुरुआत की है। ऐसे में बुनियादी ढांचों में वृद्धि के बिना ट्रेनों की रफ्तार को और बेहतर नहीं किया जा सकता है। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रेनों की धीमी रफ्तार बड़ी चिंता का विषय है। अगर इस समस्या का समाधान नहीं किया गया तो रेलवे को वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।












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