जानिए क्या है तेलंगाना का सच जिसे केन्द्र सरकार की मिली हरी झंडी?
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सरकारी आवास 7, रेस कोर्स पर दो घंटे चली बैठक में विधेयक को मंजूरी दी गई। यह विधेयक देश के 29वें राज्य के रूप में तेलंगाना के गठन से संबंधित है। तेलंगाना में आंध्र प्रदेश के 10 जिले शामिल होंगे और हैदराबाद इसकी राजधानी होगी।
आईये जानते हैं कि क्या है तेलंगाना?
अभी जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जाता है, उसमें आंध्र प्रदेश के 23 ज़िलों में से 10 जिले आते हैं। मूल रूप से ये निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा था। इस क्षेत्र से आंध्र प्रदेश की 294 में से 119 विधानसभा सीटें आती हैं।
तेलंगाना आंध्र का हिस्सा कब बना?
1948 में भारत ने निजाम की रियासत का अंत कर दिया और हैदराबाद राज्य का गठन किया गया। 1956 में हैदराबाद का हिस्सा रहे तेलंगाना को नवगठित आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया। निजाम के शासनाधीन रहे कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए। भाषा के आधार पर गठित होने वाला आंध्र प्रदेश पहला राज्य था।
तेलंगाना आंदोलन कब शुरू हुआ?
चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया कि अगुवाई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरूआत की थी। उस समय इस आंदोलन का उद्देश्य था भूमिहीनों कों भूपति बनाना। छह सालों तक यह आंदोलन चला लेकिन बाद में इसकी कमर टूट गई और इसकी कमान नक्सलवादियों के हाथ में आ गई।
आज भी इस इलाक़े में नक्सलवादी सक्रिय हैं। 1969 में तेलंगाना आंदोलन फिर शुरू हुआ था। दरअसल दोनों इलाक़ों में भारी असमानता है। आंध्र मद्रास प्रेसेडेंसी का हिस्सा था और वहाँ शिक्षा और विकास का स्तर काफ़ी ऊँचा था जबकि तेलंगाना इन मामलों में पिछड़ा है।
तेलंगाना क्षेत्र के लोगों ने आंध्र में विलय का विरोध किया था। उन्हें डर था कि वो नौकरियों के मामले में पिछड़ जाएंगे। अब भी दोनों क्षेत्र में ये अंतर बना हुआ है। साथ ही सांस्कृतिक रूप से भी दोनों क्षेत्रों में अंतर है। तेलंगाना पर उत्तर भारत का खासा असर है।
1969 में क्या हुआ था?
शुरुआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था लेकिन इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। इस आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठी चार्ज में साढे़ तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे।
उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का केंद्र था। उस दौरान एम चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा उछाला था लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना प्रजा राज्यम पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया। इससे आंदोलन को भारी झटका लगा। इसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया था। 1971 में नरसिंह राव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था क्योंकि वे तेलंगाना क्षेत्र के थे।
के चंद्रशेखर राव की क्या भूमिका है?
नब्बे के दशक में के चंद्रशेखर राव तेलुगु देशम पार्टी के हिस्सा हुआ करते थे। 1999 के चुनावों के बाद चंद्रशेखर राव को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री बनाया जाएगा लेकिन उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया गया। साल 2001 में उन्होंने पृथक तेलंगाना का मुद्दा उठाते हुए तेलुगु देशम पार्टी छोड़ दी और तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर दिया।
2004 में वाई एस राजशेखर रेड्डी ने चंद्रशेखर राव से हाथ मिला लिया और पृथक तेलंगाना राज्य का वादा किया लेकिन बाद में उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति के विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया और चंद्रशेखर राव ने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया था।
लेकिन अब भी तेलंगाना बनना मुश्किल
अब विधेयक को संसद को अग्रसारित करने का आग्रह करते हुए फिर से राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। सूत्रों ने कहा कि विधेयक संभवत: 12 फरवरी को राज्यसभा में पेश किया जाएगा। उधर 5 फरवरी से शुरू संसद के सत्र में तेलंगाना मुद्दे पर व्यवधान जारी है। सीमांध्र (रायल सीमा और तटीय आंध्र) व तेलंगाना के सदस्यों के हंगामे के कारण सदन के कामकाज पर बुरा असर पड़ रहा है।
शुक्रवार को भी संसद में तेलंगाना मुद्दे पर व्यवधान पड़ा। दोनों सदनों का कामकाज बार-बार स्थगित किया गया।तेलंगाना का विरोध करते हुए लोकसभा में आंध्र प्रदेश के एक सांसद सहित तीन अविश्वास प्रस्ताव पेश किए गए। लोकसभा में प्रश्नकाल सीमांध्र के सदस्यों की नारेबाजी और हंगामे की भेंट चढ़ गया।













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