Bhavani Devi: पुजारी की बेटी जिसने ओलंपिक क्वालीफाई कर रचा इतिहास, ट्रेनिंग के लिए मां ने गिरवी रखे थे गहने
नई दिल्ली। तलवारबाजी ऐसा खेल है जो ओलंपिक खेलों की शुरुआत के साथ ही इसका हिस्सा बन गया लेकिन 125 सालों तक कोई भारतीय इसके लिए क्वालीफाई तक नहीं कर पाया था। अब भारत की बेटी भवानी ने ये करिश्मा कर दिखाया है। भवानी देवी टोक्यो ओलंपिक में क्वालीफाई करने के साथ ही ओलंपिक में जगह बनाने वाली पहली भारतीय तलवारबाज बन गई हैं।

पुजारी के घर में जन्मी भवानी
तमिलनाडु के चेन्नई में 27 अगस्त 1993 को एक पुजारी सी सुंदररमन के घर में बेटी हुई तो उन्होंने देवी के सम्मान में बेटी का नाम भवानी देवी रखा, शायद इस उम्मीद में कि वह बेटी आगे चलकर देवी जैसा ही कुछ करेगी। आज वह भवानी वास्तव में पूरे देश की भवानी बन गई है। भवानी देवी का पूरा नाम चदलवदा आनंद सुंदररमन भवानी देवी है। दोस्त और जानने वाले सीए भवानी देवी कहकर बुलाते हैं। ओलंपिक में क्वालीफाई करने के बाद आज पूरे देश में 27 वर्षीय भवानी देवी के नाम की चर्चा है लेकिन उनकी यहां तक का सफर बहुत आसान नहीं रहा है। निम्न मध्यवर्गीय परिवार से चलकर इस मुकाम तक पहुंचने वाली भवानी देवी की तैयारी के लिए उनकी मां ने अपने गहने तक गिरवी रख दिए थे।

मां ने ट्रेनिंग के लिए गिरवी रखे गहने
भवानी देवी इसके लिए अपने परिवार का शुक्रिया अदा करना नहीं भूलतीं। टाइम्स ऑफ इंडिया से बात में उन्होंने कहा कि वह जो भी हैं परिवार की बदौलत हैं। उन्होंने कहा "मेरी मां ने मेरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने गहने तक गिरवी रख दिए। लोगों से उधार लेकर मुझे प्रतियोगिता में हिस्सा लेने भेजा।"
भवानी देवी को जब इतनी बड़ी सफलता मिली है तो उन्हें खुशी के साथ ही अपने पिता के इस अवसर पर साथ नहीं होने का बहुत दुख है। भवानी देवी के पिता की 2019 में मौत हो गई थी।

मजबूरी में चुनी थी तलवारबाजी
भवानी देवी के जीवन में तलवारबाजी बस अचानक ही आई थी। साल था 2004 और वह स्कूल बदलकर छठीं कक्षा में पहुंची थीं। यहां उन्हें कोई एक खेल चुनना था और जब तक वह किसी नतीजे पर पहुंचती, बाकी के सभी खेलों में सीट फुल हो चुकी थी। आखिर में भवानी देवी के पास तलवारबाजी को चुनने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। वह कहती हैं कि उसके पहले उन्होंने इसका नाम भी नहीं सुना था लेकिन जब उन्होंने तलवार पकड़ी तो उन्हें खूब पसंद आई।
उनके जीवन में पहला बड़ा मौका तब आया जब तीन साल बाद स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साइ) के कोच सागर लागू की नजर उन पर पड़ी और उन्हें केरल के थलास्सेरी स्थित साई एकेडमी में ट्रेनिंग के लिए आमंत्रित किया। थलास्सेरी स्थित साई की एकेडमी देश में उन गिने-चुने संस्थानों में है जहां पर तलवारबाजी की ट्रेनिंग दी जाती है। हाईस्कूल की परीक्षा देने के बाद भवानी देवी ने साई एकेडमी ज्वाइन कर ली।

पहले अंतरराष्ट्रीय दौरे में ब्लैक कार्ड
पहली बार तलवारबाजी चुनने की तरह इस खेल का पहला अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी उनके लिए अच्छा नहीं रहा था। तुर्की में अपने पहले ही अंतरराष्ट्रीय दौरे में उन्हें तीन मिनट लेट पहुंचने की वजह से रेफरी ने ब्लैक कार्ड दिखा दिया था। ये तलवारबाजी में दी जाने वाली सबसे बड़ी सजा है और इसके चलते उन्हें टूर्नामेंट से बाहर होना पड़ा था।
भारत जैसे देश में जहां पर यह खेल बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं है उसमें ट्रेनिंग और तैयारी भी काफी मुश्किल काम था। खासतौर पर जब न तो इसके ज्यादा टूर्नामेंट होते हैं और न ही अच्छे कोच और खेल की बारीकियां समझने वाले विशेषज्ञ ही मौजूद हैं।

ओलंपिक क्वालीफाई के अलावा ये रिकॉर्ड भी नाम
भवानी देवी न केवल ओलंपिक में क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय तलवारबाज (फेंसर) हैं बल्कि उन्हें इस खेल में कई और रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं। वह पहली भारतीय हैं जिसने फिलीपींस में आयोजित एशियन चैंपियनशिप 2014 में अंडर 23 कैटेगरी में सिल्वर मेडल जीता था। साथ ही वह 2019 में कैनबरा में आयोजित सीनियर कॉमनवेल्थ फेंसिंग चैंम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय बनीं।
इसकी शुरुआत हुई थी 2009 में जब भवानी ने मलेशिया में आयोजित राष्ट्रमंडल चैम्पियनशिप में कांस्य जीता। इसके बाद उन्होंने 2010 इंटरनेशनल ओपन, 2010 कैडेट एशियन चैम्पियनशिप, 2012 कॉमनवेल्थ चैंपियनशिप, 2015 अंडर -23 एशियाई चैम्पियनशिप और 2015 फ्लेमिश ओपन में कांस्य पदक जीतकर उभरती भारतीय खिलाड़ी बनी।

जब इस खेल को छोड़ने का बना लिया था मन
लेकिन उनकी जिंदगी में एक मौका ऐसा भी आया जब उन्होंने तलवारबाजी को अलविदा कहने का मन बना लिया था। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा "मेरे परिवार ने बहुत पैसा खर्च किया था। बहुत सारे बिजनेस से जुड़े लोग भी थे जो मुझे स्पॉन्सर करने के लिए आगे थे लेकिन फिर भी इसके लिए जरूरी उपकरण और खर्च बहुत महंगे थे और मैं इन चीजों का इंतजाम करते-करते थक चुकी थी। 2013 में मेरे मन में इसे छोड़ने का विचार आने लगा था।"
यही समय था जब वह गो स्पोर्ट्स फाउंडेशन स्कॉलरशिप प्रोग्राम के लिए चुनी गईं और फिर उनकी सारी मुश्किलें आसान हो चुकी थीं। 2016 में वह इटली शिफ्ट हो गईं और तलवारबाजी के नए अध्याय के लिए खुद को तैयार करना शुरू कर दिया। एक ऐसे खेल के बारे में जिसे चुनते वक्त वह इसके बारे में कुछ नहीं जानती थीं आज इससे पूरी तरह प्यार है। वह कहती हैं "मैं तलवार, जैकेट और मास्क से प्यार करती हूं।"












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