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अस्पताल में भर्ती किए जाने से पहले मरीज को बताएं कि कितना खर्च होगा- कोर्ट

By Ankur Singh
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    मुंबई। बॉबे हाई कोर्ट ने बुधवार को तमाम प्राइवेट अस्पतालों को सुझाव दिया है कि वह मरीज को भर्ती करने से पहले उनसे उनकी आर्थिक स्थिति के बारे में बात करें और उन्हें इस बात की जानकारी दें कि इलाज के दौरान उनका कितना खर्च आएगा। ऐसा करने से पैसों के भुगतान के समय मरीजों को होने वाली दिक्कत कम हो सकती है और विवाद से भी बचा जा सकता है, कोर्ट ने कहा है कि यह बात इमरजेंसी में भर्ती किए गए मरीजों पर लागू नहीं होगी।

    संबंध नहीं बिगड़ेगा

    संबंध नहीं बिगड़ेगा

    डिविजन बेंच जस्टिस नरेश पाटिल व जस्टिस सांबरे ने कहा कि यह एक संवेदनशील मुद्दा है लेकिन इसका कुछ समाधान जरूर होना चाहिए। अगर यह तरीका अपनाया जाता है तो शुरुआती चरण में ही कुछ फिल्टर लगाया जा सकता है जिससे की मरीजों के परिजनों को दिक्कत नहीं हो। इससे ना सिर्फ मरीज बल्कि अस्पताल को भी सहूलियत होगी, साथ ही मरीज और अस्पताल के बीच संबंध भी नहीं बिगड़ेगा।

    मरीजों को इंश्योंरेंस क्यों नहीं दे सकते

    मरीजों को इंश्योंरेंस क्यों नहीं दे सकते

    इसके अलावा कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया है कि एसोसिएशन ऑफ हॉस्पिटल एंड मैनेजमेंट इंश्योरेंस कंपनियों को इस तरह की नीतियों के साथ सामने आना चाहिए जोकि मरीजों के हित में हो। जिस तरह से हम 15 दिन या एक महीने का ट्रैवेल इंश्योरेंस लेते हैं उसी तरह से हम मरीजों को अस्पताल में भर्ती होते समय मरीज के हालात को देखते हुए इंश्योरेंस क्यों नहीं मुहैया करा सकते हैं, ऐसा करने से मरीजों को काफी सहूलियत हो सकती है।

    सरकार ने दिया जवाब

    सरकार ने दिया जवाब

    एडवोकेट मनकुवर देशमुख जोकि राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में पेश हुए उन्होंने कहा कि इस बाबत सरकार ने विधेयक तैयार कर लिया है और जल्द ही इसे फाइनल कर लिया जाएगा। इसपर कोर्ट ने कहा कि इस मसले पर सभी पक्षकारों को साथ आना चाहिए और आपसी सहमति के बाद ही इसे पास किया जाना चाहिए। कोर्ट ने स्वास्थ्य सेवा के डायरेक्टर को निर्देश दिया है कि वह अगले महीने तक इसपर अपना जवाब दे कि वह अस्पतालों में मरीजों के इलाज के दौरान खर्च को किस तरह से वह नियोजित करेगी।

    याचिका में लगाया गया आरोप

    याचिका में लगाया गया आरोप

    कोर्ट ने यह सुझाव उस वक्त दिया जब वह एक पीआईएल पर सुनवाई कर रही थी, इस पीआईएल में कहा गया था कि इलाज के दौरान जानबूझकर मरीज का अस्पताल में बिल बढ़ाया जाता है और मरीजों को बिना फीस का भुगतान किए जाने नहीं दिया जाता है। कुर्ला में रहने वाले 54 वर्षीय ट्रेवर बिट्टो ने आरोप लगाया था कि प्राचीन हेल्थकेयर मल्टी हॉस्पिटल ने उनके घायल बस ड्राइवर चंद्रकांत पवार को डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा एक और याचिका कोर्ट में दायर की गई थी थी जिसमे कहा गया था कि अस्पताल ने उनके भाई डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया था क्योंकि वह अस्पताल की 1.80 लाख रुपए की फीस नहीं दे सके। दोनों ही अस्पतालों ने आरोपों से इनकार किया है।

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    English summary
    Bombay high court suggests hospitals to discuss the fees and expanses before admitting the patient. Court says there should be insurance policy.

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