नज़रिया: गांधी की बनियागिरी जिसने देश को एक सूत्र में पिरोया
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने एक सांगठनिक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी को 'चतुर बनिया' कहा। बेशक ये उन तमाम लोगों के लिए दुखदायी रहा जिन्होंने कभी अपने बापू की जाति जानने की इच्छा नहीं रखी, ना ही उन्होंने कभी किसी से यह पूछा कि बापू की जाति क्या है?
लगभग देश के बच्चे बच्चे को इस बात की जानकारी है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देश को एक चरखा दिया, जिससे आज तमाम लोग अपना जीवन यापन कर रहे हैं। गांधी जी ने साल 1921 में मद्रास की एक सभा में कहा था कि ' चरखा इस बात की सबसे खरी कसौटी है कि हमने अहिंसा की भावना को कहां तक आत्मसात किया है। चरखा एक ऐसी चीज़ है जो हिन्दू और मुसलमानों को ही नहीं, बल्कि भारत में रहने वाले अन्य धर्मावलम्बियों को भी एक सूत्र में बांध देगा। चरखा भारतीय नारी के सतीत्व का प्रतीक है... हमने अछूत मानकर अभी तक जिनका तिरस्कार करने का पाप किया है, चरखा उनके लिए सांत्वना का स्रोत है।'
गांधी जी कहते थे 'तुम मेरे हाथ में खादी दो और मैं तुम्हारे हाथ में स्वराज्य रख दूंगा। अंत्यज्यों की तरक्की भी खादी के तहत आता है और हिन्दू-मुस्लिम एकता भी खादी के बल पर टिकी रहेगी। यह अमन की हिफाजत का भी जबरदस्त जरिया है।'
गांधी जी को चतुर बनिया कहने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जाति मुझे नहीं पता, ना ही मैं जानने का इच्छुक हूं लेकिन आज मैं उनके इस बयान को सच साबित करुंगा। गांधी जी, शाह वाले ' चतुर बनिया' थे या नहीं यह तो वही बता पाएंगे लेकिन वो बनिया थे इससे कोई इनकार नहीं कर सकता।
गांधी जी ऐसे बनिया थे, जिन्होंने सिर्फ अपना फायदा नहीं देखा। गांधी जी ऐसे बनिया थे जिन्होंने सिर्फ अपनी झोली भर लेना ही उचित नहीं समझा बल्कि आज उन्हीं के दम पर आप के पास कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और कच्छ रण से असम तक खादी इंडिया को वो बड़ी दुकानें और मॉल्स हैं जो सन् 47 से लेकर आज साल 2017 तक तमाम सरकारों को कमाई देती रही है।

तो वजह सिर्फ और सिर्फ गांधी जी...
सच कहना चाहे तो कह सकते हैं कि मौजूदा सरकार के पास अगर कहने और दिखाने को कुछ बड़ी उपलब्धि है तो वो सिर्फ और सिर्फ खादी इंडिया। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बूथ लेवल तक का कार्यकर्ता खादी पहनता है ये गांधी जी सरीखे बनिए की ही देन थी नहीं तो हमने कबका मुल्क कॉटन के हवाले बेंच दिया था। आज अगर खादी इंडिया के शो रूम्स के कोनों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के साथ-साथ भारत के तमाम तात्कालीन और मौजूदा राजनीतिक पुरोधाओं की तस्वीरों के साथ खादी पर उनके विचार लिखे हैं तो उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ गांधी जी हैं। (तस्वीर - राहुल सांकृत्यायन)

गांधी जी की बनियागिरी से पूरा देश उठा रहा लाभ
कुछ महीनों पहले खादी ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर और डायरियों पर पीएम मोदी की तस्वीर प्रकाशित की गई थी। जब विवाद बढ़ा तो आयोग ने एक प्रेस विज्ञप्ति के जरिए बताया था कि साल 1996, साल 2002, साल 2005, साल 2011, साल 2013 और साल 2016 मे डायरी और कैलेंडर पर गांधी जी की तस्वीर नहीं थी। तो अब यह बात पक्की हो गई गांधी जी वो बनिया हैं जिनकी दुकान से वो भले ना फायदा उठा सके हों लेकिन आज के लोग उनकी दुकान पर अपनी तस्वीर चस्पा कर, अपनी पब्लिसिटी कर रहे हैं। जिस गांधी जी को शाह ने बनिया कहा है, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि मौजूदा समय में भाजपा अपनी दुकान चमकाने के लिए उन्हीं का सहारा ले रही है। (तस्वीर राहुल सांकृत्यायन)

गांधी की बनियागिरी से करोड़ों का लाभ
आइए अब कुछ आंकड़ों की बात कर लेते हैं कि गांधी जी के 'बनियागिरी' की वजह से इस सरकार को कितना फायदा हुआ है। अंग्रेजी अखबार इकॉनमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय वर्ष 2015-16 में 1,510 करोड़ रुपये के खादी उत्पादों की बिक्री हुई, वहीं साल 2014-15 में यह बिक्री सिर्फ 1,170 करोड़ रुपये की थी। खादी आयोग ने साल 2018 में 5,000 करोड़ रुपये की बिक्री का टारगेट तय किया है। शाह ने यह तो बता दिया की गांधी बनिया थे लेकिन यह नहीं बताया कि प्रधानमंत्री से लेकर बूथ स्तर तक का कार्यकर्ता भी गांधी की ही बनियागिरी का लाभ उठा रहा है।

गांधी जी ने दिया देश को स्वावलंबी बनाने का रास्ता
एक अंग्रेजी अखबार के लिए लिखे लेख में सूक्ष्म, लघु एवं मंझोले उपक्रम मंत्रालय (एमएसएमई) मंत्री कलराज मिश्र ने कहा है कि खादी के जरिए साल 2016-17 में 1600 करोड़ रुपए की आमदनी हुई और 11 लाख लोगों को रोजगार मिला। अब यह आपको तय करना है कि आप गांधी जी को शाह के बताए नजरिए से देखना चाहते हैं या फिर उनके कर्मों के जरिए से। गांधी जी ने देश को स्वावलंबी बनाने का जो रास्ता दिया वो हमारे गांवों से गुजर कर जाता है।

शाह जी आपका शुक्रिया...
शाह हों या फिर कोई बड़ा नेता उसे इस बात का घमंड कतई नहीं करना चाहिए कि वो आज जहां हैं वहां कल कोई नहीं था। गांधी जी ने कभी किसी की जाति, धर्म , संप्रदाय नहीं देखा। आपने बताया इसका शुक्रिया। बाकी एक बात और कि शाह गुजराती हैं। संस्कृत को 'संस्क्रुत', गृह और 'ग्रुह' और हृदय को 'ह्रुदय' कहना उनकी बचपन से आदत। उनकी बात का बुरा मत मानिए। गांधी जी ने देश को सिर्फ गांधीगिरी नहीं सिखाई बल्कि बनियागिरी भी सिखाई, जिनकी दुकान पर आकर लोग अपना प्रमोशन करना चाहते हैं।












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