नृपेंद्र मिश्र नियुक्त‍ि: क्या 'चहेते' अफसर के लिए बदला गया कानून?

BJP-NRIPENDRA-MISHRA
नई दिल्ली। एक ओर जहां समूच विपक्ष नरेंद्र मोदी के पीछे सत्ता में आने के बाद से ही पड़ा है और अब नई सरकार ने एक खुला मौका दे दिया है। नरेंद्र मोदी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी नृपेंद्र मिश्र की नियुक्ति से जुड़े बिल को लेकर कांग्रेस अब सरकार को घेरने के मूड में आ चुकी है।

लोकसभा में तो पासा सरकार के पास ही है, पर राज्य सभा में भाजपा को पापड़ बेलने पड़ सकते हैं। कांग्रेस ने मिश्र की नियुक्ति से जुड़े बिल का सदन में पुरजोर विरोध करने का प्लान बना लिया है।

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सरकार ने शुक्रवार को इससे जुड़ा बिल लोकसभा में पेश किया, जहां कांग्रेस समेत टीएससी ने इसका विरोध किया। टीएमसी के सौगत राय ने तो बाकायदा इसकी वैधानिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस मान रही है कि लोकसभा में कम नंबर होने के नाते वह कुछ खास नहीं कर पाएगी, लेकिन राज्य सभा में रोड़े अटका सकती है।

इस मामले को लेकर वह जेडीयू, जेएमएस समेत दूसरे और दलों से भी बात कर सकती है। कांग्रेस की योजना इस बिल को लेकर जहां एक ओर सरकार के लिए सदन में असहज हालात पैदा करना है। लोकसभा में कांग्रेस के 44 समेत यूपीए के 60 और टीएमसी के 34 मेंबर्स हैं। दूसरी ओर 250 सदस्यीय राज्य सभा में कांग्रेस के 68, टीएमसी के 12, लेफ्ट के 11 मेंबर्स हैं।

दरअसल 1967 बैच के आईएएस अफसर नृपेंद्र मिश्र की प्रिंसिपल सेक्रेटरी के तौर पर नियुक्ति में आने वाले अवरोध को दूर करने के लिए पहले ऑर्डिनेंस जारी किया गया था। ट्राई कानून के अनुसार इसके अध्यक्ष और मेंबरों के रिटायर होने के बाद केंद्र या राज्य सरकारों में किसी पद पर नियुक्ति प्रतिबंधित थी। हालांकि विवाद भले ही खड़ा किया जा रहा हो पर कांग्रेस जब खुद सत्ता में थी, उसने कई बार इसी तरह बिल-अध्यादेशों के ज़रिए विपक्ष की मांगें ठुकराईं हैं।

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