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बिहार: कौन कर रहा है सरकारी स्कूलों को बदहाल?

बिहार, शिक्षा
Neeraj Priyadarshy/BBC
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क्या आपका बच्चा बिहार सरकार के स्कूल में पढ़ता है? क्या आपको पता है कि प्राइवेट स्कूलों की तरह यहां के सरकारी स्कूलों में होमवर्क दिए जाने की कोई परंपरा नहीं है?

क्या आप जानते हैं कि बिहार के ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में बिजली का कनेक्शन नहीं है, पंखे नहीं हैं? बच्चे अब भी ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई करते हैं?

बिहार में 52 बच्चों के लिए एक शिक्षक है जबकि तय मानक के अनुसार 40 बच्चों पर एक शिक्षक होना चाहिए. मगर बिहार में कहीं 990 छात्रों को पढ़ाने के लिए तीन शिक्षक तो कहीं 10 छात्रों के लिए 13 हैं.

बिहार सरकार के सभी स्कूल नेतरहाट विद्यालय के मॉडल पर बने सिमुलतला जैसे क्यों नहीं हैं जिसे अच्छी पढ़ाई के कारण टॉपर गढ़ने की मशीन कहा जाना लगे है?

अगर इन सवालों के जवाब 'हां' में हैं तो मुमकिन है कि कुछ सवाल आपको यक़ीनन परेशान करते होंगे. जैसे स्कूल ड्रेस, मिडडे मील और छात्रवृति के बीच स्कूल की पढ़ाई कहां गुम होकर रह गई है?

वैसे इन दिनों बिहार की स्कूली शिक्षा को लेकर ये अहम सवाल नहीं बल्कि तीन और बातें चल रही हैं.

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पहली बात

'समान काम के बदले समान वेतन' की मांग कर रहे राज्य के क़रीब 3.56 लाख शिक्षक आंदोलन पर हैं.

अपनी मांगों के समर्थन में चरणबद्ध तरीके से राज्यव्यापी प्रदर्शन कर रहे हैं. आगामी पांच सितंबर यानी शिक्षक दिवस को पटना के गांधी मैदान में वे काली पट्टी बांधकर 'वेदना प्रदर्शन' करेंगे.

दूसरी बात

इन्हीं नियोजित शिक्षकों में से 74 हज़ार से ज़्यादा की नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज़ ग़ायब हैं और उन पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है.

नियोजन में हुए फर्ज़ीवाड़े की जांच कर रही निगरानी आयोग की टीम ने पिछले दिनों शिक्षा विभाग के साथ हुई मामले की समीक्षा जांच बैठक में स्पष्ट कह दिया है कि अगर अगली बार भी दस्तावेज़ नहीं उपलब्ध कराए गए तो विभाग और नियोजन इकाई के अधिकारियों समेत तमाम शिक्षकों पर केस दर्ज किया जाएगा.

तीसरी बात

बिहार सरकार ने एक बार फिर से क़रीब एक लाख शिक्षकों के नियोजन का नोटिफ़िकेशन निकाल दिया है.

जिसके मुताबिक़ साल के अंत तक नियोजिन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी. उपरोक्त तीनों बातें व्यवस्था की बातें हैं. सवाल है कि स्कूलों में क्या चल रहा है?

स्कूलों का हाल

पिछले महीने बिहार शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा बांका के मध्य विद्यालय, पिपरा का औचक निरीक्षण किया गया.

निरीक्षण के दौरान सभी शिक्षक-शिक्षिकाएं उपस्थित पाए गए लेकिन दो अध्यापक कथित तौर पर अपने-अपने वर्ग कक्ष के बाहर कुर्सी पर बैठकर मोबाइल इस्तेमाल करते पाए गए, जबकि कक्ष में उपस्थित छात्र-छात्राएं उनके पढ़ाने का इंतजार कर रहे थे.

दोनों शिक्षकों के खिलाफ़ विभाग ने अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा की है. इससे सम्बन्धित प्रतिवेदन की कॉपी सोशल मीडिया पर भी वायरल है.

इस तरह इन सभी बातों को मिलाकर बिहार की शिक्षा व्यवस्था का फिर से मज़ाक उड़ाया जा रहा है. सरकारी स्कूलों के मैनेजमेंट पर तो सवाल खड़े हो ही रहे हैं लेकिन सबसे अधिक सवालों के घेरे में शिक्षकों की भूमिका है.

एक ओर सभी नियोजित शिक्षक समान काम के बदले समान वेतन की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जांच में हजारों शिक्षकों का नियोजन फर्जी लग रहा है. शिक्षा विभाग द्वारा कराई जा रही विद्यालयों की बड़े स्तर पर औचक जांच में रोज़ाना शिक्षकों की गड़बड़ियां सामने आ रही हैं.

विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ तीन अगस्त को पटना जिले के 11 स्कूलों में औचक जांच कराई गई. जांच में 62 फ़ीसदी बच्चे अनुपस्थित मिले. इन स्कूलों में 51 शिक्षकों की पदस्थापना थी मगर मौजूद 40 शिक्षक ही थे. इनमें से भी छह शिक्षकों का कार्य संतोषजनक नहीं था.

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ड्रॉपआउट रेट

हाल ये है कि बिहार के सरकारी स्कूलों से लोगों का मोह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है. सबसे ख़राब हाल तो प्रारंभिक और माध्यमिक विद्यालयों का है, जहां नामांकन साल दर साल गिर रहा है. ड्रॉपआउट रेट में कोई कमी नहीं आ रही है.

पिछले ही साल की ही बात है जब बिहार सरकार के शिक्षा विभाग ने उन स्कूलों को बंद करने का निर्देश जारी किया था जहां नामांकन या तो शून्य या फिर 20 से कम पहुंच गया था.

'यू-डायस' के 2917-18 के आंकड़ो के मुताबिक़ शून्य नामांकन वाले स्कूलों की संख्या 13 है. जबकि 171 विद्यालयों में 20 से भी कम नामांकन है.

इसमें एक नया तथ्य यह जुड़ा है कि कई विद्यालयों में ऊंची कक्षाओं में ज्यादा नामांकन हैं और पहली कक्षा में नामांकन बहुत कम है. आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए थी कि प्रारंभिक कक्षाओं में नामांकन अधिक हो और ऊपर की कक्षाओं में कम.

आरा के पत्रकार भीम सिंह भवेश की एक रिपोर्ट के अनुसार भोजपुर के कई विद्यालयों में पहली और दूसरी कक्षा में नामांकित बच्चों की संख्या आठवीं के कुल नामांकन की 20 फ़ीसदी भी नहीं है. यह हाल केवल भोजपुर का ही नहीं बल्कि ज़्यादातर जिलों का है.

मतलब साफ़ है. सरकारी स्कूलों से बच्चे कम होते जा रहे हैं. सरकार इसे रोकने में नाकाम दिखती है.

पत्रकार भीम सिंह भवेश तो यहां तक कहते हैं, "बिहार में शिक्षा का निजीकरण हो रहा है. और सरकार की नाक के नीचे हो रहा है. नामांकन दर बढ़ाने के अभियान कागजों पर केवल दिखते हैं. अगर मध्याह्न भोजन, स्कूल ड्रेस, साइकिल और छात्रवृत्ति की राशि मिलनी बंद हो जाए तो सरकारी स्कूलों में कोई बच्चा पढ़ने ही नहीं आएगा."

आख़िर सरकारी विद्यालयों की ऐसी हालत क्यों हो गई है? क्यों लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते?

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ऐसे तमाम सवालों में से कुछ के जवाब हमें पटना राजभवन के कैंपस में स्थित मध्य बालिका विद्यालय में मिले.

ये वो विद्यालय है जो चुनाव के समय मुख्यमंत्री और राज्यपाल का वोटिंग बूथ भी बन जाता है.

यहां अशोक कुमार नाम के एक शिक्षक ने कहा, "देखिए, आप जो सब पूछ रहे हैं हमसे, उनका हम इसी तरह जवाब दे सकते हैं कि शिक्षा एक तिपाई व्यवस्था है. इसमें छात्र, अभिभावक और शिक्षक हैं. लेकिन बिहार की शिक्षा इस वक्त डेढ़ पाई पर चल रही है. शिक्षक हमारे पास कैसे हैं, ये किसी से छुपा नहीं रह गया. अभिभावकों की भूमिका आधी हो गई है क्योंकि वे आज के सबसे बड़े संकट ग़रीबी और बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं. बचे छात्र. तो वे भी क्या करेंगे? जब तक उनके अभिभावकों को लगता है कि सरकारी स्कूल में पढ़ाने फ़ायदा है, तब तक भेज रहे हैं, बच्चे थोड़ा भी बोझ बनेंगे तो उन्हें भी आग की भट्ठी में झोंक देंगे."

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ज़िम्मेदार कौन है?

अशोक कुमार बताते हैं कि विद्यालय की स्थापना राजभवन कैंपस में इसलिए हुई थी ताकि राजभवन के कर्मचारियों के बच्चे इसमें पढ़ सकें. लेकिन मौजूद समय में इसमें शायद ही राजभवन के किसी कर्मचारी का बेटा पढ़ता होगा.

उन्होंने बताया, "यहां के स्वीपर और चपरासी भी अपने बच्चों को अब प्राइवेट स्कूलों में ही भेजते हैं. ये बच्चे आस-पास के स्लम (झुग्गियों) से आते हैं. इससे बुरा क्या हो सकता है कि ख़ुद शिक्षक जिस स्कूल में पढ़ा रहे हैं, उसमें अपने बच्चों को नहीं पढ़ाना चाहते. "

राजभवन से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हज भवन के पीछे स्थित प्राथमिक विद्यालय की सचिव रुक्मिणी देवी कहती हैं, "इसकी ज़िम्मेदार सरकार भी है और शिक्षक भी. सरकार स्कूल चलाने में फ़ेल हो गई. ये शिक्षक भी तो उसी ने बनाए थे. सरकार के लोगों का जिसको मन उसको शिक्षक बना दिया. सरकार का काम बजट बनाना, पुल-पुलिया बनाना, रोड-रास्ता बनाना, स्कूल-कॉलेज बनाना है. सरकार शिक्षक नहीं बना सकती. सभी सरकारी कर्मी बनकर रह गए हैं."

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बजट और शिक्षा व्यवस्था

बिहार सरकार ने इस साल सबसे अधिक धन शिक्षा के मद में ही आवंटित किया है. राज्य सरकार की तरफ़ से सर्व शिक्षा अभियान के लिए 14,352 करोड़ और मध्याह्न भोजन के लिए 2,374 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.

आख़िर इतना पैसे खर्च करने के बावजूद भी हालात सुधर क्यों नहीं रहे?

इसका जवाब राजभवन वाले स्कूल के शिक्षक अशोक कुमार की एक बात से मिल रहा था. उन्होंने बताया कि उनके स्कूल के एक छात्र के पास अभी तक किताबें नहीं थीं.

उन्होंने बताया, "जब निरीक्षण करने अधिकारी आए थे तो उसने ख़ुद ही बता दिया था कि किताब खरीदने के लिए जो 300 रुपये उसके खाते में आए थे, उसके पिताजी ने निकाल कर मुर्गा खरीद लिया."

अभी तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया था कि किन शिक्षकों की वजह से शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगे हैं और क्या शिक्षा की बदहाली के ज़िम्मेदार वही हैं.

बिहार नियोजित शिक्षक संघ के प्रतिनिधि अमित विक्रम कहते हैं, "केवल कुछ लोगों की वजह से पूरे शिक्षक समुदाय को दोष देना ठीक नहीं है. जिन्होंने धांधली की है, वे जांच में पकड़े जाएंगे. सवाल उन्हीं पर उठे हैं जिनका नियोजन TET के पहले हुआ था. तब नियोजन इकाई पंचायतें हुआ करती थी. मुखिया और पंचायत सेवक की सिफ़ारिश और प्रमाण पत्रों की मेरिट के आधार पर केवल नियोजन होता था. जब से TET परीक्षा आ गई, नियोजन की प्रक्रिया भी बदल गई है. अब वही शिक्षक बन सकते हैं जिन्होंने प्रारंभिक स्तर पर TET और सेकेंडरी स्तर पर STET की परीक्षा पास की हो."

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शिक्षकों की बहाली

बिहार शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड्स के मुताबिक राज्य में कुल 4.40 लाख शिक्षक कार्यरत हैं.

प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में 3.19 लाख नियोजित शिक्षक हैं, 70000 नियमित शिक्षक. उच्च और उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में 37,000 नियोजित शिक्षक हैं और 7,000 नियोजित शिक्षक.

साल 2000 तक आख़िरी बार बीपीएससी द्वारा नियमित शिक्षकों की बहाली की गई थी. फिर नीतीश सरकार ने शिक्षामित्र बहाल किए. 2003 में पहली बार शिक्षकों का नियोजन हुआ.

भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर जारी किए जाने वाले देश भर के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों और छात्रों के डेटाबेस (U-DISE) के अनुसार बिहार में शिक्षक छात्र अनुपात 1:52 है, जबकि मानक रूप से 1:40 होना चाहिए. नई शिक्षा नीति के अनुसार यह घटाकर 35 कर दिया गया है. इस लिहाज से बिहार में अभी 1.25 लाख शिक्षकों की ज़रूरत है.

एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, "एजुकेशन सिस्टम में गड़बड़ी की शुरुआत यहीं से हुई. नियोजन की प्रक्रिया में कई ख़ामियां थीं. मुखिया, सरपंच, सचिव मिलकर शिक्षक बना रहे थे. जो जिसका चहेता था, उसने उसको शिक्षक बनाया."

पंचायत स्तर पर नियोजन की यह प्रक्रिया साल 2009-10 तक चली. तब TET आया. लेकिन तब तक करीब एक लाख शिक्षकों का नियोजन हो चुका था.

डीएम दिवाकर नियोजित शिक्षकों के राजनीतिक पक्ष की भी बात करते हैं.

वो कहते हैं, "आज के समय में नियोजित शिक्षक एक बड़ा वोटबैंक हैं. ये सबको पता है. इनकी संख्या भर (4.14 लाख) पर न जाएं. इनका प्रभाव एक बड़ी आबादी पर है. वो कई लाख हैं. जो सरकार बनाने की इच्छा रखता होगा वो इनके ख़िलाफ़ जाने की हिम्मत कभी नहीं करेगा."

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प्राइवेट स्कूल

आरा ज़िला के मथुरापुर पंचायत के लौंग बाबा के मठिया स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय में स्कूल लेट से खुलने के सवाल पर हेडमास्टर राज किशोर कहने लगे कि वो दूर से आते हैं और सारा काम उन्हीं को करना होता है.

वो कहते हैं, "उम्र 60 को पार करने वाली है. तीन महीने की नौकरी बची है. मगर इस उम्र में भी फल, सब्ज़ी लेकर आने से चॉक-डस्टर तक सबकुछ हम ही लाते हैं. नियोजित शिक्षकों की तरह सरकार ने हमें भी बैल समझ लिया है.''

बातचीत के बीच वो हमें ऊपर लेकर गए. ओसारे में फ़र्श पर लाइन से छात्र छात्राएं बैठीं थीं. एक शिक्षक उनके बीच फ़ोन पर बात करते हुए टहल रहे थे. हमें तस्वीरें लेते देख झट से अंदर कमरे में जाकर बात करने लगे.

हेडमास्टर ने उपस्थिति का रजिस्टर दिखाया. पहली कक्षा में 13 बच्चों का नामांकन था और पांचवी में 32 छात्र थे. इस पर हेडमास्टर राजकिशोर ने कहा कि पास के ही दो विद्यालय बंद हुए हैं. उन्हीं के छात्र हैं जिससे पांचवी में संख्या बढ़ गई है.

वहीं, सातवीं और आठवीं आते-आते तक बच्चों की संख्या का आंकडा 40 को पार कर गया है. आठवीं में 48 बच्चों का नामांकन दर्ज था. हेडमास्टर ने कहा कि इसका पता नहीं चल पा रहा है कि इतने बच्चे कहां से आ गए हैं.

इसी स्कूल के बगल में 100 मीटर की दूरी पर एक प्राइवेट स्कूल चलता है. टीन के शेड के अंदर ही. लेकिन उसमें इस स्कूल से तिगुने अधिक बच्चे हैं. आख़िर ऐसा क्यों?

हेडमास्टर राजकिशोर के बोलने से पहले ही वो शिक्षक बोल पड़े जो फ़ोन से करते हुए क्लास में टहल रहे थे, "ये सब करप्शन की वजह से है."

हमने पूछा करप्शन कर कौन रहा है? इस पर दोनों चुप हो गए.

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