बिहार में जैव विविधता पर मंडराता संकट: अपर मुख्य सचिव ने जताई चिंता

बिहार में हाल ही में एक कार्यशाला में जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन पर मानव गतिविधियों के महत्वपूर्ण प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया गया। विशेषज्ञों ने नदियों और आर्द्रभूमि के लिए संरक्षण रणनीतियों पर चर्चा की, टिकाऊ प्रथाओं की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

जलवायु परिवर्तन में मानव गतिविधियों का बड़ा हाथ रहा है। पर्यावरण में तेजी से हो रहे बदलाव का मुख्य कारण जेनेटिक डायवर्सिटी से छेड़छाड़ है, जिसका खामियाजा आज की पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। यह बातें ‘बिहार में नदी और आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र’ पर आयोजित कार्यशाला के दौरान पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की अपर मुख्य सचिव हरजोत कौर बम्हरा ने कही।

Bihar Workshop on Biodiversity and Climate Change

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्था, पटना में आयोजित कार्यशाला के दौरान विभागीय अपर मुख्य सचिव ने कहा कि मौजूदा दौर में देसी चीजों को नजरंदाज कर विदेशी वस्तुओं को अधिक तवज्जो दी जा रही है, जिसका सीधा असर पर्यावरण पर पड़ रहा है। खेतों में अधिक मात्रा में फर्टिलाइजर, पेस्टिसाइड्स का इस्तेमाल हो रहा है, जिसका सीधा असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है लिहाजा थायरॉयड के साथ-साथ कई बीमारियां अब घेर रही हैं। पूर्वजों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अनाजों में इसतरह की समस्याएं देखने को नहीं मिलती थी। उन्होंने कहा कि जैव विविधता का घर कहे जाने वाले वनों पर भी इसका असर पड़ा है। खूबसूरत दिखने वाले कई पौधे आजकल लगाए जा रहे हैं लेकिन जैव विविधता को मद्देनजर रखते हुए उन्हें नहीं लगाया जाना चाहिए। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग इसपर व्यापक रणनीति बना रहा है।

वहीं, प्रधान मुख्य वन संरक्षक प्रभात कुमार गुप्ता ने कहा कि बायोडायवर्सिटी को सही परिपेक्ष्य में समझने के लिए नेशनल एक्शन प्लान तैयार है। उसके आधार पर सिड एक्शन प्लान बनाने जा रहे हैं। जब वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट आया, तब लोगों ने ये समझा कि वनों को बचाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि जीव-जंतुओं को बचाना भी जरूरी है। इसके बाद प्रोजेक्ट टाइगर के साथ वाटर पॉल्यूशन की महत्ता को भी समझा गया। फिर नेशनल पार्क और वर्ल्ड लाइफ सेंचुरी का निर्माण हुआ। उन्होंने कहा कि हमारे पास बहुत बड़ा एक्वाटिक इकोसिस्टम है और उसका अध्ययन बेहद ही जरूरी है। बिहार में तीन हजार किलोमीटर से भी अधिक नदियों का जाल है, वहीं, भौगोलक क्षेत्र का 4 प्रतिशत वेटलैंड एरिया है। इतना कुछ होते हुए भी हमें बायोडायवर्सिटी को बिहार में कंजर्व करने की अधिक आवश्यकता है। वहीं जल संसाधन विभाग के अपर सचिव, श्री यशपाल मीणा ने जल संसाधनों के समावेशी प्रबंधन की जरूरत को रेखांकित किया।

कार्यशाला में विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और विभागीय प्रतिनिधियों की उपस्थिति में नदी तंत्र, आर्द्रभूमियों, पारिस्थितिकीय प्रवाह, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के विभिन्न आयामों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। प्रतिभागियों को चार विषयगत समूहों में विभाजित कर समूह चर्चा और प्रस्तुतियाँ कराई गईं, जिनमें सतही जल संरक्षण, जैवविविधता के प्रति खतरे, प्रदूषण नियंत्रण और शहरी विकास में जलस्रोत संरक्षण जैसे विषयों पर रणनीतियाँ प्रस्तावित की गईं। जैव विविधता परिषद् की तरफ से आयोजित इस कार्यशाला में कार्यशाला में प्रमुख अतिथियों के रूप में पी. के. गुप्ता, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, डॉ. डी. के. शुक्ला, अध्यक्ष, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद, डॉ. पी. के. जैन, निदेशक, NIT पटना, यशपाल मीणा, अपर सचिव, जल संसाधन विभाग, बिहार, सीमा कुमारी, सीई एवं निदेशक, WALMI पटना तथा डॉ रमाशंकर झा, एचएजी प्रोफेसर, एनआईटी पटना शामिल थे। यह कार्यशाला न केवल नीति निर्माताओं और वैज्ञानिक समुदाय के लिए विचार-विमर्श का मंच रही, बल्कि यह बिहार में जल-जैवविविधता संरक्षण की दिशा में सामूहिक प्रतिबद्धता का जीवंत उदाहरण भी बनी।

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