कैसा है नीतीश और उपेंद्र कुशवाहा में सियासी दोस्ती और दुश्मनी का इतिहास ? जानिए
बिहार में सत्ताधारी जेडीयू में नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के बीच फिर से दरार पड़ती दिख रही है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। दोनों नेता कई बार साथ आए हैं और फिर काफी दूर चले गए हैं। इसका एक लंबा इतिहास है।

बिहार में उपेंद्र कुशवाहा अगले कितने दिनों तक नीतीश कुमार के साथ बने हुए हैं, खुद मुख्यमंत्री को भी नहीं पता है। नीतीश और कुशवाहा का राजनीतिक रिश्ता ही ऐसा रहा है, जिसमें न तो ज्यादा दिनों तक नफरत रहती है और ना ही दोनों की दोस्ती ही ज्यादा टिकाऊ है। तीन दशकों से भी ज्यादा पुराना दोनों का संपर्क उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। कभी दोनों साथ-साथ रहते हैं और कभी कट्टर-विरोधी सियासी खेमे में शामिल हो जाया करते हैं। हालांकि, कुशवाहा को राजनीति का खिलाड़ी बनाने में नीतीश का भी योगदान है, लेकिन अब उनके जूनियर भी सियासी हथकंडों में माहिर हो चुके हैं।
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जदयू में ज्यादा दिन तक नहीं हैं उपेंद्र कुशवाहा ?
उपेंद्र कुशवाहा मौजूदा दौर में लालू यादव या नीतीश कुमार की तरह बिहार की राजनीति के सबसे लोकप्रिय चेहरा कभी नहीं रहे। लेकिन, किसका भविष्य कैसा है, यह कहना आसान नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने एक सूत्र के हवाले से कहा है कि जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) पार्लियामेंट्री बोर्ड के चेयरमैन और एमएलसी उपेंद्र कुशवाहा अगले महीने तक पार्टी छोड़ सकते हैं और अपनी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP) को फिर से पुनर्जीवित कर सकते हैं। बात इतनी तक नहीं है। सूत्र ने बताया है कि आरएलएसपी बना लेने के बाद वह एक बार फिर से बीजेपी के साथ गठबंधन कर सकते हैं। गौरतलब है कि पिछले साल अगस्त तक बिहार में बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की सरकार थी और नीतीश ने पलटी मारकर लालू की आरजेडी के साथ नया सत्ताधारी गठबंधन बना लिया था।

लव-कुश वाली दोस्ती में दरार !
कुशवाहा को उम्मीद थी कि अब वही नीतीश के स्वाभाविक अधिकारी रहेंगे। क्योंकि, दोनों ही कुर्मी-कोयरी जाति की राजनीति करके सियासत में उभरे हैं। लेकिन, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चाहे-अनचाहे यह ऐलान कर दिया कि 2025 के चुनावों में उपमुख्यमंत्री और लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी उनके राजनीतिक वारिस होंगे, तो कुशवाहा के लिए अपनी निराशा छिपा पाना मुश्किल हो गया। जब नीतीश ने दो डिप्टी सीएम की संभावना पर भी ब्रेक लगा दिया तो कुशवाहा का और ज्यादा मोहभंग हुआ। उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा है, "हम नीतीश कुमार से कहना चाहते हैं कि आप अकेले नहीं हैं, आपने लव-कुश की एकता से शुरुआत की, उन लोगों को भी आज बहुत दर्द है....."। उधर नीतीश कहते हैं कि "हमको तो कुछ मालूम ही नहीं है..." उन्होंने ये कहकर कि "वो तो कई बार पार्टी को छोड़ करके गए और आए.....और 21 में फिर आए.....कोई बात होगी तो न जानेंगे....." मतलब, नीतीश को भी इल्म है कि लव-कुश के नाम पर नेताओं वाली इस दोस्ती में एक बार फिर से दरार पड़ चुकी है।

कुशवाहा बनने में नीतीश का रोल ?
उपेंद्र कुशवाहा बिहार की राजनीति में भले ही लालू-नीतीश जितना बड़ा नाम नहीं बन पाए हैं। लेकिन, यह भी उन्हीं जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर वाले समाजवादी नेताओं से राजनीति सीख कर बड़े हुए हैं, जिनके सियासी संघर्ष की फसल लालू-नीतीश आज भी काट रहे हैं। कुशवाहा को छात्र जीवन से ही कर्पूरी ठाकुर का संरक्षण प्राप्त था। वैशाली जिले के जनदाहा के रहने वाले उपेंद्र के पिता मुनेश्वर सिंह को भी ठाकुर अच्छी तरह जानते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उपेंद्र सिंह ने जनदाहा कॉलेज में लेक्चररशिप शुरू की थी। 1985 में वह लोक दल के युवा मोर्चा में शामिल हुए। तब नीतीश पहली बार नालंदा के हरनौत से एमएलए बन चुके थे। यानि राजनीति में वह उनके सीनियर रहे हैं। कहते हैं कि आज की दौर की राजनीति के टिप्स उपेंद्र ने नीतीश से ही लिए हैं। नीतीश के सुझाव पर ही उन्होंने अपने नाम के साथ कुशवाहा जोड़ा है, ताकि उनके नाम के साथ उनकी जाति का भी पता चल जाए।

कुशवाहा-नीतीश के सियासी संबंध
बिहार में कोयरी या कुशवाहा जाति की जनसंख्या करीब 7% मानी जाती है। ये राज्य के कुछ ही जिलों सीमित हैं, जिनमें नालंदा, मुंगेर, खगड़िया, समस्तीपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, भोजपुर और औरंगाबाद। 2000 के चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा पहली बार जनदाहा से चुनाव जीते और नीतीश के और भी करीब आ गए। 2004 में जब समता पार्टी का जदयू में विलय हुआ तो यह सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बन गई और नीतीश ने उन्हें विपक्ष का नेता बना दिया। प्रभाव बढ़ा तो कुशवाहा की महत्वाकांक्षा भी बढ़ने लगीं और इसी ने टकराव को भी जन्म दिया। 2007 में उन्हें जेडीयू से निकाल दिया गया। 2009 में उन्होंने अपनी राष्ट्रीय समता पार्टी बनाई, जो वोटरों के बीच पैठ नहीं बना सकी। आखिरकार उन्हें फिर से नीतीश के शरण में जाना पड़ा। 2009 में ही नीतीश ने उन्हें राज्यसभा में पहुंचा दिया।

एनडीए में आए तो शीर्ष पर पहुंचे कुशवाहा
सीटों के आवंटन ने फिर विवाद को जन्म दिया। 2013 के जनवरी में कुशवाहा एक बार फिर जेडीयू छोड़कर निकल गए और अपनी नई राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP)बनाई। यह वही साल था, जब नीतीश ने नरेंद्र मोदी के भाजपा की ओर प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ होता देख एनडीए से गठबंधन तोड़ लिया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी एनडीए के साथ आ चुकी थी। बीजेपी ने आरएलएसपी को तीन सीटें दीं और मोदी लहर में पार्टी तीनों सीटें जीत गई। खुद कुशवाहा काराकाट से जीते और मोदी सरकार में राज्यमंत्री भी बन गए। उन्हें मानव संसाधन विकास जैसा मंत्रालय मिला। 2017 में नीतीश खुद ही भाजपा के पास लौट चुके थे। 2019 के चुनाव में बीजेपी ने उन्हें सिर्फ दो सीटों का ऑफर दिया तो वह एनडीए से बाहर हो गए। उन्होंने राजद की अगुवाई वाले गठबंधन को अपनाया, लेकिन मोदी के नाम पर लड़े गए चुनाव में बीजेपी-जेडीयू-एलजेपी की आंधी में पूरा महागठबंधन ही हवा हो गया।

कुशवाहा के लिए आगे क्या ?
2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुशवाहा को न तो राजद से भाव मिला और भाजपा ने भी 6 सीटों का ही ऑफर दिया तो उन्होंने कुछ नए सहयोगियों की तलाश की। वह बीएसपी, ओवैसी, पप्पू यादव की पार्टियों और कुछ छोटे दलों के एक नए गठबंधन का हिस्सा बने और 100 से ज्यादा सीटें लड़ीं, लेकिन फिसड्डी साबित हुआ। 2021 के मार्च में उन्हें फिर जेडीयू और नीतीश की याद आई और नीतीश को उनकी। पार्टी ने उन्हें न सिर्फ संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया, बल्कि पटना में सरकारी आवास मिले, इसके लिए विधान परिषद में भी जगह बनाई। माना गया कि नीतीश उनके माध्यम से कोयरी-कुर्मी वोट बैंक को एकजुट रखना चाहते हैं, जिन्हें राज्य की राजनीति में लव-कुश समाज कहकर बुलाया जाता है। अब कुशवाहा को उन्हीं की 'चिंता' सताने लगी है।












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