Bihar Migration: प्रवासी बिहारियों पर कितनी पुख्ता है नीतीश सरकार की जातीय जनगणना रिपोर्ट?
Bihar Migration Survey: बिहार में जातिगत जनगणना के जो विस्तृत आंकड़े जारी किए गए हैं, उसके कई नतीजों पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है। यह महज धारणा की बात नहीं है, कुछ तथ्य भी इसके खिलाफ जा रहे हैं।
जैसे प्रवासी बिहारियों को लेकर नीतीश कुमार सरकार के सर्वे में जो दावा किया गया है, वह सामान्य समझ वालों के लिए भी हजम करना मुश्किल है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक जातिगत जनगणना की जो रिपोर्ट बिहार विधानसभा में पेश की गई है, उसके हिसाब से 50 लाख से कुछ ज्यादा बिहारी ही रोजी-रोटी या शिक्षा के लिए राज्य से बाहर रहते हैं।

50 लाख से कुछ ज्यादा बिहारी प्रवासी- बिहार सरकार
बिहार की जातीय जनगणना रिपोर्ट के अनुसार 2023 में राज्य की कुल आबादी 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार 310 है। राज्य सरकार कहती है कि इनमें से सिर्फ 50 लाख से कुछ अधिक आबादी ही बिहार से बाहर है। बिहार के प्रवासियों में भी सबसे ज्यादा हिस्सा ओबीसी और अति-पिछड़े वर्ग का है। इस रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 0.17% लोग विदेशों में काम करते हैं और 0.02% शिक्षा के इरादे से विदेशों में रह रहे हैं।
IIPS की रिपोर्ट आंखें खोल देगी!
लेकिन, फरवरी, 2020 में टीओआई में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार के मौजूदा आंकड़ों में भारी झोल लग रहा है। यह रिपोर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) के एक सर्वे के आधार पर छपी थी। इस सर्वे के अनुसार राज्य का 50% से ज्यादा परिवार ज्यादा विकसित जगहों या देश से बाहर पलायन के लिए मजबूर है। यही नहीं अधिकतर परिवार राज्य के से भेजी गई रकम पर ही निर्भर है।
नीतीश के मंत्री ने ही जारी की थी IIPS की रिपोर्ट
कमाल की बात ये है कि यह रिपोर्ट (Causes and consequences of out migration from middle Ganga plain) आईआईपीएस के डायरेक्टर केएस जेम्स और प्रदेश के तत्कालीन शिक्षा मंत्री कृष्णानंदन प्रसाद वर्मा ने ही जारी किया था। इस सर्वे में 36 गांवों के 2,270 परिवारों को शामिल किया गया था।

इस रिपोर्ट में सारण, मुंगेर, दरभंगा, तिरहुत, कोसी और पूर्णिया प्रमंडलों को सबसे ज्यादा पलायलन वाला क्षेत्र बताया गया था। सीजनल प्रवासियों के मामले में कोसी, तिरहुत और पूर्णिया प्रमंडल आगे थे। सबसे ज्यादा पलायन की समस्या भूमिहीनों और एकल परिवारों में बताई गई थी। 85% प्रवासी के पास जमीन नहीं थी या फिर एक एकड़ से कम जमीन थी।
यही नहीं 90% प्रवासी या तो निजी फैक्ट्रियों और कंपनियों में काम कर रहे थे या फिर अस्थायी श्रमिक थे। यह प्रवासी बिहारी सालाना औसतन 26,020 रुपए जीवनयापन के लिए अपनी कमाई से बचाकर प्रदेश में रह रहे परिवार के पास भेज रहे थे।
नीतीश सरकार की रिपोर्ट में दावा- 94.28% बिहारी बिहार में ही रहते हैं
जबकि, बिहार सरकार के जातीय जनगणना की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 94.28% बिहारी बिहार में ही रहते हैं और इन्हें बाहर जाने की जरूरत ही नहीं है। राज्य सरकार ने प्रवासी बिहारियों का जातिगत ब्योरा देने की भी कोशिश की है। इसके हिसाब से पिछड़े वर्ग से 3.30%, अति-पिछड़े वर्ग से 3.3%, अनुसूचित जाति के 2.5% और अनुसूचित जनजाति के 2.84% लोग दूसरे राज्यों में काम करते हैं।
वहीं सामान्य वर्ग के 5.68% लोग बिहार से बाहर काम कर रहे हैं। लेकिन, जब शिक्षा के लिए राज्य से बाहर या विदेशों में रहने की बात आती है तो तुलनात्मक तौर पर सामान्य वर्गों से ज्यादा लोग प्रवासी बिहारी की श्रेणी में बताए गए हैं।
अगर दोनों सर्वे को तुलनात्मक रूप से देखें तो बिहार सरकार के आंकड़ों पर गंभीर सवाल पैदा होते हैं। क्योंकि, बिहार की जमीनी सच्चाई यही है कि कई गांवों में गिनती के लोग ही रह गए हैं और वहां की अधिकतर आबादी रोजी-रोटी कमाने के लिए या फिर बेहतर शिक्षा की तलाश में राज्य से बाहर रहते हैं।
अगर नीतीश कुमार की सरकार सिर्फ पवित्र महापर्व छठ के मौके पर देशभर से बिहार पहुंचने वाली ट्रेनों, बसों या विमानों के यात्रियों का ही सर्वे करवा ले तो प्रवासी बिहारियों के मामले में उसे शायद और ज्यादा दुरुस्त आंकड़े जुटाने में मदद मिल सकती है!
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