Bihar Elections: RJD-कांग्रेस या JDU-BJP गठबंधन,पहले दौर की 71 सीटों पर दबाव में कौन ?

नई दिल्ली- बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार सोमवार शाम को खत्म हो गया। पहले चरण के चुनाव अभियान में सभी दलों और गठबंधनों ने वोटरों को रिझाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंकी है। अब इसका वोटरों पर कितना असर पड़ा है, इसका उचित आंकलन तो 10 नवंबर को ही हो पाएगा। लेकिन, 2015 के चुनाव के नतीजों के विश्लेषण से यह अंदाजा लगाने की कोशिश की जा सकती है कि इस दौर में किस दल या गठबंधन पर दूसरों के मुकाबले अपना प्रदर्शन बेहतर करने का दबाव ज्यादा है; और कौन सी पार्टी या एलायंस के पास इस दौर में ही बढ़त बना लेने का सुनहरा मौका है।

Bihar Elections:RJD-Congress or JDU-BJP alliance, who are under pressure on 71 seats in the 1st phase?

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    2015 के बिहार विधानससभा चुनाव और मौजूदा चुनाव में सियासी समीकरण में बहुत बड़ा उलटफेर हो चुका है। इसमें सबसे बड़ा अंतर ये आया है कि जेडीयू वापस एनडीए का हिस्सा बन चुका है और लेफ्ट पार्टियां खुलकर महागठबंधन की भागीदार बनकर चुनाव लड़ रही हैं। इस चुनाव में कई और छोटी-छोटी पार्टियों ने अपना गठबंधन बनाया है और कई सीटों पर अंतिम चुनाव परिणाम को इधर से उधर पलटने में भी उनकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन, यहां पर हम मुख्यतौर पर उन पार्टियों पर फोकस करना चाहते हैं, जिनका पहले चरण में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।

    पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी, लोजपा, हिंदुस्तान आवाम मोर्चा और रालोसपा जैसी पार्टियों के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी। इसलिए सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी 71 में से 40 सीटों पर लड़ी थी, लेकिन सिर्फ 13 सीटें ही जीतने में सफल हुई थी। इस बार सहयोगी के रूप में जनता दल यूनाइटेड उसके साथ है और भाजपा सिर्फ 29 सीटों पर ही चुनाव मैदान में है। चुनाव लड़ने के लिए खाते में पहले के मुकाबले कम सीटें और जदयू के उम्मीदवारों के हक में वोट ट्रांसफर करवाना बीजेपी के लिए पहले फेज में दो बड़ी चुनौतियां हैं। इसलिए आखिरी वक्त में बड़े नेताओं को जदयू के लिए प्रचार में उतारा भी गया है, लेकिन चिराग जिस तरह से हाथ धोकर नीतीश कुमार के पीछे पड़े हैं, उससे एनडीए के सामने कठिन चुनौती पेश आ रही है।

    राजग के लिए इस दौर में एक और किरदार अहम हैं, जीतन राम मांझी। उनकी पार्टी 'हम' का जितना लिटमस टेस्ट इस फेज में होना है,उतना आगे नहीं है। पार्टी 7 में से 6 सीटों पर इसी फेज में चुनाव लड़ रही है। 2015 में उसका स्कोर 1/10 रहा था। इस चरण में जेडीयू के 35 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। पिछले चुनाव में वह सिर्फ 29 पर लड़ी थी और 18 सीटें उसके खाते में आई थी। इस बार वह भाजपा से ज्यादा सीटें लेने में तो सफल हुई है, लेकिन चिराग पासवान ने नीतीश की पार्टी की राह में काफी रोड़े बिछा रखे हैं। उन्होंने बीजेपी के कई दिग्गज बागियों को जेडीयू के खिलाफ टिकट दे दिया है। वह खुद को पीएम मोदी का हनुमान बता चुके हैं। इसलिए इस चरण में कई सीटों पर जदयू उम्मीदवारों को भाजपा के स्टार प्रचारकों की ओर उम्मीद भरी नजरों से निहारते हुए देखा गया है। गठबंधन की एक और सहयोगी वीआईपी इस दौर में एक सीट पर ताल ठोके हुए है। लेकिन, जदयू, हम और वीआईपी तीनों के लिए महागठबंधन ही नहीं लोजपा के 42 उम्मीदवार भी इस चरण में बड़े सिरदर्द बने हुए हैं।

    सौ बात की एक बात ये है कि पहला चरण बाकियों के मुकाबले राष्ट्रीय जनता दल और उसकी सहयोगियों के लिए ज्यादा बड़ा चुनाव है। 2015 में पार्टी इन 71 में से 29 सीटों पर ही लड़ी थी और 27 सीटें जीत गई थी। यानि स्ट्राइक रेट के हिसाब से राजद की सफलता का ग्राफ यहां काफी प्रभावी माना जा सकता है। लेकिन, हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तब लालू और नीतीश साथ चुनाव प्रचार कर रहे थे और बिहार में ओबीसी और मुसलमानों का एक बहुत बड़ा वोट बैंक महागठबंधन के पीछे लामबंद हो गया था। ऊपर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए बयान को लेकर ये पार्टियां चुनावी छौंक अलग लगा रही थीं। यानि राजद और उसके सीएम पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव के लिए भी इस बार परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। उनपर पिछली सफलता बरकरार रखने का दबाव तो है ही, ऊपर से उनकी पार्टी पहले से कहीं ज्यादा 42 सीटों पर इस फेज में चुनाव लड़ रही है। ये जरूर है कि भाकपा (माले) के साथ हुए गठबंधन ने उसकी स्थिति थोड़ी मजबूत जरूर की है, बाकी कांग्रेस का कितना साथ मिल सकता है, इसका तो सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

    पिछले चुनाव में राजद-जदयू की सहयोगी बनकर चुनाव लड़ी कांग्रेस का स्ट्राइक रेट भी इन 71 सीटों पर शानदार रहा था। पार्टी 13 सीटों पर लड़कर 9 जीत गई थी। इस बार तेजस्वी ने भाग्य आजमाने के लिए उसे 21 सीटें दी हैं। कांग्रेस यह सोचकर खुश हो सकती है कि इस बार जदयू नहीं तो क्या हुआ भाकपा (माले) का साथ तो है। 2015 में इन 71 सीटों पर भाकपा (माले) 1 सीटों पर चुनाव जीती थी। इस बार पार्टी के 8 उम्मीदवार तीसरे चरण में भाग्य आजमा रहे हैं। इनके अलावा रालोसपा ने 43 और बसपा ने 27 उम्मीदवार इस चरण में उतारे हैं।

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