'टोपी' पर सियासी तूफान: नीतीश कुमार ने क्यों नहीं पहनी मदरसे की टोपी? चुनावी मौसम में बढ़ा सियासी तापमान
Bihar Election 2025 (Nitish Kumar): बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना में आयोजित राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड के शताब्दी समारोह में उस समय सबको चौंका दिया जब उन्होंने मंच पर उन्हें पहनाई जा रही टोपी को पहनने से इनकार कर दिया। यह टोपी अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जामा खान उन्हें पहनाना चाह रहे थे, लेकिन नीतीश ने टोपी खुद पहनने के बजाय उसे वापस लेकर जामा खान के सिर पर रख दी।
यह घटना पटना में आयोजित बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड के 100 साल पूरे होने के समारोह के दौरान हुई। मंच पर जामा खान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक पारंपरिक मुस्लिम टोपी (स्कल कैप) पहनाने की कोशिश की, लेकिन नीतीश ने उसे लेने के बाद खुद पहनने से मना कर दिया और वह टोपी जामा खान को वापस पहना दी।

वीडियो वायरल, विपक्ष का हमला
यह घटना कैमरे में कैद हो गई और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई। विपक्षी दलों ने इस पर नीतीश की "धर्मनिरपेक्षता" पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। राजद प्रवक्ता मृणाल तिवारी ने कहा, "ऐसा व्यवहार अनुचित है।"
टोपी से नीतीश कुमार को परहेज क्यों?
नीतीश कुमार बीते वर्षों में अक्सर इफ्तार पार्टियों और इस्लामिक आयोजनों में पारंपरिक टोपी पहने नजर आते रहे हैं। लेकिन हाल के कुछ आयोजनों में उन्होंने टोपी पहनने से परहेज किया है। मार्च 2025 में मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित इफ्तार पार्टी में भी नीतीश टोपी की जगह कफिया (गमछा) डाले नजर आए थे।
बिहार में अगले कुछ महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं और मुस्लिम समुदाय राज्य की 18% आबादी के साथ कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाता है। नीतीश कुमार की टोपी पहनने से मना करने की इस घटना को इसी चुनावी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। प्रतीकात्मक घटनाएं चुनावी रणनीति और संदेश देने के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही हैं।
नीतीश कुमार को अक्सर "पलटू चाचा" कहा जाता है, क्योंकि वे कई बार राजनीतिक गठबंधन बदल चुके हैं। इस बार का यह टोपी न पहनने वाला फैसला भी विपक्ष के लिए एक नया हथियार बन गया है, खासकर चुनावी मौसम में।
नीतीश कुमार ने पिछले साल फिर से एनडीए का दामन थाम लिया था। इसके बाद से मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में नाराजगी देखी जा रही है। खासतौर पर वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाने वाले बिल (वक्फ संशोधन विधेयक) के समर्थन के बाद कई मुस्लिम नेता जेडीयू से इस्तीफा भी दे चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को आंशिक रूप से रोक भी दिया है।
JDU की मुश्किलें
JDU को पहले ही मुस्लिम वोट बैंक से दूरी का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी द्वारा संसद में पारित वक्फ कानून का समर्थन करने के बाद कम से कम पांच मुस्लिम नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी। इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आंशिक रोक लगा दी है। इसके अलावा, चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर भी मुस्लिम बहुल इलाकों में मताधिकार छिनने का डर जताया जा रहा है।
नीतीश कुमार के इस 'टोपी-प्रकरण' ने बिहार की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। विपक्ष इसे धर्मनिरपेक्षता से दूरी बताकर चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में है, जबकि सत्तापक्ष अभी इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। क्या यह महज एक इत्तेफाक था या सोच-समझकर उठाया गया कदम? चुनावी माहौल में इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में और भी अहम हो जाएगा।












Click it and Unblock the Notifications