उपसभापति के तौर पर हरिवंश के एक्शन का बिहार चुनाव पर क्या होगा असर?
नई दिल्ली। जदयू सांसद और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने क्या नियमों की अनदेखी कर कृषि से जुड़े दो विधेयकों को पारित करा दिया ? क्या उन्होंने सत्ता पक्ष के इशारे पर काम किया ? विपक्ष ने अपनी आपत्तियों के लेकर विधेयक को प्रवर समिति में भेजने की मांग की थी। विधेयक को पारित करने के पहले मतविभाजन की मांग की गयी थी। लेकिन सभापति ने विपक्ष की ये मांगें नहीं मानी। 12 विपक्षी दलों ने सभापति हरिवंश पर पक्षपात का आरोप लगा कर उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। हालांकि यह अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो गया लेकिन इससे हरिवंश की बौद्धिक और निष्पक्ष छवि पर आंच पहुंची है। किसान नेता गुरनाम सिंह का कहना है कि ये दोनों विधेयक किसानों के लिए डेथ वारंट हैं। देश भर के किसान नेताओं ने इन दोनों विधेयकों के खिलाफ 25 सितम्बर को भारत बंद बुलाया है। यानी अब देश में एक किसान आंदोलन की नयी जमीन तैयार हो गयी है। जनसरोकार की पत्रकारिता करने वाले हरिवंश आज उपसभापति के सम्मानित पद पर बैठे हैं। उनके जैसा आदमी क्या किसानों के हित की अनदेखी करेगा ? उपसभापति होने के साथ-साथ हरिवंश जदयू के सांसद भी हैं। नीतीश कुमार ने ही उन्हें राज्यसभा में भेजा है। कुछ ही दिनों के बाद बिहार में चुनाव है। अगर किसानों का मुद्दा गरमाया तो नीतीश और भाजपा का क्या होगा।

वे विधेयक जिनकी वजह से पैदा हुआ विवाद
विपक्ष का आरोप है कि कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) विधेयक 2020 और कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा अनुबंध विधेयक 2020 के कारण किसान संकट में घिर जाएंगे। दोनों विधेयकों को नियमों के खिलाफ जा कर पारित कराया गया है। पहले विधेयक से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) अधारित खरीद प्रणाली खत्म हो जाएगी। पंजीकृत मंडिया खत्म हो जाएंगी जिससे राज्यों को राजस्व घाटा उठाना पड़ेगा। दूसरे विधेयक के प्रभाव से किसानों पर निजी कंपनियों, निर्यातकों और फूड प्रोसेसरों का दबदबा बढ़ जाएगा। ऐसे में निजी कपंनियां किसानों का शोषण कर सकती हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि अगर ये विधेयक कानून बनते हैं तो खेती और किसानी भी कॉरपोरेट कंपनियों के हाथों में चली जाएगी। आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक 2020 के प्रावधान मुनाफाखोरी को बढ़ावा देने वाले हैं। इस विधेयक में आलू, प्याज, अनाज, दाल और तिलहन जैस कृषि उत्पादों को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया गया है। यानी सामान्य स्थिति में बड़े व्यापारी इन वस्तुओं का मनमाफिक भंडारण कर सकते हैं। इससे कालाबाजारी का खतरा हो सकता है।

उसूल वाले सांसद
खुद किसान परिवार में पैदा हुए हरिवंश क्या खेती पर संभावित खतरे को देख कर भी आंख मूंदे रहेंगे ? राज्यसभा चुनाव में दाखिल हलफनामा के मुताबिक हरिवंश (पूरा नाम हरिवंश नारायण सिंह) के पास साढ़े सोलह एकड़ पुश्तैनी जमीन है। इस जमीन पर खेती होती है तो जाहिर है वे भी खेतीहर हैं। फिर वे किसान विरोधी विधेयक पर स्टैंड लेने से क्यों पीछे हट गये ? क्या राजनीतिक मजबूरियों के कारण उन्होंने आदर्शवाद से समझौता कर लिया ? हरिवंश जब रांची से निकलने वाले अखबार प्रभात खबर के संपादक थे जब उन पर खबरों को लेकर मानहानि के कुछ मुकदमे किये गये थे। अधिकतर संपादकों को ऐसी स्थिति झेलनी पड़ती है। जब वे सांसद बन गये तो उन्हें डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनवाना था। इस पासपोर्ट के आवेदन पत्र में उन्हें एक जगह भरना था कि उन पर कितने निजी मामले दर्ज हैं। उन्होंने मानहानि के मुकदमों का ब्योरा दर्ज कर दिया। इसका नतीजा हुआ कि उनका पासपोर्ट लटक गया। फिर विचार- विमर्श के बाद ये पासपोर्ट बना। यानी उन्हें किसी लाभ के लिए झूठ बोलना मंजूर न था। इसी तरह किसी सांसदों को कार्यालय चलाने के लिए प्रतिमाह 30 हजार रुपये का भत्ता मिलता है। लेकिन इसके लिए सांसद को निजी सहायक रखना पड़ता है। कई सांसद अपने सगे संबंधियों को निजी सचिव बना कर ये भत्ता उठाते रहे हैं। लेकिन हरिवंश ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा था कि जब तक वे सचमुच किसी सहायक को रख नहीं लेंगे तब तक वे ये भत्ता नहीं लेंगे।

जब छोड़ा था पीएम के सूचना सलाहकार का पद
1991 में भी उन्होंने एक पत्रकार के रूप में अपनी खुद्दारी दिखायी थी। जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने हरिवंश को अपना अतिरिक्त सूचना सलाहकार बनाया था। इस पद पर जाने के बाद उन्हें गाड़ी, बंगला भी मिला था। लेकिन जिस दिन चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया उसी दिन हरिवंश ने भी रिजाइन कर दिया। उन्होंने पीएमओ के रिशेप्शन पर घर की चाबी, गाड़ी की चाबी और अपने इस्तीफे का लिफापा सौंप दिया और बिना कुछ कहे बाहर निकल गये। वे रांची लौट आये और फिर संपादक की कुर्सी संभाल ली। उन्होंने आदिवासी हितों के संरक्षण के लिए गांव और जंगल की झोपड़ी तक रिपोर्टिंग की। जल, जंगल और जमीन का मुद्दा उठाया। जनसरोकार वाली उनकी यह पत्रकारिता बिहार-झारखंड की पहचान बन गयी। इतने उसूलों वाले इंसान को अगर कोई बड़ा पद मिल जाए और उस पर पक्षपात का आरोप लगे तो हैरान होना लाजिमी है। भारत के संसदीय इतिहास में आज तक राज्यसभा के किसी उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया गया था। भले यह प्रस्ताव मंजूर नहीं हुआ लेकिन इससे हरिवंश की साख को धक्का जरूर लगा।
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क्या होगा बिहार पर असर ?
अगर हरिवंश पर किसान विरोधी होने का आरोप गहराता है तो इसका असर बिहार की राजनीति पर पड़ सकता है। 25 सितम्बर को भारत बंद के बाद ये मामला तूल पकड़ सकता है। हरिवंश को नीतीश कुमार ने ही राज्यसभा सांसद बनाया है। उन्हें नीतीश का करीबी नेता माना जाता है। अगर हरिवंश को लेकर विवाद होता है तो इसका असर नीतीश पर भी पड़ सकता है। आने वाले कुछ दिनों में बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा हो सकती है। अगर किसानों का मामला चुनावी मुद्दा बन गया तो नीतीश की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। कांग्रेस इस मुद्दे को गरमा रही है। किसान नेता भी बड़े आंदोलन के लिए गोलबंद हो रहे हैं। महागठबंधन इसका फायदा उठाने की कोशिश जरूर करेगा। ऐसे में बिहार एनडीए की चुनौतियां बढ़ने वाली हैं।
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