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बिहार चुनाव 2020 से पहले दल बदलते नेता: कितना जनहित, कितना अवसरवाद?

बिहार चुनाव: दल बदलते नेता- कितना जनहित, कितना अवसरवाद?

बिहार का आम जनजीवन बाढ़ और कोरोना महामारी की वजह से भले ही संकट में फँसा हो, सत्ता-राजनीति से जुड़ी जमातें यहाँ चुनावी खेल में खुलकर उतर चुकी हैं.

आगामी बिहार विधानसभा के गठन संबंधी चुनाव के लिए अब मात्र तीन महीने का समय शेष रह गया है. निर्वाचन आयोग ने सुरक्षित तरीक़े से चुनाव कराने की 'गाइडलाइन' जारी कर दी है.

यहाँ सत्ताधारी गठबंधन, यानी जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के रुख़ से यही लग रहा था कि चुनाव टलेंगे नहीं, समय पर ही करा लिये जाएँगे.

इसलिए पाला बदल, जोड़तोड़ या तरह-तरह के समीकरण बनाने-बिगाड़ने जैसी गतिविधियाँ तेज़ हो गयी हैं. प्राय: हर चुनाव के समय ऐसा होता रहा है.

सियासत में उसूलों को तिलांजलि देना और निपट स्वार्थ को सर्वोपरि रखना अब कोई निंदनीय बात तो रही नहीं.

अब जो बिहार में चुनाव होने वाले हैं, उस पर ग़ौर करें तो नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू यहाँ अन्य दलों के मुक़ाबले ज़्यादा सक्रिय दिख रही है.

वह अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) से और बाहर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से निबटने में व्यस्त है.

कुछ हद तक बीजेपी का रवैया भी, ख़ासकर एलजेपी के संदर्भ में, जेडीयू को सशंकित बनाये हुए है.

एलजेपी के युवा मुखिया चिराग़ पासवान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर पिछले कुछ समय से हमलावर हैं और बीजेपी उन्हें रोक-टोक भी नहीं रही है.

एनडीए में दरार...

यहाँ स्पष्ट कर दें कि एनडीए का अंग होते हुए भी जेडीयू जिस तरह केंद्र सरकार में भागीदार नहीं है, उसी तरह एलजेपी भी बिहार सरकार में साझीदार नहीं है.

यह स्थिति एनडीए के इन तीनों दलों में अंदरूनी दूरी या दरार की झलक कभी-कभी दिखा देती है. दूसरी बात, कि केंद्र में बुलंद लेकिन बिहार में मंद पड़ी बीजेपी 'नीतीश कुमार की पिछलग्गू' वाली पीड़ा से मुक्ति तो चाहती है, पर खुलकर बोल नहीं पाती है.

बिहार चुनाव: दल बदलते नेता- कितना जनहित, कितना अवसरवाद?

रामविलास पासवान की पार्टी एलजेपी को पहले से ही आशंका रही है कि सीटों के बँटवारे के समय जेडीयू- नेतृत्व बड़ा हिस्सा हथियाने के लिए उसे हाशिये पर सरकाना चाहेगा. ऐसे में बीजेपी को अपने हिस्से में कटौती कर के एलजेपी को साथ जोड़े रखने के लिए विवश होना होगा.

यह भी एक कारण हो सकता है कि बीजेपी चिराग़ पासवान को जेडीयू पर दबाव बनाने से रोकने की कोशिश नहीं कर रही है. या संभव ये भी है कि जेडीयू और बीजेपी ने मिल कर ही चिराग़ की बढ़ी-चढ़ी माँग पर अंकुश की रणनीति अपनाई हो.

ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व नीतीश कुमार की नाराज़गी मोल ले कर चिराग़ की पीठ ठोकना नहीं चाहेगा. वजह ये है कि बिहार बीजेपी पर पिछले कई वर्षों से जिस नेता का वर्चस्व क़ायम है, उस नेता का नीतीश-प्रेम जगज़ाहिर है.

इस चर्चा या संभावना में अभी उतना वज़न मैं नहीं देख रहा कि बीजेपी अगर नीतीश को छोड़कर और एलजेपी को साथ ले कर चुनाव लड़े तो वह राज्य में सरकार बना सकती है.

धारा 370 हटाने से ले कर राम मंदिर निर्माण तक के नुस्ख़े बिहार में बीजेपी के हक़ में कारगर होने के कोई साफ़ लक्षण दिख कहाँ रहे हैं ?

फ़िलहाल तो नीतीश कुमार के साथ रहने से ही बीजेपी को भावनात्मक मुद्दों का भी लाभ मिलने की गुंजाइश नज़र आती है, क्योंकि जातीय समीकरण मिटा देने जैसी कोई लहर तो अभी बिहार में चल नहीं रही है.

चुनावी संदर्भ में ही एक और चर्चा इन दिनों यहाँ चल रही है. इसमें आरोप लग रहे हैं कि कोरोना महामारी की रोकथाम, बिहारी श्रमिकों को संकट से बचाने और बाढ़ से राहत-बचाव में नीतीश सरकार विफल साबित हुई है. इस कारण आगामी चुनाव में जेडीयू को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.

लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि राज्य की गठबंधन सरकार में शामिल बीजेपी अपने को ऐसी विफलताओं से मुक्त कैसे मान सकती है ? राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय तो बीजेपी कोटे से ही हैं और उन पर ज़्यादा आरोप लगे हैं.

जेडीयू-बीजेपी की आपसी होड़

दूसरी तरफ़ चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने जेडीयू की जैसी सांगठनिक तैयारी करवाई है और अधिकारियों के थोक में तबादले/पदस्थापन किये हैं, उनसे स्पष्ट है कि जेडीयू बीजेपी पर भारी पड़ने के प्रयास में जुटी है.

लगता नहीं कि बीजेपी इसबार भी चुनावी सीटों के बँटवारे में नीतीश कुमार पर हावी हो सकेगी. हो सकता है एलजेपी का मसला हल करने में नीतीश अपने रुख़ में थोड़ी नरमी ले आएँ.

वैसे, चिराग़ पासवान के विरोधी तेवर को देखते हुए ही नीतीश कुमार ने 'हम' पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम माँझी को अपने दल के साथ जोड़ना तय किया है. माँझी ने आरजेडी, कांग्रेस और कुछ अन्य छोटे दलों के महागठबंधन से ख़ुद को अलग कर लिया है.

जीतनराम माँझी की सियासत पिछले कई वर्षों से डावाँडोल रही है.

बिहार चुनाव: दल बदलते नेता- कितना जनहित, कितना अवसरवाद?

वह न तो एनडीए में और न ही आरजेडी- कांग्रेस वाले महागठबंधन में अपने को स्थिर या संतुष्ट रख पाए. चुनावी सीटों या अन्य ख़्वाहिशों के मामले में जहाँ-जहाँ बात नहीं बनी, वहाँ-वहाँ से खिसक लिए.

जनाधार या जनसमर्थन के मामले में भी माँझी यह साबित नहीं कर पाए कि वह जिससे जुड़ते हैं, उसे चुनावी लाभ (दलित समाज के वोट) दिला पाने की सियासी ताक़त रखते हैं.

अब चूँकि जेडीयू को इस चुनाव में एक चर्चित दलित चेहरे की ज़रूरत महसूस हुई होगी, इसलिए वह पिछले गिले-शिकवे भुलाकर माँझी को साथ लाने का प्रयास कर रहा है.

महागठबंधन में बिखराव

जेडीयू ने इस बीच आरजेडी से तोड़ कर कई विधायकों/ पूर्व विधायकों को भी अपने साथ जोड़े हैं. इनमें लालू प्रसाद यादव के समधी और पूर्व मुख्यमंत्री दारोग़ा प्रसाद राय के पुत्र चंद्रिका राय का नाम सबसे प्रमुख है.

चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय के साथ लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप की जो शादी हुई, वह पारिवारिक विवाद के बाद टूटने जैसी स्थिति में पहुँच चुकी है. लालू परिवार से बेहद नाराज़ चंद्रिका राय ने नीतीश कुमार से हाथ मिला कर आरजेडी को सबक़ सिखाने का एलान किया है.

बिहार चुनाव: दल बदलते नेता- कितना जनहित, कितना अवसरवाद?

अब बिहार के यादव समाज में लालू यादव और उनके पुत्र तेजस्वी यादव की पैठ के मुक़ाबले चंद्रिका यादव की स्थिति भले ही बहुत असरकारक न हो, पर आरजेडी केलिए यह एक झटका तो है ही.

उधर नीतीश सरकार के एक मंत्री श्याम रजक जब जेडीयू छोड़कर आरजेडी में शामिल हो गए, तब कहा जाने लगा कि इस दलबदल से आरजेडी को ख़ासा फ़ायदा और जेडीयू को नुक़सान होगा.

जबकि स्पष्ट देखा गया है चुनाव के समय टिकट कटने की आशंका या टिकट मिलने की संभावना से जुड़े अवसरवादी दलबदल का जनमत पर बहुत असर पड़ता नहीं है.

लेकिन हाँ, जब जनाधार वाला कोई बड़ा नेता और उसका दल किसी अन्य दल के साथ जुड़ जाता है, तभी वह चुनावी नतीजों पर असर डाल पाता है.

इसबार बिहार में अबतक हुए दलबदल को मौसमी उछल-कूद ही माना जा सकता है.

आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीटों की हिस्सेदारी को ले कर जो आरंभिक खींचतान की खबरें आ रही हैं, उनसे दोनों के गठबंधन टूटने जैसी आशंका तो नही, लेकिन उपेंद्र कुशवाहा और मुकेश साहनी की पार्टियों में निराशा ज़रूर दिख रही है.

इन दोनों के छोटे दलों को कितनी सीटें मिल पाएँगी, यह आरजेडी और कांग्रेस के बीच तालमेल हो जाने पर ही स्पष्ट हो सकेगा.

किसका पलड़ा होगा भारी

वैसे, राज्य के मौजूदा राजनीतिक हालात यही संकेत दे रहे हैं कि सांगठनिक मज़बूती, राष्ट्रवादी भावनात्मक मुद्दे और अनुकूल सत्तातंत्र काफ़ी हद तक सत्तापक्ष के हक़ में जा सकते हैं.

जबकि बुनियादी ज़रूरतें पूरी न होने, रिश्वतख़ोरी और अपराध बढ़ने, शिक्षा और स्वास्थ्य/चिकित्सा संबंधी कुप्रबंधन जैसे मसलों पर आक्रोशित जनमानस का रुझान विपक्ष की तरफ़ हो सकता है.

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यह भी माना जा रहा है कि कोरोना संकट के समय चुनाव कराने के नये तरीक़े साधन संपन्न बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को अधिक रास आएँगे क्योंकि आरजेडी, कांग्रेस और वामपंथी दल समेत बाक़ी छोटे दल इस बाबत उनका मुक़ाबला शायद ही कर पाएँगे.

बिहार में वामपंथी दलों के बीच चुनावी एकजुटता का अभाव पिछले कई सालों से देखा जा रहा है. उधर जातीय द्वेष के आधार पर सामान्य मतदाताओं में पैदा किए गए बिखराव अच्छे उम्मीदवारों की भी पराजय का कारण बन जाते हैं.

एक और बात. राज्य के सत्ताधारी गठबंधन ने जो ' लालू-राबड़ी शासन के पंद्रह साल बनाम नीतीश सरकार के पंद्रह साल ' का जो मुद्दा उछाला है, वह मेरी समझ में बेअसर ही जाएगा.

कारण ये है कि दोनों शासनकाल के कुछ पहलू चमकदार, तो कुछ पहलू बहुत दाग़दार भी रहे हैं. दोनों शासनकाल में कई अच्छे काम हुए, तो कई बुरे काम भी हुए हैं.

दोनों पक्ष एक दूसरे के ख़िलाफ़ लंबी फ़ेहरिस्त ले कर चुनावी मैदान में उतरते रहें, भुक्तभोगी मतदाताओं पर ऐसी सूचियों का कोई असर नहीं होने वाला.

असर डालने वाली बातें निकलेंगी लोगों की उन्हीं कमज़ोरियों से, जो पंद्रह- पंद्रह वर्षों में भी मतदाताओं की मज़बूतियों जैसी शक्ल अख़्तियार नहीं कर पाती हैं.

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