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'हैदराबाद एनकाउंटर से सबसे बड़ा नुक़सान महिलाओं का'

By प्रियंका दुबे

बीबीसी

रात के तीसरे पहर 'क्राइम सीन रिक्रिएट' करने के लिए न्यायिक हिरासत से मौजूद हैदराबाद सामूहिक बलात्कार के 4 अभियुक्यतों को पुलिस शहर के शादनगर इलाक़े में ले जाती है. इसके कुछ ही घंटों बाद 6 दिसंबर की सुबह होती है और हिंदुस्तान एक सनसनीख़ेज 'पुलिस एनकाउंटर' की ख़बर के शोर में आँखें खोलता है.

एक ओर जहां सोशल मीडिया से लेकर संसद तक इसके पक्ष में शोर हो रहा है - वहीं दूसरी ओर कई महिला अधिकार कार्यकर्ताओं को लगता है कि जश्न मानती आवाज़ें भारत में महिला अधिकारों की लड़ाई को कई क़दम पीछे ले जाएँगी.

महिलाओं के हक़ में नहीं है ये कथित एनकाउंटर

वरिष्ठ अधिवक्ता और महिला अधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर का कहना है कि इससे उपजे ध्रुवीकरण और बहस में सबसे बड़ी हार महिलाओं की ही होगी.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह एनकाउंटर संदेहास्पद है. और जो लोग भी इसको 'न्याय' समझ कर उत्सव मना रहे हैं वो यह नहीं देख पा रहे हैं कि इस पूरी बहस में सबसे बड़ा नुक़सान महिलाओं का होने वाला है."

उन्होंने कहा कि इसके दो कारण है. पहला तो यह कि अब ज़िम्मेदारी तय करने की बात ही ख़त्म हो जाएगी. सरकार और पुलिस दोनों ही रोज़मर्रा की क़ानून व्यवस्था और आम पुलिसिंग को दुरुस्त करने की बजाय इस तरह हिरासत में हुई ग़ैर-क़ानूनी हत्याओं को सही ठहराने में लग जाएंगे.

वृंदा ग्रोवर ने कहा, "दूसरी सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस एनकाउंटर को मिल रही सार्वजनिक स्वीकृति पुलिस को अदालत और क़ानून की जगह स्थापित करती सी नज़र आती है. मतलब अगर पुलिस ही इस तरह न्याय करने लग जाए तो फिर अदालत की ज़रूरत ही क्या है?"

ANI

इस बीच मायावती और उमा भारती जैसी नेताओं ने तेलंगाना पुलिस की तारीफ़ करते हुए 'दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस को' उसने कुछ सीख लेने की नसीहत दी.

वहीं सासंद जया बच्चन ने 'देर आए, बहुत देर से आए लेकिन दुरुस्त आए' कहते हुए तेलंगाना पुलिस की प्रशंसा की. जया बच्चन ने तो कुछ ही दिन पहले संसद में ऐसे अपराधियों की लिंचिंग की पैरवी की थी.

सानिया नेहवाल से लेकर ऋषि कपूर तक कई लोकप्रिय हस्तियों ने सार्वजनिक तौर पर पुलिस को धन्यवाद दिया.

वरिष्ठ अधिवक्ता फ़ेलविया ऐग्निस ने इस एनकाउंटर को लोकतंत्र के लिए 'भयावह' बताते हुए कहा, "रात के अंधेरे में निहत्थे लोगों को बिना सुनवाई बिना अदालती कार्यवाही के मार देना भयावह है. पुलिस इस तरह से क़ानून अपने हाथों में नहीं ले सकती. इस तरह के एनकाउंटर को मिल रहे सार्वजनिक समर्थन की वजह से ही पुलिस की हिम्मत इतनी बढ़ जाती है कि वह चार निहत्थे अभियुक्तों को खुले आम गोली मारने में नहीं हिचकिचाते".

हैदराबाद पुलिस एनकाउंटर ने संसद के साथ-साथ सोशल मीडिया स्पेस को भी दो ध्रुवों में बाँट दिया है. लोग सोशल मीडिया पर नाचते हुए जश्न मना रहे हैं. हैदराबाद में आम निवासियों ने एनकाउंटर के बाद पुलिस पर फूलों की बारिश कर उनका स्वागत किया. वहीं सामाजिक कार्यकर्ता इस घटना को भारत में नरीवादी आंदोलन को पीछे ले जाता हुआ बताते हैं.

लोकतंत्र से भीड़तंत्र

राजधानी में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक संस्था 'हक़' से जुड़ी भारती अली कहती हैं इस एनकाउंटर की प्रशंसा देश में बढ़ रही 'ब्लड-लस्ट' या हिंसक तरीक़े से बदला लेने वाले व्यवहार का सामान्यकरण कर रहा है.

उन्होंने कहा, "यह एक दुखद दिन है. आज यह साबित हो गया कि एक जनता के तौर पर हमें क़ानून और न्याय व्यवस्था से कोई मतलब नहीं. मॉब लिंचिंग हो या इस तरह मुंह अंधेरे निहत्थे लोगों को बिना सुनवाई के मारना, जिस तरह हम हर असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी कार्रवाई का समर्थन करते हुए तालियाँ पीटते हैं, उससे यही पता चलता है की हमारे समाज में लोगों के अंदर ख़ून की प्यास है. हम लोकतंत्र से भीड़तंत्र होते जा रहे हैं."

BBC Hindi
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English summary
Biggest loss to women from Hyderabad encounter
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