चंद्रशेखर आजाद ने RSS पर पाबंदी लगाने की मांग की, दी बड़ी चुनौती

नई दिल्ली। भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने शनिवार को राष्ट्रीय स्वयंवसेवक संघ पर पाबंदी की मांग की है। उन्होंने आरएसएस को चुनौती दी है कि वह सीधे राजनीति के मैदान में आए और चुनाव लड़े। चंद्रशेखर ने यह बयान नागपुर में आरएसएस के मुख्यालय के पास रेशमीबाग मैदान में एक कार्यक्रम के दौरान दिया। इससे पहले नागपुर की पुलिस ने भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं कोक आरसएस के हेडक्वार्टर के पास रैली करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। बता दें कि चंद्रशेखर लगातार सीएए, एनआरसी का विरोध कर रहे हैं और उन्होंने आज आरक्षण के समर्थन में देशव्यापी बंद का आह्वाहन किया है।

 आरएसएस को दी चुनौती

आरएसएस को दी चुनौती

चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि आरएसएस भाजपा का वैचारिक संगठन है। आरएसएस को जमीनी हकीकत जानने के लिए खुद सीधा चुनाव के मैदान में आना चाहिए। इन लोगों को मनुवादी एजेंडा पर लोगों की राय के लिए चुनावी मैदान में आना चाहिए, बजाए इसके कि भाजपा का इस्तेमाल करें। आजाद ने कहा कि मैं संघ प्रमुख को सुझाव देना चाहता हूं कि झूठ का पर्दा हटाएं और मैदान में आएं। यह लोकतंत्र है। सीधा अपना एजेंडा लेकर मैदान में आएं और चुनाव लड़ें, लोग आपको बता देंगे कि वह मनुस्मृति में भरोसा करते हैं या फिर देश के संविधान में।

भाजपा के जरिए एजेंडा चला रहा आरएसएस

भाजपा के जरिए एजेंडा चला रहा आरएसएस

आजाद ने मोहन भागवत को बहस की चुनौती दी और कहा कि वह आरक्षण पर उनसे बहस करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, एनपीआर आरएसएस का एजेंडा है और वह अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं। उन्होंने अपील की कि महाराष्ट्र में महाअघाड़ी की सरकार एनपीआर को जनहित में ना होने दे। देश में एक समय आएगा जब देश में बहुजन की सरकार होगी और वह अन्य लोगों को आरक्षण देगी। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में आरक्षण पर अपना फैसला दिया था और कहा था कि आरक्षण देने के लिए राज्य सरकार बाध्य नहीं है और ना ही यह मौलिक अधिकार है।

आरक्षण के समर्थन में

आरक्षण के समर्थन में

भीम आर्मी के अलावा कई राजनीतिक दल भी इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। इसमें कांग्रेस, राजद, जदयू, लोजपा और कई दल शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी को अपने इस फैसले में कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण न तो मौलिक अधिकार है, न ही राज्य सरकारें इसे लागू करने के लिए बाध्य है। कोर्ट भी सरकार को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने अपने एक निर्णय में ये कहा है।

कोर्ट के फैसले पर रार

कोर्ट के फैसले पर रार

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उत्तराखंड हाईकोर्ट के 15 नवंबर 2019 के उस फैसले पर आया, जिसमें उसने राज्य सरकार को सेवा कानून, 1994 की धारा 3(7) के तहत एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए कहा था, जबकि उत्तराखंड सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था। मामला उत्तराखंड में लोक निमार्ण विभाग में सहायक इंजीनियर के पदों पर प्रमोशन में एससी/एसटी के कर्मचारियों को आरक्षण देने के मामले में आया है, जिसमें सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था, जबकि हाईकोर्ट ने सरकार से इन कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देने को कहा था। जिसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

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