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मसरत आलम के खून में भारत के लिए नफरत, देश के खिलाफ लिखा गीत

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन भाजपा के गले की हड्डी बन गया है। जिस तरह से अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री मोहम्मद मुफ्ती ने रिहा करने का ऐलान किया है। वह सीधे तौर पर भाजपा के लिए मुसीबत बन गयी है। लेकिन जिस मसर्रत पर इतना कोहराम मचा हुआ है उसकी हकीकत जानकर आप समझ जायेंगे कि आखिर ये हंगामा क्यों मचा हुआ है।

masarat alam

भारत को दे रगड़ा

दरअसल मसर्रत शुरुआत से ही भारत के खिलाफ अपना जहर उगलता आया है। मसर्रत ने भारत के खिलाफ एक गीत भी लिखा है जिसका नाम है भारत को दे रगड़ा। इस गीत के जरिए मसर्रत ने भारत के खिलाफ जमकर अपना जहर उगला था। जिसके बाद इसके खिलाफ कार्यवाही की गयी थी।

राज्य सरकार का मसर्रत पर दांव

मसर्रत को रिहा किये जाने के पीछे दो वजहें बतायी जा रही है। पहली वजह यह है कि मसर्रत हुर्रियत कांफ्रेंस को करीब ला सकता है जिससे कि एक बार फिर से शांति वार्ता की पहल को शुरु किया जा सकता है। वहीं मसर्रत की रिहाई के पीछे की दूसरी वहज यह भी हो सकती है कि वह एक बार फिर से भारत के खिलाफ वादी में लोगों की भड़काने का काम शुरु कर सकता है।

भारत के खिलाफ जहर उगलने के नाम पर सैयद गिलानी के बाद दूसरा नंबर मसर्रत का आता है। मसर्रत ने अपने गीत के जरिये जिस तरह से स्थानीय लोगों में भारत के प्रति जहर घोलने का काम किया है। उसके बाद मसर्रत के मंसूबे किसी से भी छिपे नहीं हैं।

भारत वापस जाओ से सुर्खियों में आया मसर्रत

यही नहीं मसर्रत अपने भाषणों के जरिये ही लोगों में जहर घोलने का काम नहीं करता है। बल्कि वह वादी में दीवारों पर भी भारत के खिलाफ नारे लिखकर लोगों में भारत के प्रति नफरत फैलाने का भी काम करता आया है। दीवारों पर भारत वापस जाओं के अपने नारे लिखने के बाद ही मसर्रत सुर्खियों में आया था।

तकरीबन 20 साल पहले जब उसने भारत के खिलाफ आग उगलने का सिलसिला शुरु किया वह बदस्तूर जारी है, जिसके चलते वह वादियों में काफी लोकप्रिय भी बन गया है।

महज 20 साल की उम्र में हुआ गिरफ्तार

मसर्रत (42) को पहली बार तब गिरफ्तार किया गया था जब वह सिर्फ 20 वर्ष का था। मसर्रत ने 1989 में अफ्स्पा के खिलाफ संघर्ष के समर्थन का भारत के खिलाफ सीधा समर्थन किया था। उस समय मसर्रत पर पीएसए के तहत मामला दर्ज करके जेल भेज दिया गया था। जिसके चलते वह 1996 तक सलाखों के पीछे रहा।

मसर्रत के खून में भारत के लिए नफरत है

मसर्रत के खिलाफ श्रीनगर के डिप्टी कमिश्नर ने पिछले साल जून माह में अशांति फैलाने के चलते पीएसए के तहत एक बार फिर मामला दर्ज किया था। उस वक्त डिप्टी कमिश्नर ने मसर्रत के बारे में कहा था कि मसर्रत के खून में भारत के खिलाफ नफरत है। मसर्रत के खिलाफ यह बयान 2008 से 2010 के बीच हुए खूनी संघर्ष के बाद दिया गया था। इस वाकये के बाद मसर्रत काफी लोकप्रिय हो गया था।

1996 में रिहाई के बाद मसर्रत ने मुस्लीम लीग का दामन था लिया था। जिसके बाद उसने कश्मीर के खिलाफ जहर उगलना शुरु कर दिया था। यही नहीं मसर्रत ने कश्मीर को पाकिस्तान को दिये जाने तक की वकालत भी शुरु कर दी थी। इस वाकये के बाद मसर्रत के खिलाफ कुल 27 मामले दर्ज हैं जिसमें देशद्रोह सहित हत्या के मामले भी दर्ज हैं।

अमरनाथ यात्रा के भी खिलाफ है मसर्रत

मसर्रत ने 2008 में अमरनाथ यात्रा के लिए बनाये जाने वाले रास्ते का भी कड़ा विरोध किया था। मसर्रत ने अमरनाथ यात्रा के हर फैसले हर फैसले का पुरजोर विरोध किया था यही नहीं उसने जंगलों की जमीन को भी इस यात्रा के लिए दिये जाने का विरोध किया था। जिसके तुरंत बाद उसे 2010 में गिरफ्तार कर लिया गया था। 2009 में वादियों की सड़कों पर प्रदर्शन के बाद मसर्रत को गिरफ्तार कर लिया गया था जिसके बाद भी प्रदर्शन जारी रहा ।

खूनी जंग में 110 लोगों की जान गयी

लेकिन जेल से रिहा होने के बाद एक बार फिर से उसने अपना अपना जहर उगलना शुरु कर दिया। वह फिर से भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने के काम जुट गया। इसी दौरान उसने भारत को रगड़ा नाम का गीत लिखा था। सड़को पर चले प्रदर्शन में तकरीबन 110 लोगों की मौत हुई थी। इस घटना के बाद भारत की मुश्किलें काफी बढ़ गयी थी, एक बार फिर से वादियों का हाल पुराने समय जैसा हो गया था।

क्या हुर्रियत को एक साथ ला पाएगा मसर्रत

जिस तरह से मसर्रत विवादों से हमेशा से ही जुड़ा हुआ है उससे इस बात में कोई भी संदेह नहीं है कि वह भारत के विरोध में है। लेकिन ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि क्या वह हुर्रियत को एक बार फिर साथ ला सकता है। जम्मू सरकार के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है कि सभी हुर्रियत नेताओं को एक साथ लाया जा सके।

हुर्रियत के दो धड़ों में बंट जाने से शांति की प्रक्रिया को धक्का पहुंचता आया है। हालांकि कयास लगाये जा रहे हैं कि मसर्रत हुर्रियत को साथ ला सकता है। लेकिन यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि गिलानी इस बाबत अपनी क्या राय रखते हैं।

वहीं पीडीपी को भरोसा है कि मसर्रत की रिहाई के बाद वादी में शांति प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सकता है। वहीं सेना और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इस काम के लिए बहुत प्रयासों की जरूरत है। साथ ही उन्हें इस बात में भी संदेह है कि मसर्रत इस काम को अंजाम देने में सफल हो पायेगा ।

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