Bengaluru Heat: झीलों का जलस्तर 9 फीट नीचे गिरा, गर्मी नहीं बल्कि ये कारण बने असली खतरा

Bengaluru lakes Water Level : बेंगलुरु में बढ़ती गर्मी और 35°C से ऊपर पहुंचे तापमान ने शहर की झीलों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। कई झीलें सूख रही हैं और कई झीलों का जलस्तर तेजी से गिर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ इसे पूरी तरह संकट नहीं मानते-उनके अनुसार यह एक प्राकृतिक मौसमी प्रक्रिया है, लेकिन प्रदूषण, अतिक्रमण और प्रशासनिक लापरवाही इस प्राकृतिक चक्र को अब खतरनाक मोड़ पर ले जा रही है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मौजूदा स्थिति पहले जैसी नहीं रही। अतिक्रमण, अनुपचारित सीवेज, ठोस कचरा और निगरानी की कमी ने झीलों की हालत को अधिक नाजुक बना दिया है। पहले जहां यह सूखना प्राकृतिक और लाभकारी माना जाता था, अब यह खराब रखरखाव के कारण गंभीर संकेत बनता जा रहा है।

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गाद निकासी और सफाई का अहम समय

विशेषज्ञों के अनुसार, गर्मियों का समय झीलों की सफाई और गाद निकालने के लिए सबसे उपयुक्त होता है। यदि इस दौरान प्लास्टिक और कचरा नहीं हटाया गया, तो मानसून के दौरान ये प्रदूषक पूरे जल में फैल जाते हैं। गाद की मोटी परत भूजल पुनर्भरण को भी बाधित करती है, इसलिए समय पर डीसिल्टिंग जरूरी है।

जलस्तर में तेज गिरावट का संकेत

शहरभर में झीलों का जलस्तर 4-5 फीट तक गिरा है, जबकि पूर्वी बेंगलुरु में यह गिरावट 8-9 फीट तक दर्ज की गई है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि झीलों के प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों कारक मिलकर जल संकट को बढ़ा रहे हैं।

'मृत झीलों' का खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि झीलों को सालभर उपचारित अपशिष्ट जल से भरा रखना भी नुकसानदायक हो सकता है। इससे झीलों का प्राकृतिक चक्र बाधित होता है और शैवाल वृद्धि, दुर्गंध और मच्छरों की समस्या बढ़ती है। खराब गुणवत्ता वाला पानी झील की मिट्टी और तलछट को भी नुकसान पहुंचाता है।

परंपरागत उपयोग पर भी असर

पहले झीलों की गाद को खेती में उपयोग किया जाता था, क्योंकि वह पोषक तत्वों से भरपूर होती थी। लेकिन अब सीवेज प्रदूषण के कारण इसकी गुणवत्ता पर सवाल उठने लगे हैं, जिससे यह परंपरागत प्रणाली भी प्रभावित हो रही है।

प्रशासनिक बदलाव से बढ़ी चुनौती

झील प्रबंधन में हुए प्रशासनिक बदलावों ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है। पहले एक समर्पित झील विभाग पूरे शहर में रखरखाव और बहाली का काम देखता था, लेकिन अब जिम्मेदारी अलग-अलग स्थानीय निकायों में बंट गई है। इससे समन्वय की कमी और जवाबदेही का संकट पैदा हो गया है।

सामूहिक प्रयास ही समाधान

कार्यकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा सूखा झीलों के पुनर्जीवन का अवसर हो सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि एजेंसियां मिलकर काम करें। सफाई, गाद निकासी, सीवेज नियंत्रण और आर्द्रभूमि विकास जैसे कदम समय रहते उठाए जाएं, तभी बेंगलुरु की झीलों को बचाया जा सकता है।

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