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Bengaluru: कर्नाटक में कन्नड़ के नाम पर क्यों उबलने लगा बेंगलुरु, क्या है इसके पीछे की वजह?

Bengaluru Kannada Protest: कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में बुधवार को अचानक कई दुकानों को निशाना बनाया गया। महानगर के विभिन्न हिस्सों में कई मॉल भी प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आ गए।

भारत की आईटी राजधानी और देश की सिलिकॉन वैली के तौर पर मशहूर बेंगलुरु को हुड़दंगियों के शहर में तब्दील करने वाले लोग नारायण गौड़ा गुट के कर्नाटक रक्षणा वेदिके (KRV) के कार्यकर्ता बताए जाते हैं।

bengaluru boiling on kannada

अंग्रेजी-साइनबोर्ड के नाम पर हुड़दंग
इन्होंने साइन बोर्ड पर कन्नड़ भाषा को प्रमुखता देने के लिए जागरूकता अभियान के नाम पर कानून को अपने हाथों में ले लिया था। खुद केआरवी का कहना है कि उसके कार्यकर्ताओं ने करीब 1,000 गैर-कन्नड़ (अंग्रेजी) साइनबोर्ड हटाया है।

लेकिन, इस उत्पात का असर क्या हुआ इसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि कम से कम 3 मॉल ने पूरे दिन के लिए अपना शटर बंद कर दिया।

बुधवार को पुलिस ने महिलाओं समेत इसके हजारों कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया था। गुरुवार को नारायण गौड़ा समेत 29 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

60% कन्नड़ भाषा वाला नियम क्या है?
अब इन घटनाओं के बैकग्राउंड में चलते हैं। बृहत बेंगलुरु महानगर पालिके ने एक नियम बनाया है कि सभी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को अपने साइनबोर्ड का 60% हिस्सा कन्नड़ भाषा में लिखना होगा।

यानी गाइडलाइंस ये है कि साइनबोर्ड के आधे से अधिक हिस्से में कन्नड़ भाषा में ही लिखा होना चाहिए। लेकिन, इसके लिए 28 फरवरी, 2024 की डेडलाइन दी गई है। ऐसा नहीं करने वाले दुकानों की लाइसेंस रद्द की जा सकती है। फिर, कर्नाटक रक्षणा वेदिके ने किसके इशारे पर बवाल किया?

गाइडलाइंस के पालन के लिए तैयार है कारोबारी
बेंगलुरु के व्यवसायियों का कहना है कि वह गाइडलाइंस का पालन करने के लिए तैयार हैं। फिर सवाल उठता है कि फिर क्या वजह बनी कि कर्नाटक रक्षणा वेदिके (KRV) ने इस तरह से उत्पात मचाना शुरू कर दिया?

ग्राहकों में आतंक मचाने का जिम्मेदार कौन?
कुछ कारोबारियों का कहना है कि अलग से कन्नड़ में साइनबोर्ड होने के बावजूद उनके अंग्रेजी वाले साइनबोर्ड तोड़ दिए गए। एक दुकानदार ने सोशल मीडिया पर लिखा है, 'अलग से कन्नड़ में साइनबोर्ड होने के बावजूद, अंग्रेजी साइनबोर्ड तोड़ दिए गए...यह सब देखकर दुकान के अंदर मौजूद ग्राहकों को अपनी जान की चिंता सताने लगी थी।'

किसके इशारे पर शांत बनी रही पुलिस?
कई नागरिकों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि उसने कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण करने की जगह उपद्रवियों को खुल्ला छोड़ दिया था और कन्नड़ समर्थकों को संपत्तियों को तबाह करने दिया।

तमिलनाडु के उत्तर-दक्षिण राजनीति का प्रभाव?
बेंगलुर आज सिर्फ कर्नाटक की राजधानी ही नहीं है, यह एक वैश्विक शहर के रूप में विकसित हुआ है। वहां अंग्रेजी को लेकर जिस तरह का हिंसक विरोध शुरू किया गया है, वह खासकर तमिलनाडु में चल रही उत्तर-दक्षिण और हिंदी भाषी राज्यों के खिलाफ राजनीति की वजह से महत्वपूर्ण हो गया है।

भाषाई आधार पर चुनावी एजेंडा सेट करने की कोशिश?
बेंगलुरु में बुधवार को कन्नड़ भाषा के नाम पर जिस तरह का माहौल बनाया गया, वह लोकसभा चुनावों को देखते हुए सामान्य नहीं है। क्योंकि, भाषा के आधार पर भावनाएं भड़का कर वोट बटोरने का हथकंडा कोई नया नहीं है।

सात महीने में ही राज्य में राजनीतिक समीकरण बदलने के बने आसार
तथ्य यह है कि कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार 7 महीने पहले ही भारी विजय के साथ बनी है। इन महीनों में राज्य में बड़ा राजनीतिक बदलाव यही हुआ है कि विपक्षी जेडीएस और बीजेपी ने हाथ मिला लिया है, जिससे कांग्रेस को जीत दिलाने वाले समीकरण बदलने के आसार बढ़ गए हैं।

बवाल से एक दिन पहले 'युवा निधि' योजना हुई लॉन्च
यह भी अजीब स्थिति है कि जिस दिन कन्नड़ भाषा के नाम पर बेंगलुरु में युवा सड़क से लेकर दुकानों के शटर के अंदर तक बवाल काट रहे थे, उससे एक दिन पहले ही सिद्दारमैया सरकार ने अपनी पांचवीं चुनावी गारंटी 'युवा निधि' योजना लॉन्च की है।

इसके तहत राज्य में स्नातक डिग्री धारी और डिप्लोमाधारी बेरोजगार युवाओं को हर महीने क्रमश: तीन हजार और डेढ़ हजार रुपए दिए जाने हैं। जब राज्य सरकार बेरोजगार युवाओं के लिए यह सकारात्मक कदम उठा रही है तो फिर उन्हें नकारत्मकता को हाथ में लेने का इशारा किससे मिल रहा है?

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