Bengal Election:8 चरणों में चुनाव से TMC की क्यों बढ़ गई है धड़कन, जानिए

कोलकाता: चुनाव आयोग ने शुक्रवार को जब से पश्चिम बंगाल में इस बार 8 चरणओं में विधानसभा चुनाव कराने की घोषणा की है, ममता बनर्जी और टीएमसी उसपर भाजपा के इशारों पर काम करने का आरोप लगा रहे हैं। लेफ्ट ने भी चुनाव आयोग पर उंगलियां उठाई हैं। सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ने ही इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया है। जबकि, चुनाव आयोग ने अपने फैसले को लेकर जो कारण गिनाए हैं, उसके पीछे पुख्ता आधार नजर आ रहे हैं। अब आइए समझते हैं कि हर पार्टी अपने नजरिए से इस फैसले की व्याख्या क्यों कर रही है और सत्ताधारी तृणमूल की बौखलाहट की असर वजह क्या है।

बंगाल के इतिहास में सबसे ज्यादा चरण का चुनाव

बंगाल के इतिहास में सबसे ज्यादा चरण का चुनाव

चुनाव आयोग ने बंगाल में 8 चरणों में चुनाव करवाने की जो घोषणा की है, वह राज्य के लिए मतदान करवाने का सर्वाधिक चरण है। प्रदेश के करीब 7,32,94,980 मतदाता 27 मार्च से लेकर 29 अप्रैल तक 1,01,916 पोलिंग बूथ पर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इस दौरान राज्य के कई जिलों मसलन- दक्षिण 24 परगना, उत्तर 24 परगना, पूर्वी मिदनापुर, पश्चिमी मिदनापुर और कई और जिलों में भी कई हिस्सों में मतदान करवाए जाएंगे। बंगाल के चुनावी इतिहास में यह एक अप्रत्याशित स्थिति है। बंगाल में 27 मार्च, 1 अप्रैल, 6 अप्रैल, 17 अप्रैल, 22 अप्रैल, 26 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोट डालने के बाद 2 मई को वोटों की गिनती होगी। इस तरह से चुनाव की घोषणा होने से लेकर चुनाव प्रक्रिया पूरे होने तक कुल 66 दिन लग जाएंगे। लेकिन, हम इतने लंबे चुनाव प्रकिया और इसको लेकर उठाए जा रहे सवालों पर विचार करने से पहले यह जान लेते हैं कि पिछले चुनाव में क्या हुआ था।

2016 में कैसे हुआ था बंगाल विधानसभा चुनाव का चुनाव

2016 में कैसे हुआ था बंगाल विधानसभा चुनाव का चुनाव

2016 में बंगाल में वैसे तो 7 चरणों में चुनाव हुए थे, लेकिन उसमें भी एक चरण में दो हिस्सों में चुनाव करवाए गए थे। यही नहीं पांच साल पहले चुनाव की प्रक्रिया पूरी करने में 77 दिन लग गए थे, यानी इसबार से 11 दिन ज्यादा। जबकि, तब राज्य में कुल 77,000 पोलिंग बूथ ही थे और हर चरण में करीब 11,000 मतदान केंद्रों पर ही वोटिंग करवाई गई थी। जबकि इसबार 31.65 फीसदी पोलिंग बूथ ज्यादा बनाए गए हैं, इस तरह से औसतन हर फेज में करीब 12,000 बूथों पर वोटिंग करवाई जाएगी।

8 चरण में चुनाव करवाने के पीछे चुनाव आयोग का तर्क

8 चरण में चुनाव करवाने के पीछे चुनाव आयोग का तर्क

कोविड प्रोटोकॉल के चलते इसबार मुख्यतौर पर मतदान केंद्रों में इतना ज्यादा इजाफा किया गया है। आयोग ने हर पोलिंग बूथ पर मतदाताओं की संख्या 1,000 से 1,500 के बीच निर्धारित कर दी है। इसके अलावा विभिन्न त्योहारों की वजह से भी चरण बढ़ाए गए हैं। इसके साथ ही ज्यादा बूथ होने के मद्देनजर सुरक्षा बलों की आवाजाही भी सहज रखने की कोशिश की गई है। राज्य में चुनावी हिंसा का जो इतिहास रहा है, उसे देखते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए सुरक्षा बलों की सटीक तैनाती जरूरी है। ज्यादा फेज में चुनाव करवाने से सुरक्षा बलों को बेहतर तरीके से तैनाती की जा सकेगी और इससे कानून और व्यवस्था बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी। यही वजह है कि चुनाव की घोषणा से पहले ही आयोग ने वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों की 125 कंपनियां भेज चुका है।

असमाजिक तत्वों पर लगाम लगाना आसान

असमाजिक तत्वों पर लगाम लगाना आसान

राजनीतिक दल भी मतदाताओं में भरोसा बहाल करने के लिए इसकी जरूरत पर जोर डाल चुके हैं। इस तरह से संवेदनशील इलाकों पर ज्यादा ध्यान देना आसान होगा और असमाजिक तत्वों को बेहतर ढंग से नियंत्रित किया जा सकेगा। कुछ संवेदनशील जिलों में अगर एक ही चरण में वोटिंग होगी तो बंगाल के निष्पक्ष चुनाव लगभग नामुमकिन है। उदाहरण के लिए दक्षिण 24 परगना में तीन हिस्सों में वोटिंग होगी। यह वही इलाका है, जहां दिसंबर में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर भारी सुरक्षा के बावजूद हमला किया गया था। यहीं के डायमंड हार्बर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी भी सांसद हैं।

टीएमसी क्यों कर रही है 8 चरण में चुनाव का विरोध

टीएमसी क्यों कर रही है 8 चरण में चुनाव का विरोध

सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को लगता है कि चुनाव लंबा खींचने से उसे खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। खासकर जिस तरह से उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल के कई जिलों में साथ-साथ चुनाव करवाए जाएंगे तो ममता बनर्जी को प्रचार के लिए नई रणनीति तय करनी पड़ेगी। क्योंकि, वह पार्टी की एकमात्र प्रमुख चेहरा हैं और हर फेज में हर इलाके में पहुंचने में उन्हें दिक्कत होगी। लेकिन, टीएमसी की असल परेशानी दूसरी है। कई जिलों में जहां कई चरणों में चुनाव होने हैं, वह ममता की पार्टी का गढ़ समझा जाता है। लेकिन, ये इलाका चुनाव के लिहाज से बहुत ज्यादा संवेदनशील भी रहे हैं। टीएमसी को लगता है कि यहां अलग-अलग चुनाव करवाने से कमजोर विपक्ष को अपना संगठन मजबूत करने का ज्यादा मौका मिलेगा। यही वजह है कि टीएमसी का आरोप है कि यह फैसला दक्षिण बंगाल में भाजपा की मदद करने के लिए किया गया है।

चुनाव आयोग की चुनौती

चुनाव आयोग की चुनौती

जहां तक बीजेपी की बात है तो ज्यादा चरणों में चुनाव से बीजेपी के बड़े नेताओं को पूरे राज्य में चुनाव प्रचार करने के लिए समय निकालना ज्यादा आसान हो सकता है। क्योंकि,पहले तीन फेज में चार राज्यों में भी चुनाव होने हैं। मतलब, बाद में बीजेपी के बड़े नेताओं को बंगाल पर पूरा ध्यान देने का मौका मिलेगा। वह बाद के पांच चरणों में यहां जमकर चुनावी रैलियां कर सकेंगे। वैसे चुनाव आयोग के लिए यह एक चैलेंज भी है।क्योंकि,कई जिलों में जहां विभिन्न चरणों में वोटिंग होनी है, वहां जिले के अंदर आवाजाही पर निगरानी में दिक्कत आ सकती है। क्योंकि, इंटर-डिस्ट्रिक्ट और इंटर-स्टेट मूवमेंट पर नजर रखना ज्यादा आसान है। इसमें दूसरे जिलों के असमाजिक तत्वों के भी घुस आने का जोखिम पेश आ सकता है। (कुछ तस्वीरें-फाइल)

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