बीबीसी विशेष: बीएचयू में बंदिशों के लिए ज़िम्मेदार कौन?
इसी साल सितंबर महीने के आख़िरी दिनों में जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एक छात्रा के साथ हुई छेड़खानी को लेकर छात्राएं और फिर उनके साथ छात्र भी सड़कों पर उतर आए तो इस एक घटना ने विश्वविद्यालय में लंबे समय से छिपी कई दकियानूसी परंपराओं का भी पर्दाफ़ाश किया.
छात्राओं के हॉस्टल में प्रवेश और उनके बाहर निकलने पर तमाम पाबंदियों के अलावा छात्रावासों में कोई महिला गार्ड न होने की बात भी उसी घटना के बाद सामने आई.
ये भी पता चला कि हॉस्टल में छात्राओं को शाकाहारी के अलावा कुछ और खाने की इजाज़त नहीं है. इंटरनेट और वाई-फ़ाई उन्हें हॉस्टल में इसलिए मुहैया नहीं कराए गए हैं कि वो उसके ज़रिए 'कुछ और' न देखने लगें, उन्हें वो तमाम आज़ादी मयस्सर नहीं है जो उनके साथ उसी विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले लड़कों को हासिल हैं.
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पहली बार को-एजुकेशन व्यवस्था
इसी घटना के बाद ये बात भी सार्वजनिक हुई कि विश्वविद्यालय के सौ साल से ज़्यादा के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब ग्रेजुएशन में लड़के और लड़कियां एक साथ कक्षा में पढ़ाई कर सकेंगे.
यानी अभी तक इस विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर को-एजुकेशन की व्यवस्था नहीं थी. लड़कों और लड़कियों की कक्षाएं अलग-अलग लगती थीं.
विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र अजय कृष्ण बताते हैं कि सौ साल के इतिहास में ये भी पहली बार हुआ है कि विश्वविद्यालय परिसर के भीतर किसी मामले की जांच के लिए क्राइम ब्रांच को लगाया गया है.
उनके मुताबिक, "ये बात अलग है कि यहां इससे पहले कई बड़ी आपराधिक घटनाएं हो चुकी हैं."
दरअसल, देश के विभिन्न विश्वविद्यालय परिसरों के भीतर पिछले कुछ वर्षों से अशांति का दौर चल रहा है और बीएचयू भी उससे अछूता नहीं रहा है. जानकारों का कहना है कि ये अशांति भिन्न विचारधाराओं की टकराहट की वजह से बढ़ रही है और उसी के चलते बीएचयू की प्रतिष्ठा भी काफी हद तक धूमिल हुई है.
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गुणवत्ता में आई कमी
लेकिन जानकारों का ये भी कहना है कि विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिष्ठा से लेकर कई स्तरों पर उसकी गुणवत्ता में कमी आई है और वो कमी महज़ कुछ दिनों की नहीं बल्कि लंबे समय से चल रही कई स्तरों पर खींचतान का परिणाम है.
बीएचयू के छात्र रहे और इस वक़्त बीएचयू में ही राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर कौशल किशोर मिश्र कहते हैं, "मालवीय जी ने इस विश्वविद्यालय को राष्ट्र निर्माण के एक मिशन के रूप में स्थापित किया था. मालवीय जी के समय तक या यों कहिए कि उनके बाद भी कुछ समय तक यहां सब ठीक-ठाक चला, लेकिन सत्तर-अस्सी के दशक से ही क्षरण की प्रक्रिया शुरू हो गई और वो निरंतर जारी रही. इसके लिए सबसे अधिक ज़िम्मेदार विश्वविद्यालय के प्रशासन और अध्यापन से जुड़े लोग हैं और कोई नहीं."
बीएचयू से पढ़े लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि उन्होंने न सिर्फ़ एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय में अध्ययन किया है बल्कि यहां विश्वस्तरीय लोगों ने अध्यापन कार्य किया है, यहां के कुलपति बने हैं और विश्व स्तर पर यहां के छात्रों ने नाम रोशन किए हैं.
लेकिन वही लोग इस बात से भी इनकार नहीं करते हैं कि पिछले कुछ समय से विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है और अब यहां वो माहौल नहीं रहा जैसा कि पहले रहता था.
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छात्रसंघ की नहीं हुई बहाली
बीएचयू छात्र संघ के पदाधिकारी रहे विनय तिवारी कहते हैं, "बीएचयू में छात्रसंघ को भंग कर देना और फिर उसे बहाल न करना भी यहां के पतन के लिए कम ज़िम्मेदार नहीं है. आज छात्रों के पास कोई ऐसा फ़ोरम या संगठन नहीं है जहां वो अपनी बात रख सकें. उन्हें अपनी बात सीधे चीफ़ प्रॉक्टर या कुलपति के पास ही ले जानी पड़ेगी और इसका कमोबेश वही हश्र होगा जैसा पिछले दिनों छेड़छाड़ से पीड़ित लड़की का हुआ."
प्रख्यात साहित्यकार डॉक्टर काशीनाथ सिंह बीएचयू के ही छात्र रहे हैं और लंबे समय तक बीएचयू में उन्होंने अध्यापन का भी काम किया है. विनय तिवारी की बात से वो भी सहमत हैं.
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'पहले नहीं होती थी मनमानी'
काशीनाथ सिंह कहते हैं, "मैं 1953 में यहां आया और उस समय बीएचयू का हिन्दी विभाग अद्वितीय समझा जाता था. लेकिन सच्चाई ये है कि यहां के जितने विभाग थे, वो सब उसी स्तर के थे. इसके अलावा पूरे विश्वविद्यालय का सिस्टम बड़ा लोकतांत्रिक था. छात्रसंघ था, छात्र अपने बीच से ही अपने प्रतिनिधि चुनते थे और संसद के अनुकरण पर छात्रसंघ की प्रक्रिया चलती थी. एक स्पीकर होता था और साल में एक या दो बार बजट पेश किया जाता था. कर्मचारी संघ था, अध्यापक संघ था. इन संगठनों के ज़रिए स्वस्थ राजनीति भी होती थी और सभी को अपनी बात को रखने का एक मंच मिलता था जिससे कुलपति, प्रशासनिक अधिकारी या फिर प्रॉक्टोरियल बोर्ड के लोग मनमानी नहीं कर पाते थे."
काशीनाथ सिंह कहते हैं कि इन संगठनों पर अराजकता का आरोप लगाकर बाद में इन्हें भंग तो कर दिया गया, लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ है और विश्वविद्यालय ने जितनी प्रगति की है, वो सबके सामने है.
बीएचयू के छात्रों का कहना है कि वो छात्र संघ बहाली के लिए लगातार आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन है कि उनकी सुनता ही नहीं.
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में डॉक्टर राधाकृष्णन लंबे समय तक कुलपति रहे. उनके बाद अमरनाथ झा, गोविन्द मालवीय, आचार्य नरेंद्र देव, सीपी रामास्वामी अय्यर, त्रिगुण सेन, कालू लाल श्रीमाली जैसे लोग कुलपति रहे.
लेकिन बाद के दिनों में विश्वविद्याल के इस सर्वोच्च पद पर भी उतने प्रतिष्ठित लोग नहीं बैठे, और जो बैठे भी उन्होंने शायद उस पद के अनुरूप काम नहीं किया.
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क्या हैं समस्याएं?
वाराणसी में संकट मोचन मंदिर के महंत और बीएचयू के इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफ़ेसर विश्वंभर नाथ मिश्र कहते हैं, "बीएचयू में पहले कुलपति पद के लिए आवेदन नहीं मंगाए जाते थे बल्कि प्रतिष्ठित लोगों से यहां की एग्ज़िक्यूटिव काउंसिल कुलपति बनने का आग्रह करती थी. ज़ाहिर है ऐसे लोग जब कुलपति बनते थे तो न सिर्फ़ इसकी प्रतिष्ठा को बढ़ाते थे बल्कि उनके अधीन काम करने वाले प्राध्यापक भी निष्ठापूर्वक अपना दायित्व निभाते थे."
यूं तो बीएचयू के मौजूदा छात्र भी अपने पुराने छात्रों की तरह यहां का विद्यार्थी होने पर गर्व का अनुभव करते हैं, लेकिन बातचीत में यहां की तमाम समस्याओं को एक सांस में कह जाते हैं.
बिड़ला छात्रावास में रहने वाले शोध छात्र सुमित यादव कहते हैं, "विश्वविद्यालय को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया है राजनीति ने. छात्रसंघ यहां भले ही नहीं है, लेकिन छात्र आपको विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में बंटे दिखेंगे. उसका सबसे घातक स्वरूप ये है कि इस राजनीति में छात्र और अध्यापक एक साथ खड़े दिखते हैं."
छात्रों को इस बात का मलाल है कि विश्वविद्यालय का लंबा-चौड़ा बजट होने के बावजूद विभागों में न तो शोध की उच्चस्तरीय व्यवस्था है और न ही उस स्तर का शोध यहां हो रहा है.
जानकार इसके लिए पिछले कुछ वर्षों में हुई अध्यापकों की नियुक्तियों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.
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नियुक्तियों में जातीय समीकरण
वाराणसी के स्थानीय पत्रकार नीलांबुज तिवारी कहते हैं कि पिछले कई साल से ये देखने में आया है कि योग्यता दरकिनार कर दी जाती है और कुलपति के सजातीय लोग नियुक्ति का लाभ उठा लेते हैं.
पंजाब सिंह कृषि वैज्ञानिक हैं. बीएचयू के अलावा दो अन्य विश्वविद्यालयों के भी कुलपति रहे हैं. नियुक्तियों में जातीय समीकरणों की बात को वो भी नहीं नकारते.
उनका कहना है, "कुलपतियों पर ये आरोप लगे हैं कि उन्होंने नियुक्तियों में भेद-भाव किया है और मेरा मानना है कि ये आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद भी नहीं हैं. लेकिन एक सच्चाई और है कि नियुक्ति के लिए कई बार योग्य लोग मिलते ही नहीं हैं और तब विवशता में कम योग्य लोगों को नियुक्त करना पड़ता है. निश्चित तौर पर उसका प्रभाव न सिर्फ़ शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ता है बल्कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है."
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बंदिशें हैं बहुत
जैसा कि शुरू में कहा गया है, बीएचयू में छात्राओं को लेकर तमाम ऐसे नियम अभी तक लागू थे जो शायद दूसरे विश्वविद्यालयों में नहीं हैं. यही नहीं, छात्राओं की शिकायत है कि हॉस्टल में तमाम बंदिशें लागू होने के बावजूद कैंपस के भीतर छात्राओं से अक़्सर छेड़छाड़ होती है, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन छात्राओं की ऐसी शिकायतों की अनदेखी करता रहता है.
विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर और राजस्थान विश्वविद्यालय की कुलपति रह चुकीं डॉक्टर चंद्रकला पडिया कहती हैं कि आज से 30-40 साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी.
हालांकि सितंबर में हुई घटना के बाद डॉक्टर रोयाना सिंह महिला चीफ़ प्रॉक्टर बनीं और वो बीएचयू के इतिहास में पहली महिला चीफ़ प्रॉक्टर हैं.
रोयाना सिंह कहती हैं कि उनके सामने लड़कियां ऐसी शिकायतें लेकर आई हैं और वो उन्हें दूर करने की कोशिश कर रही हैं.
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सितंबर में हुए विवाद के वक़्त जब कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में ये कहा कि वो 'बीएचयू से राष्ट्रवाद को ख़त्म नहीं होने देंगे' तो उनके इस बयान ने काफ़ी चर्चा बटोरी.
साहित्यकार काशीनाथ सिंह चुटकी लेते हैं, "हमारे समय में तो बीएचयू में सभी राष्ट्रवादी थे. उस समय राष्ट्रवाद जैसी समस्या नहीं थी. जब से राष्ट्रवाद को समस्या के रूप में देखा जाने लगा है तो देखने वालों को बीएचयू में ही नहीं, पूरे देश में राष्ट्रवाद पर संकट दिख रहा है."
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