भारत के बालकृष्ण दोशी को 'आर्किटेक्चर का नोबल'
भारत के बालकृष्ण दोशी ने आर्किटेक्चर का प्रतिष्ठित प्रित्ज़कर पुरस्कार जीत लिया है. उन्हें यह पुरस्कार कम लागत के घर डिजाइन करने के लिए दिया गया है.
90 साल के बालकृष्ण पहले भारतीय हैं जिन्हें ये सम्मान दिया जाएगा. ये आर्किटेक्चर के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान है. इसे आम बोलचाल में 'आर्किटेक्चर का नोबल' भी कहते हैं.
उन्हें मई के महीने में टोरंटो में सम्मानित किया जाएगा. इनाम के रूप में उन्हें करीब 65 लाख रुपए दिए जाएंगे.
ये सम्मान पाने वालों में सिडनी ओपेरा हाउस के डिजाइनर जॉर्न अटजॉन, ब्राज़ील के ऑस्कर नेमर और ब्रिटिश-इराकी डिजाइनर ज़ाहा हदीद के नाम शामिल हैं.
प्रित्ज़कर की ज्यूरी ने कहा, "बालकृष्ण दोशी ने हमेशा संजीदा वास्तुकलाएं बनाई हैं. उनके डिजायन हमेशा आम चलन से अलग रहे हैं."
ज्यूरी ने आगे कहा कि बालकृष्ण ने हमेशा यह दिखाया है कि अच्छी वास्तुकला और शहरी योजना में उद्देश्य और ढांचे के साथ-साथ इसे बनाने के समय जलवायु, स्थान, तकनीक, कारीगरी और हस्तकला का भी ध्यान रखना चाहिए."
ज्यूरी ने कहा, "वास्तुकला अपने उद्देश्यों से परे इंसान को दर्शन और काव्य से जोड़ने वाली होनी चाहिए."
'सपनों का विस्तार'
बालकृष्ण ने ज्यूरी को शुक्रिया कहा है. उन्होंने कहा कि उनका काम उनके जीवन, दर्शन और सपनों का विस्तार है जो मिलकर एक अलग तरह की वास्तुकला बनाने की कोशिश करते हैं.
बालकृष्ण ने एएफपी न्यूज एजेंसी से कहा, "हमारे इर्द-गिर्द जो भी चीजें हैं- रोशनी, आसमान, पानी और आंधी, सबकुछ एक स्वर में होते हैं. ये स्वर वास्तुकला ही तो हैं."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर बालकृष्ण दोशी को बधाई दी है.
https://twitter.com/narendramodi/status/971432252696653827
बालकृष्ण के काम के बारे में जानें
बालकृष्ण ने बहुत सारे काम किए हैं जिनमें कॉम्प्लेक्स, आवासीय योजना, सार्वजनिक स्थल, गलियारे और निजी आवास शामिल हैं.
उन्होंने बेंगलुरू के एक टॉप मैनेजमेंट स्कूल की बिल्डिंग डिज़ाइन की है. इसके अलावा उन्होंने सस्ते घर के सपने को भी साकार किया है.
उन्होंने इंदौर में 6500 घर डिजाइन किए हैं जिनमें आज माध्यम और कम आय वाले परिवारों के करीब 80 हज़ार सदस्य रहते हैं. यह देश की सबसे सस्ती आवास योजना है.
बालकृष्ण ने 1954 में कहा था, "ऐसा लगता है कि मुझे प्रण लेना चाहिए कि मैं कम आय वाले लोगों के सस्ते और अच्छे घर का सपना पूरा करूंगा और इसे ज़िंदगीभर याद रखूं."
बालकृष्ण दोशी ने 1947 में मुंबई के ख्यातिप्राप्त संस्थान सर जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर से पढ़ाई की.
उन्होंने आधुनिक वास्तुकला के ख्यातिप्राप्त स्विस-फ्रेंच आर्किटेक्चर ली करबुसिएर के साथ भी काम किया. बाद में वो 1954 में भारत लौट आएं. उन्होंने चंडीगढ़ और अहमदाबाद के आधुनिकीकरण के लिए काम किया.
उन्होंने 20वीं सदी के सबसे बड़े आधुनिक डिजाइनर लुइस काह्न के साथ मिलकर भी काम किया.












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