बाबरी विध्वंस में 49 मुकदमे दर्ज हुए लेकिन क्यों नहीं हुई एक को भी सजा? 6 दिसंबर 1992 के बाद क्या-क्या हुआ?
6 दिसंबर 1992... भारत के लोकतांत्रिक यात्रा का सबसे दर्दनाक दिन। इस दिन अयोध्या में जो हुआ, वो इतिहास बन गया। बाबरी मस्जिद का विध्वंस...ये एक ऐसा क्षण था, जब धार्मिक और सांप्रदायिक ताकतों ने कानून के शासन को दबा दिया...जब भीड़ संवैधानिक मूल्यों पर भारी पड़ गई। आज 6 दिसंबर 2024 को इस घटना के 32 साल हो गए हैं।
आज से 32 साल पहले 6 दिसबंर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के करीब दिन में 12 बजे हजारों की संख्या में कारसेवक आए और शाम पांच बजे तक बाबरी ढांचा गिरा दिया, लोग वहां से मिट्टी और ईंटे भी उठाकर ले गए। 6 बजे तक वहां एकदम सन्नाटा हो गया था। इस मामले में सालों तक केस चला लेकिन सजा किसी को नहीं हुई।

6 दिसंबर की ये कहानी 3 दिसंबर से ही शुरू हो गई थी। 3 दिसंबर 1992 को अयोध्या में शाम को कारसेवक पाइपलाइन बिछाने के लिए गड्ढा खोद रहे थे, जहां कारसेवा होनी थी। उन्हें पता था कि सुप्रीम कोर्ट ने विवादित ढांचे के परिसर में कुछ भी करने से मना किया हुआ है लेकिन उन्हें इस बात की परवाह नहीं थी। लेकिन इस बात का पता जैसे ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए पर्यवेक्षक डिस्ट्रिक्ट जज प्रेम शंकर गुप्ता को मिली, उन्होंने फौरन डीएम को बुलाया। लेकिन कारसेवकों ने उनकी एक ना सुनी।
अब कहानी 6 दिसंबर 1992 की...
6 दिसंबर तक अयोध्या में 5 से 6 लाख कारसेवक जुटे थे। इस दिन सुबह-सुबह कारसेवक सरयू जल और बालू से राम जन्मभूमि के परिसर की पूजा करना चाहते थे। वो सरयू से पानी और बालू लेकर जा रहे थे। विवादित ढांचे से लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर रामकथा कुंज था, जहां भाजपा और वीएचपी की बैठक हो रही थी। इस बैठक में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा, अशोक सिंघल जैसे तमाम दिग्गज मौजूद थे।
आठ बजे के आसपास वहां विजया राजे सिंधिया भी आईं और विवादित ढांचे के सामने बने चबूतरे के पास गईं...जहां कारसेवक पूजा कर रहे थे। लेकिन इसी बीच पूजा के दौरान 12 से 12:15 मिनट के बीच अनाचक लोग भड़क गए। भीड़ बाबरी ढांचे की सुरक्षा में लगे-लगे लोहे के मोटे-मोटे पाइप पर चढ़ने लगी....और देखते-देखते भीड़ ने विध्वंस शुरू कर दिया। 1 बजकर 30 मिनट पर पहला गुंबद गिराया गया और 5 बजे तक सबकुछ तोड़ दिया गया...वहां आसपास कुछ अवशेष भी नहीं बचा था। शाम 6 बजे वो जगह विरानी हो गई।
अब कहानी 6 दिसंबर 1992 के बाद की...
🔴 बाबरी विध्वंस के वक्त उत्तर प्रदेश में भाजप की कल्याण सिंह की सरकार थी। सीएम कल्याण सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि उनकी सरकार विवादित बाबरी ढांचे की सुरक्षा करेगी। भाजपा की ओर से विजया राजे सिंधिया ने भी लिखित में सुप्रीम कोर्ट को ये बात कही थी। बाबरी विध्वंस के बाद इनके वादों पर सवाल उठने लगे।
🔴 बाबरी विध्वंस मामले में राम जन्मभूमि एसओ प्रियंवदा नाथ शुक्ला ने पहली एफआईआर संख्या 197/1992 दर्ज कराई थी। इस एफआईआर में लिखा गया था कि लाखों कारसेवकों ने बाबरी ढांचे पर हमला करके गिराया है। इन कारसेवकों पर धर्म के आधार पर नफरत फैलाने, डकैती, लूट-पाट और मारपीट के आरोप लगे थे।
🔴 बाबरी विध्वंस मामले में राम जन्मभूमि थाने के एसआई गंगा प्रसाद तिवारी ने दूसरी एफआईआर संख्या 198/1992 दर्ज कराई थी। इस एफआईआर में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी का भी नाम था। इसके अलावा वीएचपी के तत्कालीन महासचिव अशोक सिंघल, बजरंग दल के नेता विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया का भी नाम शामिल था। इन सभी के ऊपर भड़काऊ भाषण देने का आरोप था। कहा गया था कि इनके भड़काऊ भाषण को सुनने के बाद भीड़ ने गुस्से में आकर बाबरी ढांचा गिरा दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक इन नामजद आरोपियों को हिरासत में भी लिया गया था। फैजाबाद में ट्रायल संभव नहीं होने की वजह से इस केस को रायबरेली ट्रांसफर कर दिया गया था।
🔴 इस केस में इन दो एफआईआर के अलावा और 47 केस दर्ज की गई थी यानी 6 दिसंबर 1992 की घटना से जुड़ी कुल 49 एफआईआर दर्ज की गई। इसमें अधिकांश मामले पत्रकारों और रिपोर्टरों से जुड़ी मारपीट की थी। मार्च 1993 तक इन सभी केस में 49 लोगों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की गई थी।
🔴 इस मामले की दो मुख्य एफआईआर संख्या 197/1992 और संख्या 198/1992 एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी। इसलिए इस केस में सीबीआई ने लखनऊ की कोर्ट में एक कंपोजिट चार्जशीट दाखिल की थी। जिसके बाद लखनऊ कोर्ट ने ये तय किया कि आरोपियों के खिलाफ अब किन-किन धाराओं में मुकदमा चलेगा। इसके बाद आडवाणी, जोशी, उमा भारती जैसे तमाम 8 आरोपियों ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की। जिसपर कोर्ट ने कहा कि ये दोनों केस अलग-अलग है। जिसके बाद आडवाणी समेत 8 लोगों का केस फिर से रायबरेली कोर्ट में चला गया। लेकिन फिर इसके खिलाफ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 2001 में कहा कि दोनों केस लखनऊ में ही चलने चाहिए...और फिर आडवाणी समेत 8 लोगों का केस लखनऊ में चलने लगा।
🔴 2003 में सीबीआई ने आडवाणी समेत 8 लोगों के खिलाफ सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की। इसमें बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने वाला आरोप जोड़ा नहीं गया था...क्योंकि इस केस में अलग एफआईआर की गई थी। इधर रायबरेली कोर्ट ने सबूत के अभाव में आडवाणी समेत 8 लोगों को बरी कर दिया था।
🔴 इसके बाद साल 2005 में इलाहाबाद हाइकोर्ट ने रायबरेली कोर्ट के इस आदेश रद्द कर दिया। इसके बाद फिर से आडवाणी समेत 8 लोगों के खिलाफ रायबरेली कोर्ट ने आरोप तय किए, जिसमें पहली गवाही 2007 में हुई।
🔴 रिपोर्ट के मुताबिक ये केस 28 साल चला। 49 आरोपियों में 17 लोगों का निधन तो ट्रायल के दौरान ही हो गया। इसके बाद आया 30 सितंबर 2020 को वो दिन, जब लखनऊ की सीबीआई कोर्ट ने आडवाणी समेत 32 आरोपियों को सबूत के अभाव में बरी कर दिया।
🔴 इस केस में लगभग 500 गवाह थे, 70 कैसेट सबूत के तौर पर पेश किए गए थे, फोटो और वीडियो थे, लेकिन फिर भी सीबीआई कोर्ट के सामने ये साबित नहीं कर पाई थी कि ये कोई षड्यंत्र था। इसमें सबसे बड़ी बात ये थी कि किसी भी सरकारी अधिकारी या पुलिस वाले ने यह नहीं कहा था कि ढांचा गिराने वालों में नामजद आरोपियों का हाथ था।
🔴 बाबरी केस में ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में रिवीजन पिटीशन दायर की गई थी। लेकिन हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया गया था। सीबीआई ने इस फैसेल में कोई अपील नहीं की थी।
🔴हालांकि उस वक्त के मीडिया रिपोर्ट में सीबीआई के जांच के तरीकों पर भी सवाल उठाया गया था। कहा गया था कि सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में इस बात पर ज्यादा प्रकाश नहीं डाला था कि बाबरी का ढांचा गिराने वाले या माहौल बिगाड़ने वाले आखिर वो लोग कौन थे? इसमें ये भी नहीं बताया गया था कि आखिर 12 बजे तक सबकुछ ठीक था लेकिन फिर अचानक कैसे क्या हुआ? क्या इसमें कोई आतंकवादी संगठन शामिल था? या फिर अंतरराष्ट्रीय संगठन का काम था...सीबीआई को इसपर भी गौर करना चाहिए था।












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