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बाबरी विध्वंस केस पर फैसला आज: जानें क्यों है इतना अहम और उमा भारती, आडवाणी-जोशी पर क्या है आरोप

बाबरी विध्वंस केस पर फैसला आज: जानें क्यों है इतना अहम और उमा भारती, आडवाणी-जोशी पर क्या है आरोप

लखनऊ: Babri Masjid demolition case: बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में लखनऊ की विशेष सीबीआई अदालत आज अपना फैसला सुनाएगी। अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को विध्वंस किया गया था। बाबरी मस्जिद विध्वंस ने भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद सबसे घातक दंगों को जन्म दिया और लगभग इसमें 2,000 लोग मारे गए। इस मामले में कोर्ट में 351 गवाहों को पेश किया गया है और 600 दस्तावेज भी साक्ष्य के रूप में पेश हो चुके हैं। लाल कृष्ण आडवाणी (LK Advani), मुरली मनोहर जोशी (Murli Manohar Joshi), उमा भारती (Uma Bharti) सहित 32 आरोपियों पर फैसला आज (30 सितंबर) आएगा।

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    Babri Masjid Demoliton पर आज फैसला, Uma Bharti, Joshi और LK Advani पर क्या आरोप? | वनइंडिया हिंदी
    बाबरी विध्वंस केस में कुल 47 FIR हुई दर्ज

    बाबरी विध्वंस केस में कुल 47 FIR हुई दर्ज

    बाबरी विध्वंस मामले में अबतक कुल 49 एफआईआर दर्ज हो चुकी है। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को विध्वंस करने को लेकर सबसे पहले अयोध्या में दो एफआईआर दर्ज की गईं। पहला एफआईआर कारसेवकों, या धार्मिक स्वयंसेवकों के खिलाफ था।

    इसमें एक एफआईआर फैजाबाद के थाना रामजन्म भूमि में एसओ प्रियंवदा नाथ शुक्ला ने दर्ज करवाई थी, वहीं दूसरी एफआईआर गंगा प्रसाद तिवारी ने दर्ज करवाई थी। बाकी 45 एफआईआर अलग-अलग तारीखों पर पत्रकारों और फोटोग्राफरों ने दर्ज करवाई थीं।

    उमा भारती, आडवाणी-जोशी पर क्या है आरोप

    उमा भारती, आडवाणी-जोशी पर क्या है आरोप

    दूसरी एफआईआर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित कई बीजेपी नेताओं के नाम थे। एफआईआर में उनपर आरोप था कि उमा भारती, आडवाणी-जोशी बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के वक्त वहां मौजूद थे। एफआईआर में यह भी कहा गया कि आडवाणी ने मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर के लिए अभियान चलाया। 2017 में ही लखनऊ कोर्ट ने आडवाणी समेत सभी आरोपित बीजेपी नेताओं पर बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आपराधिक साजिश के आरोप तय करने का आदेश दिया।

    8 जुलाई, 1993 को जांच के लिए CBI कोर्ट का गठन किया गया

    8 जुलाई, 1993 को जांच के लिए CBI कोर्ट का गठन किया गया

    इस मामले की सुनवाई के लिए 8 जुलाई, 1993 को रायबरेली में एक विशेष सीबीआई अदालत का गठन किया गया था। 28 जुलाई, 2005 को आरोप तय किए गए और 57 गवाहों ने अपने बयान दर्ज किए। मामले में 28 लोगों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 30 मई, 2017 को मामले को लखनऊ अदालत को स्थानांतरित कर दिया।

    2019 से अबतक इस केस में क्या हुआ?

    2019 से अबतक इस केस में क्या हुआ?

    19 जुलाई, 2019 को मामले में आपराधिक मुकदमे को छह महीने तक पूरा करने की समय सीमा बढ़ा दी गई। अंतिम आदेश के लिए नौ महीने की समय सीमा तय की। नौ महीने की समय सीमा 19 अप्रैल को समाप्त हो गई और विशेष न्यायाधीश ने 6 मई को सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर समय बढ़ाने की मांग की। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को फैसले के लिए 31 अगस्त की नई समय सीमा तय की। अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से फैसले की समय सीमा 3 सितंबर तक के लिए बढ़ा दी थी।

    एक सितंबर को इस मामले में बचाव और अभियोजन की बहस पूरी हुई थी। दो सितंबर 2020 से कोर्ट ने अपना फैसला लिखना शुरू कर दिया था। जिसे 30 सितंबर को सुनाया जाएगा।

    आडवाणी, जोशी, उमा सहित 32 लोग आरोपी

    आडवाणी, जोशी, उमा सहित 32 लोग आरोपी

    सीबीआई ने जांच के बाद 49 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। जिसमें 17 लोगों की मौत हो गई और 32 लोगों पर ही केस चला। जिसमें एलके आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, चंपत राय, महंत धर्मदास, स्वामी साक्षी महाराज, महंत नृत्य गोपाल दास, पवन कुमार पांडेय, ब्रज भूषण सिंह, रामविलास वेदांती सहित 32 लोगों के नाम हैं। जिनपर 30 सितंबर यानी बुधवार को फैसला आएगा।

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