अयोध्‍या विवाद: अंतिम नहीं होगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला, आगे भी हैं ये विकल्‍प

लखनऊ। देश के संभवत: सर्वाधिक चर्चित व विवादित अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में आज सुबह साढ़े दस बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाने जा रहा है। सुरक्षा के मद्देनजर पूरा अयोध्‍या नगरी छावनी में तब्‍दील हो चुकी है। प्रशासन जहां मुस्‍तैद है वहीं लोगों में इस बात को लेकर कौतूहल है कि अगर फैसला उनके पक्ष में नहीं आता है तो आगे का रास्‍ता क्‍या होगा। क्‍या कोई अब विकल्‍प बचेगा। क्या यह अंतिम फैसला होगा और सभी पक्षों को इस फैसले पर रजामंदी देनी होगी। तो आइए आपको बताते हैं फैसले के बाद क्‍या होगा विकल्‍प

इस जरिए दोबारा हो सकेगी अपील

इस जरिए दोबारा हो सकेगी अपील

कोर्ट के फैसले के बाद हर पक्ष के पास पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) डालने का मौका रहेगा। कोई भी पक्षकार फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकता है जिस पर बेंच सुनवाई कर सकती है। हालांकि कोर्ट को यह तय करना होगा कि वह पुनर्विचार याचिका को कोर्ट में सुने या फिर चैंबर में सुने। बेंच अपने स्तर पर ही इस याचिका को खारिज कर सकती है या फिर इससे ऊपर के बेंच को स्थानांतरित कर सकती है। हालांकि कोर्ट के फैसले के अब तक के इतिहास बताते हैं कि बेंच अपने स्तर पर ही याचिका पर फैसला ले लेता है।

ये होगा दूसरा और आखिरी विकल्‍प

ये होगा दूसरा और आखिरी विकल्‍प

सुप्रीम कोर्ट की ओर से पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुनाए जाने के बाद भी पक्षकारों के पास एक और विकल्प होगाऍ कोर्ट के फैसले के खिलाफ यह दूसरा और अंतिम विकल्प है जिसे क्यूरेटिव पिटीशन (उपचार याचिका) कहा जाता है। हालांकि क्यूरेटिव पिटीशन पुनर्विचार याचिका से थोड़ा अलग है, इसमें फैसले की जगह मामले में उन मुद्दों या विषयों को चिन्हित करना होता है जिसमें उन्हें लगता है कि इन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। इस क्यूरेटिव पिटीशन पर भी बेंच सुनवाई कर सकता है या फिर उसे खारिज कर सकता है। इस स्तर पर फैसला होने के बाद केस खत्म हो जाता है और जो भी निर्णय आता है वही सर्वमान्य हो जाता है।

अयोध्या विवाद: 1886 में फैजाबाद कोर्ट ने पहली बार सुनाया था फैसला

अयोध्या विवाद: 1886 में फैजाबाद कोर्ट ने पहली बार सुनाया था फैसला

गौरतलब है कि अयोध्या विवाद में पहली बार हिंसा 1853 में हुई और कुछ सालों में ही मामला गहरा गया। 1885 में विवाद पहली बार जिला न्यायालय पहुंचा। निर्मोही अखाड़े के महंत रघुबर दास ने फैजाबाद कोर्ट में मस्जिद परिसर में मंदिर बनवाने की अपील की पर कोर्ट ने मांग खारिज कर दी। इसके बाद सालों तक यह मामला चलता रहा है। 1934 फिर दंगे हुए और मस्जिद की दीवार और गुंबदों को नुकसान पहुंचा।

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