मोदी सरकार की राजनीति का शिकार हो गए डॉक्‍टर अविनाश चंदर!

बेंगलुरु। बुधवार को जब खबर आई कि केंद्र की मोदी सरकार ने डीआरडीओ प्रमुख डॉक्‍टर अविनाश चंदर के कार्यकाल को समय से पहले ही खत्‍म कर दिया है तो हर कोई हैरान रह गया। डॉक्‍टर अविनाश चंदर जो मई 2016 में रिटायर होने वाले डॉक्‍टर चंदर अब 31 जनवरी को ही डीआरडीओ प्रमुख का पद छोड़ देंगे। अब देशवासियों को कभी यह सुनने को नहीं मिलेगा कि जब कोई मिसाइल लांच हुई तो उससे एक रात पहले डॉक्‍टर चंदर को कैसी नींद आई।

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मोदी के फैसले का कवर अप

अविनाश चंदर को उनके पद से रिटायर करने की खबरों के करीब 18 घंटे के बाद रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर की ओर से इससे जुड़ा एक बयान दिया गया। उन्‍होंने बताया की उनकी ओर से ही पीएम नरेंद्र मोदी के सामने इस बात की सिफारिश की थी कि बेहतर होगा कि डीआरडीओ प्रमुख का पद कांट्रैक्‍ट से बंधे व्‍यक्ति के लिए नहीं होना च‍ाहिए। हो सकता है कि मनोहर पार्रिकर, पीएम मोदी की ही ओर से लिए गए किसी फैसले का कवर अप कर रहे हों।

एक बेहतर विदाई के हकदार

सरकार के फैसले से अलग कई लोग मानते हैं कि डॉक्‍टर अविनाश चंदर जिन्‍होंने देश की पहली इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) को देश के लिए सौंपने में अहम भूमिका अदा की उन्‍हें इससे ज्‍यादा सम्‍मानित तरीके से विदाई देनी चाहिए। डॉक्‍टर अविनाश चंदर की नियुक्ति यूपीए 2 के कार्यकाल में हुई थी और उनकी योग्‍यता को देखते हुए ही उनके कार्यकाल को बढ़ाया गया था।

साफ-सुथरा ट्रैक रिकॉर्ड

हैदाराबाद का मिसाइल कॉम्‍प्‍लेक्‍स वह जगह है जहां पर डॉक्‍टर चंदर ने अपने ज्‍यादातर प्रोजेक्‍ट्स का सपना देखा। बुधवार को यहां पर सन्‍नाटा पसरा हुआ था। यहां पर बतौर सीनियर डायरेक्‍टर काम कर रहे एक अधिकारी ने वनइंडिया के साथ बातचीत में कहा कि उनकी छवि एक साफ-सुथरी व्‍यक्ति की है। उनके खिलाफ कोई चार्जशीट भी नहीं है। उन्‍होंने हमेशा ही डीआरडीओ को मजबूत करने का काम किया और अब उनके न रहने से डीआरडीओ पर खासा असर पड़ेगा।

एक समर्पित बॉस

एक और वरिष्‍ठ वैज्ञानिक की मानें तो चंदर हमेशा से ही डीआरडीओ के एक ऐसे बॉस रहे जिन्‍होंने कभी भी खुद को ऑर्गनाइजेशन से बड़ा ब्रांड करार देने की कोशिश नहीं है। वह हमेशा ही अपनी टीम के साथ खड़े नजर आए। निर्भय मिसाइल लांच होने के समय लोगो ने देश की क्षमताओं पर भी सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। लेकिन अविनाश हमेशा ही टीम को फोकस बनाए रखने को कहते।

बलि का बकरा बने डॉक्‍टर अविनाश चंदर

बुधवार को मीडिया ने नरेंद्र मोदी के 'चलता है,' वाले बयान को खासतौर पर हाइलाइट किया। इसके बाद हर कोई बस डॉक्‍टर अविनाश चंदर को ही डीआरडीओ की दुर्गति के लिए जिम्‍मेदार बताने लगे।

डीआरडीओ के कई वर्षों से अटके प्रोजेक्‍ट्स, वरिष्‍ट अधिकारियों को उन्‍हें अपने प्रमोशन में रुकावट मानने की वजह से उनके खिलाफ होना और इस तरह के कई कैंपेन का नतीजा कहीं न कहीं डॉक्‍टर अविनाश को भुगतना पड़ा।

मीडिल लेवल साइंस्टिस ने इस पूरे मसले पर कहा कि डॉक्‍टर चंदर को इस तरह से रिटायर करने के तरीकों पर कई युवा वैज्ञानिक काफी हताश हैं। डॉक्‍टर चंदर ने युवा वैज्ञानिकों के साथ अपना संपर्क काफी मजबूत किया था। उन्‍होंने हमेशा ही उन्‍हें बताया कि अच्‍छा काम करने की अहमियत क्‍या होती है।

डीआरडीओ के अंदरुनी हालातों से वाकिफ

डीआरडीओ के अंदरुनी सूत्रों की मानें तो डॉक्‍टर अविनाश चंदर ऑर्गनाइजेशन के अंदर उन परियोजनाओं को काफी अच्‍छे से पहचानते थे जिनकी वजह से डीआरडीओ का नाम खराब हो रहा था।

एक और वैज्ञानिक की मानें तो डॉक्‍टर अविनाश जानते थे कि डीआरडीओ को कोई भी बड़ी सफलता तब तक नहीं मिल सकती जब तक यह प्रोजेक्‍ट्स बंद नहीं हो जाते। इसी दिशा में तीन उन परियोजनाओं की पहचान भी कर ली गई थी जो डीआरडीओ पर एक बोझ की तरह थे और ऑर्गनाइजेशन का नाम और काम बिगाड़ रहे थे।

मोदी के इच्‍छा के विपरीत डीआरडीओ

डीआरडीओ के एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि डीआरडीओ को कुछ लैब्‍स युवा वैज्ञानिकों के हाथ में देनी चाहिए। एक वरिष्‍ट वैज्ञानिक की ओर से कुछ दिनों पहले यह बात कही भी गई कि डीआरडीओ ने इस सिलसिल में प्रक्रिया भी शुरू दिया था। लेकिन सूत्रों की मानें तो डीआरडीओ कभी भी मोदी की इच्‍छा के मुताबिक काम करना ही नहीं शुरू कर पाया।

40 वर्षों का अनुभव भी दरकिनार

कई लोग अब रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर के उस बयान पर सवाल उठाने लगे हैं कि युवा वैज्ञानिक के पीछे की बात पर उनका तर्क क्‍या है। उन्‍होनें पार्रिकर से पूछा है कि जब 64 वर्षीय नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो फिर डॉक्‍टर अविनाश चंदर में क्‍या बुराई। उन्‍होंने सवाल भी किया कि सरकार ने उनके 40 वर्षों के अनुभव को ऐसे ही क्‍यों नजरअंदाज कर दिया।

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