कैसे टोनी एबॉट की वजह से देश के घरों में पहुंचेगी बिजली
नई दिल्ली। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री टोनी एबॉट, नई दिल्ली पहुंच चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभालने के बाद से अब तक कई डिप्लामैट्स का स्वागत किया है,लेकिन शुक्रवार को पहली बार उन्होंने किसी देश के प्रमुख का वेलकम किया।
देश में नई सरकार बनने के बाद टोनी, भारत आने वाले किसी देश के पहले प्रमुख हैं। एबॉट की इस भारत यात्रा पर भारत की तो नजरें हैं ही साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने भी इस पर अपनी नजरें बरकरार रखी हैं।
ऑस्ट्रेलिया में मौजूद विशेषज्ञों की मानें तो टोनी अपने इस भारत दौरे पर इस देश को यूरेनियम सप्लाई डील पर साइन करने को बेकरार हैं।
सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड ने लिखा है कि टोनी किसी देश के पहले प्रमुख होंगे जिन्हें नई सरकार बनने के बाद भारत में स्वागत किया गया है।
इस अखबार के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया इस समय ऐसी स्थिति में है जहां पर वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति को उसकी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए जरूरी यूरेनियम की आपूर्ति आसानी से कर सकता है।
एक नजर डालिए कि आखिर क्या है भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाली यह यूरेनियम डील, क्यों भारत के लिए इस डील का साइन होना इतनी जरूरी है और क्यों ऑस्ट्रेलिया इस बार भारत को इंतजार कराने के मूड में नहीं है।

न्यूक्लियर कैपेसिटी बढ़ने की उम्मीद
भारत अभी छह शहरों में 20 लेकिन छोटे रिएक्टर्स का संचालन कर रहा है। इनकी कैपसिटी 4,780 मेगावॉट है। सरकार वर्ष 2032 तक देश में 30 रिएक्टर्स और न्यूक्लियर कैपेसिटी को 63,000 मेगावॉट करने की उम्मीद रखे हैं। इस उम्मीद को पूरा करने में करीब 85 बिलियन डॉलर का खर्च आएगा।

बिजली संकट से राहत
नरेंद्र मोदी वर्ष 2019 तक देश को सर्वश्रेष्ठ देश बनाने का सपना देख चुके हैं। उनके इस सपने के तहत हर घर में बिजली होना काफी अहमियत रखता है। अगर ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम की आपूर्ति करने को राजी हो जाता है तो फिर भारत के बिजली संकट का हल हो सकता है।

भारत को दुनिया में शक्तिशाली बनाना
भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में न्यूक्लियर पावर से लैस देशों की लिस्ट में भारत को हमेशा सर्वोच्च रखना सबसे ऊपर है। यह डील उनके एजेंडे के लिए काफी अहम होने वाली है।

भारत की बढ़ी मुश्किलें
ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने वर्ष 2007 में भारत को यूरेनियम फ्यूल देने से साफ इंकार कर दिया था। हॉर्वड का मानना था कि क्योंकि भारत ने एनपीटी संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, ऐसे में वह भारत को यूरेनियम की आपूर्ति नहीं कर सकते हैं।

भारत की सख्त जरूरत
वर्ष 2012 में ऑस्ट्रेलिया ने भारत के लिए अपनी नीति में परिवर्तन किया। उस समय ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री केविन रुड ने सलाह दी थी कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के साथ ही अमेरिका के बीच एक सुरक्षा संधि हो जाए। लेकिन भारत ने इससे साफ इंकार कर दिया।

वर्ष 2011-2012 7,529 टन यूरेनियम
ऑस्ट्रेलिया जिसके पास कोई भी न्यूक्लियर पावर प्लांट नहीं है, दुनिया की यूरेनियम सप्लाई करने वाला अग्रणी देश है। वर्ष 2011-2012 के आंकड़ों पर अगर यकीन करें तो ऑस्ट्रेलिया के पास 7,529 टन यूरेनियम है। इसकी कीमत करीब 782 बिलियन डॉलर थी।

अमेरिका बना वजह
वर्ष 2008 में अमेरिका ने भारत के साथ डील साइन की जिसमें भारत को अमेरिका से न्यूक्लियर फ्यूल और टेक्नोलॉजी आयात करने की मंजूरी मिली। इस डील के बाद ही ऑस्ट्रेलिया, भारत पर लगे बैन को हटाने के लिए मजबूर हो सका। फिलहाल भारत इसी तरह का करार जापान के साथ भी चाहता है।

भारत एक बेहतर प्रतिद्वंदी
ऑस्ट्रेलिया का भारत के साथ व्यापार प्रतिवर्ष करीब 15 बिलियन डॉलर का है और यह चीन की तुलना में दस गुना कम है। एबॉट चाहते हैं कि भारत के साथ भी उनके व्यापारिक रिश्ते मजबूत हों। इसलिए वह किसी भी कीमत पर इस डील को अंतिम रूप देकर रहेंगे। वहीं एबॉट यह भी मानते हैं कि भारत कभी भी नॉर्थ एशिया के बाजार के लिए बड़ी मुसीबत नहीं बन सकता है।

भारत का मजबूत न्यूक्लियर प्रोग्राम
एबॉट जब गुरुवार को मुंबई में थे तो उन्होंने कहा था कि भारत के पास एक मजबूत न्यूक्लियर प्रोग्राम है और ऑस्ट्र्रेलिया के पास दुनिया का सबसे बड़ा न्यूक्लियर भंडार है। साथ ही उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के पास कोयले और नैचुरल गैस का भी अच्छा भंडार है।

100 मिलियन भारतीयों को देंगे रोशनी
एबॉट ने मुंबई में कहा था कि ऑस्ट्रेलिया इस बात को लेकर पूरी तरह से प्रतिबद्ध है कि वह 100 मिलियन भारतीयों की जिंदगी में रोशनी लाकर ही रहेंगे। एबॉट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया का कोयला करीब 100 मिलियन भारतीयों की तकदीर बदल सकता है।

भारत एनपीटी साइन करे
भारत ने अभी तक एनपीटी पर साइन नहीं किए हैं और इसे लेकर आलोचकों को खासा डर है। उनकी मानें तो ऑस्ट्रेलिया को एक ऐसे देश को यूरेनियम सप्लाई नहीं करना चाहिए जिसने एनपीटी संधि पर साइन न किए हुए हों क्योंकि यह एक खतरे वाला कदम साबित हो सकता है।

भारत एक समझदार देश
वहीं एबॉट का कहना है कि वह इस बात को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि इस डील के बावजूद कुछ नहीं होगा क्योंकि भारत एक समझदार देश है। भारत किसी को भी खतरा नहीं पहुंचा सकता है। साथ एबॉट ने भारत को एक उभरती हुई लोकतांत्रित सुपरपावर करार दिया है।
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