नज़रिया: भारत के यूनिवर्सिटी कैम्पसों में आख़िर चल क्या रहा है?

यूनिवर्सिटी, छात्र राजनीति, सांकेतिक तस्वीर
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क्या भारत के उच्च शिक्षा के परिसर अशांत हैं? ऐसा भ्रम होने का कारण है.

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की छात्राओं के आंदोलन की ख़बर कुछ वक्त तक मीडिया पर छाई रही. विश्वविद्यालय द्वार पर धरना देती छात्राएँ और फिर उन पर लाठी चार्ज, इस तस्वीर से कुछ बुज़ुर्गों को पिछली सदी के साठ, सत्तर या अस्सी के आरंभिक दशकों को याद करने की इच्छा हो रही है.

लेकिन क्या इस एक तस्वीर के सहारे हम इस नतीजे पर पहुँच सकते हैं कि भारत के परिसरों में उथल-पुथल चल रही है? इस भ्रम को पुष्ट करने के लिए पहले पिछले तीन वर्षों में अशांत परिसरों की कई और भी तस्वीरें हैं.

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पहले आईआईटी मद्रास, फ़िल्म और टेलीविज़न संस्थान, पुणे में छात्रों की बेचैनी की खबरें हम तक पहुचीं. इनमें हैदराबाद की हिंसा अधिक मुखर थी. उसके भी पहले ओस्मानिया यूनिवर्सिटी ख़बर में आई.

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हिंसा की ख़बरें

फिर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में तथाकथित राष्ट्रविरोधी नारों के लगने और कन्हैया की गिरफ्तारी! उसके बाद जादबपुर यूनिवर्सिटी में छात्रों का जुलूस. पुणे यूनिवर्सिटी के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज से हिंसा की ख़बरें पूरे देश में फैल गईं.

पिछले तीन साल में विश्वविद्यालयों में मीडिया ने अभूतपूर्व दिलचस्पी दिखाई. ऐसा लगने लगा कि पूरे भारत में विश्वविद्यालयों में खलबली मच गई है. लेकिन थोड़ा ठहर कर इन घटनाओं पर विचार करने से कुछ अलग तस्वीर सामने आती है.

ढाई-तीन दशक पहले तक राज्यों के विश्वविद्यालयों में अलग-अलग समय छात्रों के आंदोलन होते रहते थे. बिहार से सबसे अधिक ख़बर इम्तिहान की तारीख़ बढ़ाने के लिए किए जानेवाले आंदोलन की आती थी.

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राजनीतिक उत्तेजना

सत्तर के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में छात्रों की भागीदारी और फिर बिहार से उठे जयप्रकाश आंदोलन का केंद्र कॉलेज और यूनिवर्सिटी ही रहे थे. उसके भी पहले नक्सलबाड़ी के विद्रोह के बाद बिहार, बंगाल, दिल्ली के परिसरों में छात्रों के बीच एक राजनीतिक उत्तेजना देखी गई थी.

समय के साथ यह सब कुछ थम सा गया. परीक्षा को लेकर कोई चिंता भी नहीं रह गई. विश्वविद्यालयों की सूरत धीरे-धीरे बदलने लगी और किसी का ध्यान भी नहीं गया. कोचिंग इंस्टीट्यूट एक के बाद एक, अलग-अलग नौकरियों के लिए हुनर के वादे के साथ कॉलेज की जगह लेते गए.

छात्र कॉलेज में दाखिला ज़रूर लेते हैं, लेकिन उनसे उनका रिश्ता औपचारिक-सा ही रहता है. ज़्यादातर राज्यों में शिक्षकों की बहाली रुक गई. स्थाई अध्यापकों की जगह अनुबंध पर बहालियाँ होने लगीं. कॉलेज ऐसी जगहों में तब्दील हो गए जिनपर किसी का कुछ भी दांव पर नहीं लगा था.

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बदलती तस्वीर

इसका नतीजा यह हुआ कि परिसर प्रायः सिर्फ इम्तहान लेने और डिग्रियाँ बाँटनेवाली संस्था में बनकर रह गए. स्थानीय शक्ति समीकरण जो प्रायः राजनीतिक ही हुआ करते हैं, ज़रूर परिसरों को प्रभावित करते रहे हैं, लेकिन ज़्यादातर छात्र उससे अप्रभावित ही रहते हैं.

ऐसे किसी अध्ययन की जानकारी नहीं है जो कायदे से परिसरों की इस बदलती तस्वीर का एक जायज़ा लेता हो. परिसरों के खस्ताहाल होने पर रोनेवाला भी कोई न था. राजनीतिक दलों की दिलचस्पी उनमें वापस ज़िंदगी और मायने बहाल करने में नहीं. बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, हर जगह की कहानी एक सी है.

दाखिले बढ़े हैं, लेकिन परिसर उदास होते चले गए हैं. बिहार जैसे राज्य में भी जो शिक्षक आंदोलनों के लिए जाना जाता रहा है, परिसरों की मृत्यु अनदेखी ही गई. लालू यादव के राज में यह बेरहमी से हुआ. शिक्षकों को तनख्वाह तक के लाले पड़ने लगे और राजनेताओं ने नौकरशाहों की शह पर पदों में कटौती का सिलसिला बना लिया.

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छात्र राजनीति

नई बहाली की तो बात ही छोड़ दें. राज्य के द्वारा संरक्षण धीरे-धीरे हटा लिया गया और कॉलेज ख़ुद अपना इंतज़ाम करें, यह कहा जाने लगा. नतीजा यह हुआ कि नए किस्म के 'सेल्फ़ फ़िनांसिंग कोर्सेज़' शुरू हो गए और परिसरों की शक्ल ही बदल गई, उसके भीतर के रिश्ते कामकाजी से हो गए. छात्रों को भी राजनीति की फ़ुर्सत न रही.

शिक्षक का अपना वजूद ही अनिश्चित हो गया. नीतीश कुमार ने भी परिसरों से बेरुखी जारी रखी. बिहार को सिर्फ़ नमूने के तौर पर देखें. बाकी राज्य उतने ही बुरे हैं. अभी गुजरात में राहुल गाँधी के सामने अपनी व्यथा सुनाते हुए रो पड़नेवाली वाली अध्यापिका की तस्वीर हर जगह दिखलाई पड़ी है.

राज्य समर्थित परिसरों के दम तोड़ने के साथ-साथ दूसरे दर्जे के, लेकिन नए चमकीले वायदों के साथ निजी विश्वविद्यालयों का प्रवेश हुआ. राज्य सरकारों ने उनके निर्माण के लिए ख़ास क़ानून बनाए. यह स्पष्ट सिग्नल था कि राज्य इस क्षेत्र से अपना हाथ खींच रहे हैं. परिसर धीरे-धीरे ख़ामोश होते चले गए.

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आईआईटी और आईआईएम

आप उन ख़बरों को हलचल का प्रमाण न मानें जो विभिन्न राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों की गतिविधियों की होती हैं. यह सब कुछ उस वक्त में हुआ जब परिसरों में समाज के उन तबकों के किशोर प्रवेश कर रहे थे जो आज तक इनकी चौखट भी न देख सके थे.

इनके प्रवेश के साथ समाज के अभिजन का इन परिसरों से निष्क्रमण नोटिस नहीं किया गया. राज्य के परिसरों के बंजर होने के कारण ध्यान सिर्फ़ कुछेक केंद्रीय विश्वविद्यालयों पर या आईआईटी और आईआईएम आदि पर ही आकर टिक गया.

पिछले तीन वर्षों में जो भी ख़बर आ रही है, वह इन्हीं के परिसरों की है, लेकिन यह किसी छात्र आंदोलन की नहीं है. आज के शासक दल द्वारा भारत के इन बचे रह गए 'इलीट' संस्थानों पर कब्ज़े की हड़बड़ी के चलते उसके साथी छात्र दल द्वारा की जा रही हिंसा को परिसर की अशांति के रूप में प्रचारित किया गया है.

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केंद्र सरकार की भूमिका

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के लिए जैसी सभा एक मामूली बात थी उस सभा के लिए दी गई जगह को वापस करवाके और फिर उसपर हमला करके एक हिंसक स्थिति पैदा की गई. यही नहीं, उस सभा पर किए जानेवाले हमले को रिकॉर्ड करने के लिए एक टीवी चैनल को बुलाया भी गया.

ध्यान रहे, सभा के आयोजकों ने मीडिया को नहीं बुलाया था. जो मसला निहायत ही स्थानीय था, उसे राष्ट्रीय बनाने में किसकी रुचि थी? उसी तरह हैदराबाद विश्वविद्यालय में एक निहायत ही स्थानीय झड़प में केंद्र सरकार के मंत्रियों के अनावश्यक हस्तक्षेप ने उसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया.

एक 'अयोग्य' अध्यक्ष की नियुक्ति से क्षुब्ध एफ़टीआईआई के छात्रों पर भी हमला किया गया और पुणे विश्वविद्यालय के छात्रों पर भी आक्रमण हुआ. छात्रों द्वारा फिल्म प्रदर्शन या नाटक खेला जाना या सेमिनार, जो मामूली और रोजमर्रा की बात हुआ करती थी, क्योंकर राष्ट्रीय ख़बर में बदल गए?

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'रेड टेरर'

इस वर्ष के मध्य में अचानक शासक दल से जुड़े संगठन दिल्ली यूनिवर्सिटी को 'रेड टेरर' से मुक्त करने का अभियान चलाने लगे. जिस परिसर में छात्र संघ में कभी वाम छात्र संगठन घुस ही नहीं पाए, उसे लाल दहशत से आज़ाद करने की बेचैनी का क्या मतलब था?

इस तरह अगर हम गौर करें तो यह दिखलाई पड़ेगा कि पिछले तीन वर्षों में एक पैटर्न उभरता हुआ दिखलाई पड़ता है. राज्यों में उच्च शिक्षा के परिसरों के धीमे खात्मे के बाद बचे रह गए कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सुनियोजित तरीके से हिंसा का वातावरण पैदा किया गया है.

इससे छात्रों के अभिभावकों में और समाज में इन्हें लेकर एक शक पैदा हो गया है. पहली बार पूरे देश में लोग ऐसी चर्चा करते सुने जा रहे हैं कि हमारे टैक्स का पैसा इन परिसरों पर बर्बाद किया जा रहा है एक और प्रक्रिया साथ-साथ चल रही है. अब शिक्षा के प्रति गंभीर संस्थानों के रूप में अशोका या जिंदल यूनिवर्सिटी की चर्चा होने लगी है.

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सार्वजनिक शिक्षा की हालत

धीरे-धीरे समाज का संपन्न तबका इनका रुख कर रहा है. अगर इसके साथ आप सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को देखें तो तस्वीर और साफ़ होती है.

प्रतिभाशाली नौजवानों के लिए अध्यापन का पेशा अपनाने का कोई प्रोत्साहन इसमें नहीं है, बल्कि पहले से मौजूद कुछ प्रावधान हटा लिए गए हैं, मसलन पीएचडी करके अध्यापन में प्रवेश करने पर मिलनेवाला इन्क्रीमेंट वापस ले लिया गया है.

यह तय किया जा रहा है कि अब इन विश्वविद्यालयों में वे ही आएँ जिन्हें कहीं और ठौर न मिला हो. नकली और प्रायोजित अशांति कहीं हमारे बचे खुचे सार्वजनिक शिक्षा के परिसरों से राजकीय समर्थन का ऑक्सीजन खींचने का बहाना तो नहीं?

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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