नज़रिया: आत्मप्रशंसा और आत्ममुग्धता के रोग से ग्रसित है मोदी सरकार

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(नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल पूरे होने पर बीबीसी हिन्दी सेवा ने भाजपा के उपाध्यक्ष प्रभात झा का नज़रिया छापा था. उस लेख के जवाब के तौर पर अब आप पढ़ें कांग्रेस पार्टी का नज़रिया.)


जब प्रजातंत्र में किसी सरकार को अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की बुराई और आत्मप्रशंसा का रोग लग जाए, तो मान लीजिए की उसके पास उपलब्धियों का अभाव है.

क्योंकि जनकल्याण के कार्य किसी प्रचार के मोहताज नहीं होते.

वे स्वतः ही अपना प्रचार करते हैं. आत्ममुग्ध मोदी सरकार भी आत्मप्रशंसा की गंभीर बीमारी से ग्रसित है और सत्ता के सारे संसाधन अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने के लिए झोंक दिए गए हैं.

बीते चार सालों की उपलब्धियों में मोदी सरकार के पास अगर कुछ है, तो वो हैं मोदी जी की खर्चीली रैलियाँ, गढ़े हुए और अभिनय से भरे भाषण और कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की परियोजनाओं, चाहे वो जम्मू-कश्मीर की 'चेनानी-नाशरी' देश की सबसे बड़ी सुरंग हो या असम का 'ढोला-सादिया', देश का सबसे लंबे पुल का उद्घाटन.

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देश की दशा-किसानों का हाल

प्रतिपक्ष होने के नाते कांग्रेस को देश की जनता ने यह दायित्व दिया है कि वो सरकार की समालोचना करे और मोदी सरकार को सही रास्ता दिखाए.

महात्मा गांधी कहते थे, "किसी सरकार के कामों की समीक्षा करनी हो तो उस सरकार में किसानों और गाँवों की दशा जान लीजिए. देश का हाल पता लग जायेगा."

मोदी जी ने किसानों से अपने घोषणापत्र में ये वादा किया था कि किसानों को समर्थन मूल्य लागत का 50% ऊपर दिया जाएगा.

मगर हालात ये हैं कि मोदी सरकार किसानों को उनका लागत मूल्य भी नहीं दे रही है. उदाहरण के लिए मूँग का लागत मूल्य 5,700 रुपए है और समर्थन मूल्य 5,575 रुपए.

इसी तरह ज्वार का लागत मूल्य 2,089 रुपए है और समर्थन मूल्य 1,700 रुपये. लगभग सभी फ़सलों का यही हाल है.

चाहे धान हो, गेहूँ हो, चना हो या मूँगफली. बमुश्किल लागत मूल्य किसानों को मिल रहा है.

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इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने साल 2016-17 में दाल के 221 लाख़ टन के अच्छे उत्पादन के बावज़ूद 44 रुपए किलो की 54 लाख़ टन दाल आयात कर ली और क़रीब 50 लाख़ टन सस्ता गेहूँ मुनाफ़ाखोरों को आयत करने दिया जिसकी वजह से किसानों की फ़सलों के दाम अचानक गिर गए.

इसका परिणाम ये हुआ है कि देश में हर 24 घंटे में 35 किसान आत्महत्या कर रहे हैं.

इतना ही नहीं, किसानों के नाम पर चलाई जा रही फ़सल बीमा योजना में खरीफ़ 2016 और रबी 2016-17 में प्राइवेट कंपनियों को 14,828 करोड़ रुपए का लाभ मोदी सरकार ने पहुँचाया है.

भाजपा सरकार में शहर

मोदी सरकार में देश के शहरों की दशा जानेंगे तो दंग रह जाएंगे.

देश के शहरों का जीडीपी में योगदान 55% से अधिक है. इसी के दृष्टिगत कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने शहरी विकास के लिए जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के माध्यम से एक लाख़ करोड़ का अधोसरंचना विकास शहरों का किया था ताकि बड़े और मंझोले शहर देश की प्रगति में अधिक योगदान दे सकें.

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मोदी सरकार ने कांग्रेस की योजना 'जेएन.एन.यू.आर.एम' का नाम बदलकर उसे 'अमृत और स्मार्ट सिटी' कर दिया.

हाल यह है कि अमृत योजना में 77,640 करोड़ का प्रावधान तो किया, मगर बीते 4 सालों में ख़र्च किये मात्र 263 करोड़.

यही हाल स्मार्ट सिटी का भी है. 100 शहरों के विकास के 642 प्रोजेक्ट्स में से मात्र 3% अर्थात 23 प्रोजेक्ट्स ही पूरे हुए हैं.

याद कीजिये, मोदी जी ने कांग्रेस सरकार की राजीव आवास योजना का नाम बदल कर उसे नाम दिया था 'हाउसिंग फ़ॉर ऑल' और देश के ज़रूरतमंदों को 2 करोड़ घर देने का वादा किया था.

आज चार वर्षों बाद हालात ये हैं कि सिर्फ़ 3 लाख 33 हज़ार घरों का निर्माण किया गया है अर्थात पूरी योजना का महज़ 3%.

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महिलाओं की स्थिति

अब देश की कर्णधार और आधी आबादी महिलाओं की व्यथा की बात करें तो मोदी सरकार में प्रतिदिन 106 महिलाएं दुष्कर्म का शिकार हो रही हैं.

फ़िर भी मोदी सरकार कठुआ से उन्नाव तक बलात्कारियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है.

'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' के नाम पर भी भद्दा मज़ाक बेटियों के साथ किया जा रहा है.

देश मे 6.5 करोड़ बेटियाँ 15 वर्ष तक आयु की हैं, मगर बजट में सिर्फ़ 5 पैसे प्रति बेटी का प्रावधान किया गया है.

रोज़गार का क्या हुआ?

मोदी जी ने अपने चुनावी वादे में मुखरता से दो करोड़ रोज़गार हर वर्ष देने का वादा देश के युवाओं से किया था, मगर सिर्फ़ 4.16 लाख़ रोज़गार प्रतिवर्ष युवाओं को उपलब्ध करा पा रहे हैं.

देश मे नौकरी देना तो दूर, विदेशों तक में भारतीयों की नौकरियों पर ख़तरा मंडरा रहा है.

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अमेरिका की नई H4, H1B और L1 वीज़ा पॉलिसी के चलते 7.5 लाख़ भारतीयों की अमेरिका में नौकरी ख़तरे में है.

देश की भावी पीढ़ी, देश का भविष्य होती है. देखिये, मोदी सरकार ने देश के भविष्य को किस तरह अँधेरे में धकेलने का काम किया है.

बीते चार सालों में 'एजुकेशन सेस' के नाम पर मोदी सरकार ने 1,60,786 करोड़ रुपये वसूले हैं, मगर ये पैसा किस तरह शिक्षा पर ख़र्च किया गया, इसका हिसाब नहीं है.

साथ ही यूजीसी का 67.5% बजट अलग कम कर दिया गया है.

बीते चार सालों में शिक्षा नीति का निर्धारण भी नहीं किया. और तो और शिक्षा के नाम पर सीबीएसई के पेपर लीक और एस एस सी नौकरी भर्ती परीक्षा में 40 से 80 लाख़ रुपये करोड़ युवाओं के भविष्य को बेच दिया गया.

मोदी की मुद्रा योजना

जिस मुद्रा योजना के आधार पर मोदी सरकार बड़ी-बड़ी बातें करती है, उसकी हकीक़त यह है कि उसमें से 91% लोन एवरेज 23,000 रुपये मात्र दिए गए हैं.

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इसमें क्या नया व्यापार स्थापित किया जा सकता है?

याद कीजिये कि काले धन पर कितना कोहराम मोदी जी ने मचाया था. कहा गया था कि हर भारतीय के खाते में 15-15 लाख़ आएँगे.

हम सत्ता में आये तो लोकपाल लाएंगे. हालात ये हैं कि काला धन आना तो दूर, सरकार की सरपरस्ती में देश का 61,036 करोड़ का बैंकों का सफ़ेद धन नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे काले चोर लूट कर भाग गए.

मोदी सरकार काला धन तो नहीं ला पाई, मगर काले चोरों को गोरा बनाने की 'फेयर एंड लवली' स्कीम ज़रूर लेकर आई.

आज देश में बैंकों का नॉन परफॉर्मिंग असेट 2.5 लाख़ करोड़ से बढ़कर चार सालों में 8.5 लाख़ करोड़ पहुँच गया है.

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भारत का निर्यात लगातार गिरता जा रहा है. कांग्रेस के समय यह 2013-14 में 19.5 लाख़ करोड़ था, जो आज घट कर 2017-18 में 10.37 लाख़ करोड़ हो गया है.

150 करोड़ से ऊपर के केंद्र सरकार के 7 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट्स स्टॉल्ड हैं.

देश से विश्वासघात

'मेक इन इंडिया' हो, 'स्टार्टअप इंडिया' हो या 'स्किल इंडिया', मोदी सरकार की सारी योजनाएं सिर्फ़ प्रचार में दिखती हैं. वे ज़मीन पर कहीं दिखाई नहीं देतीं.

मंत्रियों का भ्रष्ट आचरण हो या रॉफ़ेल में घोटाले का सवाल, पाकिस्तान लगातार सीमा पर से आक्रमण कर हमारे सैनिकों और नागरिकों को निशाना बनाए या चीन भारतीय सीमा में सैनिक साज़ो-सामान जुटाए, मोदी सरकार का सरोकार तो अपनी तमाम नाकामियों का जश्न मनाने से है.

इसीलिए देशवासी कह रहे हैं, "मोदी जी ने जनता के विश्वास को पहुँचाया आघात और देश से किया है विश्वासघात."

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