"इंडिया फर्स्ट" की जगह "हिंदी फर्स्ट" में उलझी सरकार

भाषा संबंधी राजनीतिक लड़ाई भारत में दशकों से होती आई है। यह सही है कि अंग्रेजी भाषा का वैश्विक पटल पर बहुत बड़ा योगदान रहा है। और आज इसकी दुनिया के साथ साथ भारत में भी एक विश्ष्ट जगह है। लेकिन यह तर्क भी गलत नहीं है कि यह भाषा भारत पर 200 वर्षों तक राज करने वाले अंग्रजों की हमारे लिए छोड़ी हुई विरासत की तरह है।
वहीं, हिंदी को हम स्वराज्य और खादी के साथ जोड़कर देखते हैं। या यूं कह लें कि महात्मा गांधी द्वारा प्रचारित-प्रसारित यह भाषा स्वदेशी होने का बोध कराता था। हिंदी, हिंदु और हिंदुस्तान उस वक्त एक महज नारा न होकर, स्वतंत्र भारत के जनता की सोच थी। यह अलग बात है कि जवाहर लाल नेहरू समेत कांग्रेस के कई नेता अंग्रेजी के उपयोग से पीछे नहीं रहते थे। क्योंकि शायद, बहु- सांस्कृतिक भारत को सिर्फ एक ही भाषा, "हिंदी" के साथ जोड़ना, कहीं से भी गले नहीं लगाया जा सकता था।
तमिलनाडु में हिदीं का विरोध दशकों से होता आया है। सी राजागोपालाचारी की अध्यक्षता में कांग्रेस सरकार ने मद्रास प्रेसीडेंसी की स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य विषय बनाने की कोशिश की थी। जिसके लिए उन्हें वहां के लोगों का जबरदस्त विरोध झेलना पड़ा था। वहीं, नेहरू की राजभाषा अधिनियम के विरोध में भी मद्रास में जमकर विद्रोह हुआ था। और तब से आज तक कांग्रेस तमिलनाडु में फिर से अपना वह स्थान नहीं बना पाई है।
तमिलनाडु में हिंदी भाषा के प्रति यह विरोध भले ही साफ तौर पर उजागर होता है। लेकिन देश में हिंदी बेल्ट की राज्यों को छोड़कर कई राज्यों में हिंदी भाषा का विरोध मुखर होता आया है। इनमें उत्तर-पूर्वी राज्य, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और गोवा शामिल हैं।
बहरहाल, मोदी सरकार को हिंदी भाषा की लड़ाई से निकलकर बढ़ती मंहगाई का मार झेल रही भारत की जनता के आम जरूरतों को पूरा करने में अपना दम खम दिखाना चाहिए। बाकि, देश को आगे ले जाने और सर्वोच्च बनाने के मुहिम में भाषा विरोधी इस लड़ाई को फिलहाल टालना ही सही है।












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