4 राज्यों में चुनाव के बाद इन 9 राजनीतिक धुरंधरों के लिए आगे कैसा है सियासी सीन?
पांच राज्यों में चुनाव कराए गए हैं। मिजोरम में वोटों की गिनती सोमवार को कराई गई है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के नतीजे रविवार 3, दिसंबर को ही आ चुके हैं।
हर बार के चुनाव की तरह इस बार भी नतीजों ने कुछ नेताओं की सियासी किस्मत चमकाने का काम किया है तो कुछ के राजनीतिक करियर पर हमेशा के लिए बट्टा लगाने का इंतजाम किया है।

हम ऐसे खास 9 दिग्गजों की बात कर रहे हैं, जिनके लिए यह चुनाव उनके करियर के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
के चंद्रशेखर राव
भारत राष्ट्र समिति के नेता के चंद्रशेखर राव कुछ समय पहले तक राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखने की योजना पर काम कर रहे थे। तेलंगाना राष्ट्र समिति से भारत राष्ट्र समिति बनाने के पीछे उनका यही मंसूबा था।
लेकिन, तेलंगाना में उन्हें जिस तरह से झटका लगा है, उससे 2024 के लोकसभा चुनावों को लेकर उनके इरादों पर ग्रहण लग गया है।
भूपेश बघेल
छत्तीसगढ़ के कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने पिछले पांच वर्षों में अपनी छवि एक तेज-तर्रार ओबीसी नेता की बनाई थी। कांग्रेस को लग रहा था कि उनकी वजह से पांच साल में पार्टी जमीन और खासकर किसानों से जुड़ गई है।
लेकिन, कांग्रेस और उसके समर्थकों के नजरिए से अप्रत्याशित चुनाव परिणाम ने बघेल को ऐसे मौके पर झटका दिया है, जब भ्रष्टाचार के आरोपों की तलवार उनकी गर्दन पर लटक रही है। आने वाले दिनों में उनकी सियासी किस्मत क्या करवट लेगी, इसके बारे में कहना मुश्किल है।
अशोक गहलोत
कांग्रेस की मौजूदा राजनीति में अशोक गहलोत एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो गांधी परिवार की नजदीकियों के बावजूद सचिन पायलट को किनारे कर चुके हैं।
उनके पास हाई कमान को सफाई देने के लिए यह दलील है कि 5 साल में सत्ता परिवर्तन तो 'राजस्थानी रिवाज' बन चुका है। लेकिन, 72 साल की उम्र में 5 साल बाद सत्ता परिवर्तन की उम्मीद लगाकर बैठना उनके राजनीतिक जीवन के लिए सबसे बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
कमलनाथ
कमलनाथ गांधी परिवार से अपनी नजदीकियां साबित करने के लिए खुद को इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे बताने के लिए भी जाने जाते हैं। इस बार पार्टी ने मध्य प्रदेश में उन्हें पूरा मौका दिया।
लेकिन, 77 वर्ष की अवस्था में उनके नेतृत्व में कांग्रेस को हार का जो 'तोहफा' मिला है, उसके बाद वह फिर सीएम बनने के लिए 5 साल का इंतजार करें तो यह काफी दिलचस्प होगा। वैसे फर्स्ट फैमिली के करीबी होने के चलते पार्टी में उनका प्रभाव आगे भी बने रहने की उम्मीद जरूर है।
दिग्विजय सिंह
दिग्विजय सिंह उम्र में कमलनाथ से एक साल छोटे हैं। यूं देखें तो 2003 में उन्हीं के कार्यकाल के दौरान एमपी में कांग्रेस जो सत्ता से बेदखल हुई तो पार्टी अपना पुराना रुतबा कभी हासिल नहीं कर सकी। 2018 में किसी तरह से चुनाव के बाद कुछ दलों के सहयोग से सरकार बनाया भी तो वह भी ज्यादा दिन चल नहीं सकी।
दिग्विजय सिंह बीजेपी और आरएसएस पर अपने बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं। इस चुनाव के बाद पार्टी एक बार फिर जरूर गौर करेगी कि उनकी टिप्पणियों से पार्टी को देश में कहां-कहां के चुनावों में लाभ मिलता है? वैसे लगता नहीं कि पार्टी में उनके रोल में आगे भी कोई बदलाव होने वाला है।
सचिन पायलट
सचिन पायलट कांग्रेस के उन युवा नेताओं में शामिल हैं, जिनमें अभी भी पार्टी का भविष्य बचा हुआ है। 2018 के चुनावों में राजस्थान में कांग्रेस की जीत के वे जितने बड़े किरदार थे, लेकिन 2023 में पार्टी की हार के सबसे बड़े गुनहगारों में नहीं हैं।
लेकिन, पायलट ने 2018 में अपने हाथ आया जो मौका गंवाया था, वैसा भविष्य में फिर कब आएगा यह उनके राजनीतिक करियर के लिए सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि, अब राजस्थान में उनका सियासी भविष्य 5 साल और पिछड़ चुका है।
वसुंधरा राजे
राजस्थान बीजेपी में वसुंधरा राजे सबसे दिग्गज नेताओं में शामिल हैं। राज्य की राजनीति की थोड़ी भी समझ रखने वाला समझता है कि बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व से उनकी ट्यूनिंग बहुत ज्यादा नहीं मिल पाती।
जानकार मानते हैं कि बीजेपी की जीत का अंतर कम रहता तो सीएम पद के लिए वह स्वाभाविक दावेदार हो सकती थीं। लेकिन, अब गेंद शीर्ष नेतृत्व के हाथों में जा चुका है।
शिवराज सिंह चौहान
मध्य प्रदेश के चुनाव से पहले बीजेपी को भी लग रहा था कि इतने वर्षों की एंटी-इंकंबेंसी का सामना करना पार्टी के लिए आसान नहीं है। मुख्यमंत्री होने के नाते शिवराज सिंह चौहान चुनाव प्रचार में प्रदेश से पार्टी के सबसे बड़े चेहरा तो रहे, लेकिन बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया था।
लेकिन, शानदार जीत ने शिवराज के बारे में सबको अपनी सोच बदलने को मजबूर कर दिया है। कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक के लिए तो उनकी सीएम वाली कुर्सी पक्की हो गई है।
रमन सिंह
रमन सिंह छत्तीसगढ़ में निर्विवाद रूप से भाजपा के सबसे बड़े चेहरे हैं। पार्टी ने उन्हें भी विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया था, लेकिन बीजेपी की बड़ी जीत के बाद वह फिर से चर्चा के केंद्र में हैं।
उनके साथ 15 वर्षों तक सीएम रहने वाला उनका अनुभव भी है। लेकिन, अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं और पार्टी को सारे समीकरण अभी से फिट करने हैं। ऐसे में हो सकता है कि रमन सिंह को इस बार कुर्सी से दूर रहना पड़ सकता है।












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