असमः सेना की 'फर्ज़ी मुठभेड़',में पांच की मौत, 29 साल की क़ानूनी लड़ाई, अब मुआवजे़ का आदेश, क्या है मामला?

ये मामला है Assam के तिनसुकिया ज़िले का. जहां के पांच युवकों को सेना की एक फर्ज़ी मुठभेड़ 29 साल पहले मार दिया गया था.

प्रदीप दत्त
Dilip Sharma/BBC
प्रदीप दत्त

"मैं 17 फ़रवरी 1994 की वो सुबह कभी नहीं भूल पाऊंगी. मेरे पति की हत्या को 29 साल बीत गए हैं लेकिन वो दृश्य आज भी आंखों के सामने घूमते है. उस रात वो नाम कीर्तन में भाग लेने के लिए बाद सुबह घर आकर सो गए थे."

"कुछ देर बाद क़रीब सुबह साढ़े सात बजे सेना के पांच जवान हमारे घर में घुस आए. उनमें से एक ने वर्दी नहीं पहनी हुई थी. वो पूछताछ करने की बात कहते हुए मेरे पति को अपने साथ ले गए. शाम को जब वे घर नहीं लौटे तो मैं थाने गई. हमें चार दिन बाद उनका प्रताड़ित किया हुआ शव मिला."

इतना कहते ही 57 साल की लिलेश्वरी मोरन रोने लगती है.

ये मामला है असम के तिनसुकिया ज़िले का. जहां के पांच युवकों को सेना की एक फर्ज़ी मुठभेड़ 29 साल पहले मार दिया गया था.

दरअसल तिनसुकिया में एक चाय बागान प्रबंधक की कथित हत्या के बाद सेना के जवानों ने 17 फ़रवरी से लेकर 19 फ़रवरी, 1994 के दरम्यान कुल 9 लोगों को उनके घरों से उठा लिया था.

लेकिन 23 फ़रवरी, 1994 को डिब्रू सैखोवा रिजर्व फॉरेस्ट से प्रबीन सोनोवाल, प्रदीप दत्ता, देबोजीत बिस्वास, अखिल सोनोवाल और भूपेन मोरान के शव बरामद किए गए थे.

ये सभी असम के प्रभावी छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े हुए थे. जबकि बाकी के चार लोगों को सेना ने छोड़ दिया था.

उस दौरान चाय बागान प्रबंधक की हत्या में चरमपंथी संगठन उल्फा (यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम) का नाम सामने आया था. इसलिए इस कथित फर्ज़ी मुठभेड़ की घटना के बाद सेना पर इन पांच लोगों का नाम प्रतिबंधित सगंठन उल्फा से जुड़े होने के रूप में ब्रांडिंग करने का आरोप भी लगा था.

'हत्या करने वालों को भी सज़ा मिलनी चाहिए'

जब सेना के लोग भूपेन मोरान को घर से उठाकर ले गए थे उस समय उनकी पत्नी लिलेश्वरी मोरान महज़ 26 साल की थी.

वो कहती है, "पति की हत्या के समय मेरे पांच बच्चे थे. बड़ा बेटा 13 साल का था और सबसे छोटी बेटी ढाई साल की थी. मैं इन 29 सालों में बहुत रोई हूँ. बहुत कष्ट उठाकर बच्चों को बड़ा किया है. पैसों की तंगी के कारण बच्चों को ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं पाई. घर बाढ़ में डूब जाता था. लेकिन किसी भी सरकार ने हमारी कोई मदद नहीं की. मैं चाहती हूँ जिन लोगों ने मेरे पति की हत्या की है उनको भी कड़ी सज़ा मिले. लेकिन अदालत ने अब सरकार को हमें मुआवज़ा देने के लिए कहा है."

"इस फै़सले से थोड़ा सुकून मिला है कि मेरे पति और वो चारों लोग निर्दोष थे. लेकिन हत्या करने वालों को भी सज़ा होनी चाहिए थी."

लिलेश्वरी मोरान
Dilip Sharma/BBC
लिलेश्वरी मोरान

इस घटना को लेकर 1994 में पीड़ित परिवार और छात्र नेता से राजनीति में आए जगदीश भुइयां ने गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (हेबियस कॉर्पस) दायर की थी जिसमें युवकों के बारे में जानकारी मांगी गई थी.

इसके बाद अदालत के आदेश पर केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने 1995 में इन हत्याओं की जांच शुरू की थी. सीबीआई ने कोर्ट में दाखिल की गई अपनी रिपोर्ट में सात सैन्य कर्मियों को हत्याओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराया था.

साल 2018 में इन हत्याओं के सिलसिले में कोर्ट मार्शल के दौरान एक मेजर जनरल सहित सात सैनिकों को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी.

हालांकि 2019 में उनकी अपील पर विचार करते हुए सेना की ओर से नियुक्त विशेष अधिकारी (सक्षम प्राधिकारी) ने कहा कि सैन्यकर्मी दोषी नहीं थे.

गुवाहाटी हाईकोर्ट आर्डर
Dilip Sharma/BBC
गुवाहाटी हाईकोर्ट आर्डर

'दोबारा जांच की बजाए मामले को बंद करना अनुकूल होगा'

इसके बाद पीड़ित परिवार एक बार फिर गुवाहाटी हाईकोर्ट गए.

इस बीच पिछले गुरुवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस अचिंत्य मल्ल बुजर बरुआ ने कहा कि लगभग 30 साल पुराने मामले में एक बार फिर से हत्याओं की प्रकृति का पता लगाने की कोशिश करने के लिए न्यायिक जांच शुरू करने के बजाय मुआवज़ा प्रदान करके मामले को बंद करना अनुकूल होगा.

अपने आदेश में जस्टिस बुजर बरुआ ने कहा, "हमारा विचार है कि एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश करने के बजाय कि क्या मौत क़ानून में स्वीकार्य के अलावा किसी अन्य तरीक़े से हुई थी, हम इस स्थिति को स्वीकार करते हैं कि उपरोक्त पांच लोगों की मौत एक सैन्य अभियान के दौरान हुई थी."

आदेश में जस्टिस बरुआ कहते हैं, "इसलिए न्याय के हित में हम सेना के अधिकारियों के माध्यम से भारत सरकार को आदेश देते हैं कि वे पांच मृतक व्यक्तियों के परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा दें. यह उचित समझा गया कि प्रत्येक मृत व्यक्ति के परिवारों को दो महीने की अवधि के भीतर 20 लाख रुपये की राशि का मुआवज़ा दिया जाए."

देबाशीष बिस्वास
Dilip Sharma/BBC
देबाशीष बिस्वास

'दोबारा केस लड़ने की हिम्मत नहीं बची'

अपने छोटे भाई की हत्या और 29 साल चले इस मामले पर बात करते हुए दीपक दत्ता कहते हैं, "जिस समय मेरे भाई प्रदीप को सेना उठाकर ले गई थी उस दौरान उनकी शादी को महज़ एक महीना हुआ था. वह 31 साल का था. सेना के लोग 18 फ़रवरी 1994 की देर रात हमारे घर पर आए थे. मैंने अपने भाई का पता लगाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी. लेकिन 22 फ़रवरी को पता चला कि एक एनकाउंटर में उसे मार दिया गया है."

"हमें शव सौंपने आए लोगों ने कहा था कि वह उल्फा का सदस्य था और मुठभेड़ में मारा गया. लेकिन उसके शव के चारों तरफ़ काले धब्बे थे. हाथ के नाखू़न उखाड़ दिए थे. एक आंख पूरी तरह अंदर घुस गई थी. घुटने तोड़ दिए गए थे. यह सारी बातें पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी थी. 29 साल हमने न्याय के लड़ाई लड़ी. मेरा भाई निर्दोष साबित हुआ. सेना के उन जवानों को सज़ा मिलनी चाहिए थी."

एक साल पहले बैंक की नौकरी से अवकाश प्राप्त होने वाले दीपक दत्ता कहते हैं कि 29 साल लड़ने के बाद यह नतीजा सामने आया है लिहाज़ा अब आगे इस मामले में फिर से लड़ने की हिम्मत नहीं बची है.

सेना की इस कार्रवाई में अपने भाई देबोजीत को खोने वाले देबाशीष बिस्वास 29 साल चली इस क़ानूनी लड़ाई को अपने जीवन का सबसे कष्टदायक पल बताते हैं.

वो कहते हैं, "किसी भी पीड़ित परिवार के लिए 29 साल का लंबा समय न्याय पाने में गुज़ार देने का मतलब एक तरह से उस परिवार का बर्बाद हो जाना है. मैंने अपने भाई को निर्दोष साबित करने के लिए अपना पूरा समय इस मामले में ही बीता दिया. हम गुवाहाटी हाईकोर्ट के इस फै़सले का सम्मान करते हैं और भारत सरकार से गुज़ारिश करते है कि वह कोर्ट द्वारा निर्धारित समय के भीतर सभी पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा दे."

इन पीड़ित परिवारों के हक में आए हाईकोर्ट के इस फै़सले पर असम जातीय परिषद के महासचिव जगदीश भुइयां ने कहा, "आख़िरकार 29 साल बाद न्याय मिला है. बहुत लंबे समय तक इन पांचों पीड़ित परिवारों ने वो सब कुछ झेला है जो उन्होंने नहीं किया था."

ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने इन पांच लोगों को अपना सांगठनिक शहीद घोषित किया था जिनके नाम पर शहीद स्मारक बना हुआ है.

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