Assam में Congress की जीत का ‘मुस्लिम फैक्टर’! 19 में 18 MLA मुसलमान, BJP की 'हैट्रिक' ने बिगाड़ा गणित
Assam Election Results 2026: असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की सियासी जमीन पर एक ऐसी लकीर खींच दी है, जिसने राजनीति के बड़े-बड़े पंडितों को हैरान कर दिया है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता की 'हैट्रिक' लगाई है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के खेमे से एक ऐसा आंकड़ा निकलकर आया है जिसने सबको चौंका दिया है।
असम में कांग्रेस ने कुल 19 सीटें जीती हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन 19 विधायकों में से 18 विधायक मुस्लिम समुदाय से हैं। यह डेटा न केवल कांग्रेस की बदलती राजनीतिक दिशा की ओर इशारा करता है, बल्कि असम के भविष्य के सियासी ध्रुवीकरण का भी संकेत दे रहा है।

▶️ कांग्रेस का 'मुस्लिम कार्ड' कितना सफल?
असम में कांग्रेस के प्रदर्शन का विश्लेषण करें तो यह साफ दिखता है कि पार्टी का पूरा आधार अब अल्पसंख्यक बहुल इलाकों पर ही टिक गया है। कांग्रेस ने इस चुनाव में कुल 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था, जिनमें से 18 ने जीत दर्ज की। यानी कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट 90% के करीब रहा है।
वहीं पार्टी ने 79 गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, लेकिन उनमें से केवल एक ही अपनी सीट बचाने में कामयाब रहा। यह आंकड़ा बताता है कि असम के सामान्य और हिंदू बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस की पकड़ लगभग खत्म हो गई है।
यही हाल कांग्रेस के सहयोगियों का भी रहा। रायजोर दल ने दो सीटों पर जीत हासिल की, जिनमें से एक विधायक मुस्लिम हैं। वहीं पार्टी के दूसरे विधायक अखिल गोगोई हैं, जो पहले भी माओवादी लिंक के आरोपों के चलते एनआईए (NIA) की जांच का सामना कर चुके हैं। कुल मिलाकर, असम विधानसभा में विपक्ष की आवाज अब कुछ खास पॉकेट्स तक ही सीमित रह गई है।
कांग्रेस के जीते 18 मुस्लिम नेता कौन?
- परबतझोरा(5): मोहम्मद अशरफुल इस्लाम शेख
- धुबरी(8): बेबी बेगम
- जलेश्वर(12): आफताब उद्दीन मोल्ला
- गोलपाड़ा पूर्व(14): अबुल कलाम रशीद आलम
- सृजनग्राम(17): मोहम्मद नुरुल इस्लाम
- चेंगा (23): अब्दुर रहीम अहमद
- पकाबेतबारी(25): जाकिर हुसैन सिकदर
- चमारिया (27): रेकिबुद्दीन अहमद
- लहरीघाट(53): डॉ. आसिफ मोहम्मद नजर
- रूपाहीहाट (56): नुरुल हुदा
- समागुरी (58): तनज़ील हुसैन
- सोनाई(119): अमीनुल हक लस्कर
- अल्गापुर-कतलीचेरा(122): जुबैर अनम मजूमदार
- करीमगंज उत्तर(123): जकारिया अहमद
- गौरीपुर(7): अब्दुस सोबहान अली सरकार
- बिरसिंग जरुआ (9): वाज़ेद अली चौधरी
- मनकाचर(11): मोहिबुर रोहमन (बप्पी)
- नोबोइचा (75): डॉ. जॉय प्रकाश दास
- करीमगंज दक्षिण(124): अमीनूर रशीद चौधरी
▶️भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग और जातियों का संगम
दूसरी ओर भाजपा ने अपनी रणनीति से विपक्ष के होश उड़ा दिए हैं। भाजपा ने अपनी सीटों की संख्या 60 (2021) से बढ़ाकर अब 82 कर ली है। पार्टी की इस 'महाविजय' के पीछे एक गहरी सोशल इंजीनियरिंग छिपी है। भाजपा के 82 विधायकों में से करीब 78 से 80 विधायक हिंदू हैं। पार्टी ने इस बार ऊपरी असम और बराक घाटी के उन क्षेत्रों में क्लीन स्वीप किया है, जिन्हें हिंदू गढ़ माना जाता है।
भाजपा के इन विधायकों में जातियों का बेहतरीन संतुलन दिखता है। अहोम, मोटोक, मोरन और चाय बागान (Tea Garden) समुदायों ने एकतरफा भाजपा का साथ दिया है। इसके अलावा ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय के विधायक भी बड़ी संख्या में जीते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों पर अपनी बादशाहत कायम रखी है। इस बार भाजपा के टिकट पर 2-3 मुस्लिम उम्मीदवारों का जीतना भी एक बड़े बदलाव का संकेत है।
▶️केरल, बंगाल और तमिलनाडु में अल्पसंख्यकों का रुझान
असम ही नहीं, अन्य राज्यों में भी कांग्रेस का प्रदर्शन मुस्लिम उम्मीदवारों के भरोसे ही दिखा। केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में 35 मुस्लिम विधायक चुनकर आए हैं, जिनमें से 30 अकेले कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) गठबंधन से हैं। इसमें कांग्रेस के 8 और उसकी सहयोगी मुस्लिम लीग (IUML) के सभी 22 विधायक शामिल हैं।
पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस का सूपड़ा साफ होने से बच गया, क्योंकि उसे दो सीटें मिलीं और दोनों ही मुस्लिम बहुल इलाकों से आईं। हैरानी की बात यह है कि बंगाल में कांग्रेस ने टीएमसी (47) से भी ज्यादा यानी 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। तमिलनाडु में भी कांग्रेस के दो मुस्लिम उम्मीदवारों में से एक ने जीत दर्ज की। डेटा स्पष्ट करता है कि असम और केरल जैसे राज्यों में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट 80% से ऊपर रहा है।
▶️ विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी: अभी बहुत कुछ करना बाकी
चुनाव आयोग के आंकड़ों ने एक बार फिर यह कड़वी सच्चाई सामने रखी है कि राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी कम है। 126 सीटों वाली असम विधानसभा में इस बार केवल 11 से 13 महिला विधायक ही अपनी जगह बना पाई हैं।
हालांकि भाजपा ने इस मामले में विपक्ष से बेहतर प्रदर्शन किया है। भाजपा की अजंता नेओग (गोलाघाट) और नीलिमा देवी (मंगलदोई) जैसी दिग्गज नेताओं ने अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा। भाजपा ने 7 महिलाओं को चुनावी समर में उतारा था, जिनमें से अधिकांश ने जीत दर्ज की। वहीं कांग्रेस की ओर से नंदिता गार्लोसा ने हाफलोंग से अपनी सीट सुरक्षित की है।
▶️ममता का गुस्सा और चुनाव आयोग पर आरोपों की बौछार
जहां असम में शांतिपूर्ण बदलाव हुआ, वहीं बंगाल में हार के बाद ममता बनर्जी ने आर-पार की लड़ाई छेड़ दी है। बंगाल के नतीजों ने ममता को इतना विचलित कर दिया है कि उन्होंने चुनाव आयोग को ही 'विलेन' करार दे दिया। ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव आयोग की मिलीभगत से 100 सीटें लूटी हैं।
▶️ ममता बनर्जी ने 5 गंभीर आरोप लगाए:
- चुनाव आयोग ने विलेन की तरह काम किया और 93 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए।
- वोटिंग के बाद EVM की बैटरी 80-90% चार्ज होना धांधली का संकेत है।
- काउंटिंग के दौरान टीएमसी के एजेंटों को पीटा गया और जबरन बाहर निकाला गया।
- प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया में दखल दिया।
- अधिकारियों के ताबड़तोड़ तबादले करके चुनावी निष्पक्षता को खत्म कर दिया गया।
ममता ने स्पष्ट कहा कि वे हार नहीं मानी हैं और इस्तीफा तो बिल्कुल नहीं देंगी। उन्होंने इस पूरे चुनाव को लोकतंत्र की हत्या बताया है और घोषणा की है कि वे इसकी जांच के लिए 10 लोगों की एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाएंगी।
2026 के ये चुनाव नतीजे बताते हैं कि भारत की राजनीति अब एक नए मोड़ पर है। असम में जहां भाजपा ने अपनी समावेशी हिंदू पहचान और विकास के दम पर हैट्रिक लगाई है, वहीं कांग्रेस का अस्तित्व मुस्लिम बहुल इलाकों तक सिमटता दिख रहा है। उधर बंगाल में भाजपा की एंट्री ने पुरानी व्यवस्था को हिला दिया है, जिससे पैदा हुई खिसियाहट अब संवैधानिक संस्थाओं पर आरोपों के रूप में बाहर आ रही है। आने वाले पांच साल असम और बंगाल दोनों के लिए राजनीतिक अग्निपरीक्षा जैसे होंगे।












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