असम : बगावत की आग बुझाने में भाजपा कामयाब तो कांग्रेस नाकाम क्यों?

दिसपुर। असम विधानसभा चुनाव के दो बड़े प्लेयर (भाजपा और कांग्रेस) बगावत से परेशान हैं। भाजपा ने जहां डैमेज कंट्रोल कर हालात पर एक हद तक काबू पा लिया वहीं कांग्रेस इसमें नाकाम रही है। भाजपा के बेटिकट हुए विधायक शिलादित्य देव (होजई सीट) ने पहले निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। लेकिन भाजपा के बड़े नेताओं ने उन्हें मना लिया। अब उन्होंने भाजपा के लिए प्रचार करने की बात कही है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री अर्देंदु डे को जब टिकट नहीं मिला तो उन्होंने पार्टी के बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप लगा दिये। अर्देंदु का आरोप है कि असम में कांग्रेस पैसे लेकर टिकट बांट रही है। इसके अलावा एक और बड़े नेता गौतम धनोवर ने कांग्रेस छोड़ दी है। कांग्रेस के बागी निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।

क्या कांग्रेस में पैसा लेकर टिकट दिया जा रहा ?
अर्देंदु डे असम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे हैं। वे पूर्व मंत्री भी रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कह दिया है। उन्होंने कहा है, मैं सात बार चुनाव लड़ चुका हूं। पहले कांग्रेस में जो मेहनत और समर्पण से काम करता था उसे खुद ब खुद टिकट मिल जाता था। लेकिन अब कांग्रेस में पैसा अर्जित करने के लिए टिकट दिया जाता है। कांग्रेस को अब जीत से नहीं बल्कि पैसों से मतलब है। पहले टिकट लेने या देने के लिए पैसों की कोई जरूरत नहीं थी। लेकिन अब मैं देख रहा हूं कि उसे ही टिकट दिया जा रहा है जो पैसा दे रहा है। जिस कैंडिडेट को टिकट दिया जा रहा है उसकी योग्यता और जीतने की क्षमता की भी जांच नहीं हो रही। ऐसी स्थिति में कांग्रेस में रहने का कोई मतलब नहीं था।

कांग्रेस में AIUDF को लेकर असंतोष
इसी तरह अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष और पूर्व सांसद सुष्मिता देव ने सहयोगी दलों के लिए पार्टी के हितों की अनदेखी का विरोध किया है। सुष्मिता कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे संतोष मोहन देव की पुत्री हैं। उन्होंने सिलचर सीट एआइयूडीएफ को दिये जाने पर नाराजगी जाहिर की थी। चर्चा तो ये थी कि सुष्मिता ने इस फैसले के विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। लेकिन कांग्रेस ने इस बात को बेबुनियाद बताया है। सुष्मिता देव पार्टी की टिकट वितरण नीति से नाखुश हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस की प्रभाव वाली सीटें एआइयूडीएफ को दे दी गयी हैं। पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावनाओं की अनदेखी कर टिकट दिया गया है। बंगाली बहुल सीटों पर भी उपयुक्त उम्मीदवारों का चयन नहीं किया गया है। कहा जाता है कि सुष्मिता देव ने नाराजगी में चयन समिति की बैठक बीच में छोड़ दी थी। दक्षिणी असम में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतर कर उम्मीदवारों के चयन के तरीके पर विरोध जताया है।

भाजपा का डैमेज कंट्रोल
होजई के भाजपा विधायक शिलादित्य देव ने टिकट कटने के बाद पार्टी से बगावत कर दी थी। लेकिन वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव दिलीप सैकिया समय रहते डैमेड कंट्रोल में जुट गये। उन्होंने आखिरकार शिलादित्य को भाजपा में रहने के लिए मना लिया। अब शिलादित्य ने कहा है, वे भाजपा से अलग हो कर कांग्रेस और एअइयूडीएफ को जीतने नहीं दे सकते। मेरी गलती से अगर बदरुद्दीन अजमल (AIUDF) का प्रभाव बढ़ेगा, तो ये मुझे कभी गवारा नहीं हो सकता। इसलिए मैंने भाजपा में रहने का फैसला किया है। मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। सिर्फ पार्टी के लिए प्रचार करूंगा। शिलादित्य देव आरएसएस के प्रचारक रहे हैं। संघ की नीतियों में उनकी गहरी आस्था रही है। अगर वे बागी हो जाते तो भाजपा की किरकिरी हो जाती। शिलादित्या जिस होजई से विधायक हैं वह एक हिंदू (बंगाली) बहुल इलाका है। यहां से भाजपा ने रामकृष्ण घोष को टिकट दिया है। भाजपा ने इस चुनाव में 11 विधायकों के टिकट काटे हैं। इसलिए पार्टी के क्राइसिस मैनेजर पहले से सचेत हैं कि इसकी वजह से पार्टी को कोई नुकसान न हो जाय।

भाजपा गठबंधन बनाम कांग्रेस गठबंधन
असम में भाजपा घुसपैठ और आंतकवाद को मुद्दा बना कर चुनाव लड़ रही है। भाजपा के नेता चुनावी सभाओं में कह रहे हैं कि जब भाजपा का शासन रहेगा तभी तक असम घुसपैठियों से मुक्त रहेगा। दूसरी तरफ एआइयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल का आरोप है कि भाजपा उनका चेहरा दिखा कर धार्मिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण कर रही है। भाजपा एआइयूडीएफ पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगा कर वोट मांग रही है। बदरुद्दीन ने कहा, 2016 में नरेन्द्र मोदी की लहर थी इसलिए भाजपा जीत गयी। लेकिन इस बार कांग्रेस और हमारा मजबूत गठबंधन भाजपा को जीतने नहीं देगा। हम सीएए का विरोध कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। बदरुद्दीन अजमल असम के धुबरी से सांसद हैं। असम के शक्तिशाली मुस्लिम नेता हैं। उनकी पार्टी एआइयूडीएफ ने 2011 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटें जीती थीं। 2016 में भाजपा का उभार हुआ तो अजमल की पार्टी की सीटों की संख्या घट कर 13 पर पहुंच गयी। लोअर असम की करीब 40 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक माने जाते हैं। इसलिए इस बार कांग्रेस, एआइयूडीएफ समेत आठ दलों के साथ मिल कर भाजपा का रास्ता रोकने के लिए मैदान में डटी है। लेकिन जब तक वह दल में उभरे असंतोष को नहीं दबाती तब तक उसकी मंजिल आसान नहीं होगी।












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