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क्या पहले चरण की बंपर वोटिंग से भाजपा को पश्चिम बंगाल और असम में फायदा मिला?

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नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल और असम के पहले चरण के चुनाव में बंपर वोटिंग से क्या भाजपा को फायदा मिलता दिख रहा है? गृहमंत्री अमित शाह का दावा है कि मतदाताओं के इस अतिरिक्त उत्साह से भाजपा को लाभ मिला है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में 30 में से 26 और असम में 47 में से 37 सीटें जीतने का दावा किया है। अगर किसी चुनाव में मतदान का प्रतिशत बढ़ता है तो क्या इसे राजनीतिक परिवर्तन का संकेत माना जाना चाहिए ? इस सवाल का जवाब हां भी है और ना भी है। मतलब ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। पश्चिम बंगाल में 2016 का विधानसभा चुनाव। पहले चरण के पूर्वार्द्ध में 18 सीटों पर चुनाव हुआ था जिसमें 84.22 फीसदी वोटिंग हुई थी। पहले चरण के उत्तरार्द्ध में 31 सीटों पर चुनाव हुआ जिसमें 83.73 फीसदी मतदान हुआ। वाममोर्चा ने उस समय मतदान प्रतिशत में बढोतरी के आधार पर यह उम्मीद लगायी थी कि इस बार ममता बनर्जी के शासन का अंत होने वाला है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तृणमूल को दोबारा सत्ता मिली। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में 2007 (45.96) की तुलना में 2012 में 59.40 फीसदी वोट पड़े और सत्ता परिवर्तन हो गया था। उत्तराखंड में भी 2012 में अधिक वोटिंग हुई तो सत्ता बदली थी।

पश्चिम बंगाल में 30 में 26 सीट जीतने का दावा

पश्चिम बंगाल में 30 में 26 सीट जीतने का दावा

पश्चिम बंगाल राजनीतिक रूप से भारत का एक प्रबुद्ध राज्य है। यहां के लोग शुरू से मतदान के प्रति जागरुक रहे हैं। 2016 में छह चरणों में चुनाव हुआ था। हर बार 80 फीसदी से अधिक वोट पड़े। आखिरी और छठे चरण में तो 86.76 फीसदी मतदान हुआ था। इसके बाबजूद ममता बनर्जी चुनाव जीतने में कामयाब रहीं थीं। 2021 के पहले चरण में 84.63 फीसदी वोट पड़े हैं। यानी वोटर टर्न आउट का आंकड़ा पिछले चुनाव के समान ही है। ऐसे में अमित शाह का यह कहना कि भाजपा 30 में से 26 सीटें जीतेगी, अतिशयोक्तिपूर्ण लग रहा है। ममता बनर्जी ने अमित शाह के इस पूर्वानुमान की खिल्ली उड़ायी है। उन्होंने कहा कि जब बोलना ही था तो 30 बोल देते, बोलने में क्यों कमी कर दी ? तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि अमित शाह ने माइंड गेम खेलने के लिए ये बयान दिया है। लेकिन यह भी सच है कि पिछले दो साल के दौरान इस इलाके में भाजपा की स्थिति मजबूत हुई है। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय इन 30 विधानसभा क्षेत्रो में से 16 पर भाजपा को बढ़त मिली थी। तृणमूल को 10 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली थी। ये तब की बात है जब शुभेंदु अधिकारी के पिता शिशिर अधिकारी तृणमूल कांग्रेस में थे। अब उनके भाजपा में चले जाने से इस इलाके में तृणमूल की स्थिति कमजोर हुई है। माना जा रहा है कि अधिकारी परिवार के भाजपा में आने से, झारखंड के नेताओं के चुनाव प्रचार और ममता बनर्जी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के कारण जंगल महल की इन 30 सीटों में से भाजपा आधे से अधिक पर फायदे की स्थिति में है।

    West Bengal Election 2021: Amit Shah का दावा, पहले चरण की 30 में से 26 सीटें जीतेंगे वनइंडिया हिंदी
     असम में 47 में 37 सीट जीतने का दावा

    असम में 47 में 37 सीट जीतने का दावा

    असम में अमित शाह ने 47 में 37 सीटें जीतने का दावा किया है। 2021 के पहले चरण के चुनाव में करीब 77 फीसदी वोटिंग हुई है। जिन 47 सीटों पर चुनाव हुआ उसमें 42 सीटें ऊपरी असम के 11 जिलों की हैं। यहां हिंदू असमिया और चाय बागान मजदूर निर्णायक वोटर हैं। हिंदू असमिया सीएए को लेकर सशंकित हैं। उन्होंने सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया था। चुनाव के पहले तक उनमें भाजपा के प्रति नाराजगी भी थी। इनकी नाराजगी को देख कर ही भाजपा ने सीएए को असम में चुनावी मुद्दा नहीं बनाया था। चाय बागान मजदूर अपनी रोजाना मजदूरी को बढ़ाने के लिए पिछले काफी समय़ से मांग कर रहे थे। सोनोवाल सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम दौर में मजदूरी बढ़ायी भी तो चाय कंपनिया इसके खिलाफ अदालत में चली गयीं। फिलहाल कोर्ट में मजदूरी बढ़ाने पर रोक लगा दी है। इसके चलते मजदूर भाजपा सरकार से नाखुश हो गये थे। लेकिन असम में बांग्लादेशी घुसपैठ एक ऐसी समस्या है जो अन्य मुद्दों पर भारी पड़ जाती है। इसलिए भाजपा ने आदिवासी कल्याण और घुसपैठ को मुद्दा बना कर चुनाव लड़ा है। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार पहले चरण में कुछ कम वोटिंग हुई है। फिर भाजपा 47 में से अधिकांश सीटें जीतने की बात कर रही है।

    असम में वोटिंग पैटर्न

    असम में वोटिंग पैटर्न

    2016 में यहां दो चरण में चुनाव हुए थे। पहले चरण में 82.20 फीसदी वोट पड़े थे। दूसरे चरण में 87.03 फीसदी वोटिंग ने तो असम में मतदान का एक नया रिकॉर्ड बनाया था। तब धुबरी लोकसभा क्षेत्र की 10 में से 8 विधानसभा क्षेत्रों में तो 90 फीसदी तक मतदान हुआ था। बदरुद्दीन अजमल धुबरी के सांसद हैं। तब कहा गया था कि मुस्लिम वोटरों के एग्रेसिव वोटिंग के कारण आंकड़ा 90 फीसदी तक पहुंच गया था। असम में बाढ़, गरीबी जैसे पुराने मुद्दे आज भी कायम हैं। लेकिन चुनाव के आखिरी लम्हों में मतों का ध्रुवीकरण ऐसा हो जाता है कि ये मुद्दे गौण हो जाते हैं। वोट को लेकर यहां कितनी उग्र सोच रहती है यह एक उदाहरण से समझा जा सकता है। 2016 में सोनितपुर जिले के सोनम अदाहति गांव में एनुद्दीन नामक एक व्यक्ति ने केवल इस आधार पर अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था क्यों उसने भाजपा उम्मीदवार प्रमोद बोराठाकुर को वोट दिया था। एनुद्दीन के तीन बच्चे थे और वह दस साल से अपना वैवाहिक जीवन ठीकठाक तरीके से गुजार रहा था। लेकिन जब उसकी पत्नी भाजपा को वोट दे दिया तो वह आगबबूला हो गया था। असम में करीब 34 फीसदी मुस्लिम वोटरों की एग्रेसिव वोटिंग, हिन्दू वोटरों को भाजपा की तरफ मोड़ देती है। तब सारे मुद्दे ओझल हो जाते हैं। बहरहाल भाजपा के दावे की असलियत अब 2 मई को ही सामने आएगी।

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    English summary
    Assam and west bengal elections 2021 bumper voting in first phase will help bjp
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