'विद्रोह' के बावजूद अशोक गहलोत के सामने क्यों 'सरेंडर' कर सकती है कांग्रेस ? जानिए
नई दिल्ली, 27 सितंबर: अशोक गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनने की संभावना को अभी भी खारिज नहीं किया जा सकता है। इससे पहले कई रिपोर्ट में दावे किए जा रहे थे कि राजस्थान में उनके समर्थक विधायकों ने गांधी परिवार के खिलाफ खुली बगावत का ऐलान करके गहलोत को अध्यक्ष पद की संभावित रेस से भी बाहर कर दिया है। लेकिन, अब पार्टी के बड़े सूत्र ही कह रहे हैं कि ऐसा नहीं है और गहलोत अध्यक्ष पद की रेस से बाहर नहीं हुए हैं। यह साधारण बात नहीं है। लेकिन, नाराजगी के बावजूद शायद कांग्रेस नेतृत्व के पास गहलोत के सामने सरेंडर करने के अलावा विकल्प बचा नहीं है।

अध्यक्ष पद की रेस में बने रह सकते हैं अशोक गहलोत- रिपोर्ट
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक चाहे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 90 से ज्यादा वफादार विधायकों ने भले ही कांग्रेस नेतृत्व के फरमान के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया हो, लेकिन उनके पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने की संभावना अभी भी खारिज नहीं की जा सकती। रिपोर्ट में कांग्रेस के बड़े सूत्र के हवाले से कहा गया है कि 71 साल के अशोक गहलोत 'अभी भी कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में हैं और उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता।' रिपोर्ट के मुताबिक अशोक गहलोत कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से जल्द मिलेंगे और उनके तीन या चार वफादार नेताओं को विद्रोह आयोजित करने में उनकी भूमिका के लिए 'चेतावनी' दी जाएगी।
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राजस्थान में कांग्रेस विधायकों ने क्यों किया विद्रोह ?
राजस्थान में कांग्रेस का मौजूदा संकट अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री पद पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं होने की वजह से पैदा हुआ, जिससे आलाकमान संस्कृति वाली पार्टी की लीडरशिप की क्षमता पर सवाल खड़े हुए हैं। रविवार को सीएम गहलोत के घर पर उनकी जगह राजस्थान में नए नेता की औपचारिक घोषणा होनी थी, लेकिन उससे पहले ही उनके समर्थक विधायकों ने बगावत करके पार्टी की मिट्टी पलीद कर दी। कांग्रेस विधायक दल की औपचारिक बैठक में कांग्रेस के 107 में से करीब 25 विधायक ही पहुंचे थे। ज्यादातर विधायक गहलोत के नजदीकी और प्रदेश में मंत्री शांति धारीवाल की बुलाई बैठक में चले गए थे। वे एक बस में सवार होकर स्पीकर के घर भी पहुंच गए और कह दिया कि यदि गहलोत की जगह उनके विरोधी सचिन पायलट को कुर्सी दी गई तो इस्तीफा सौंप देंगे।

विद्रोह को लेकर पार्टी में क्या है राय ?
हालांकि, गहलोत इस बगावत में अपना हाथ होने से साफ इनकार कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली के पार्टी सर्किल में कोई विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है कि बिना उनके इशारे के 92 विधायक सामूहिक इस्तीफे की धमकी दे सकते हैं। उनका सीधा सा शर्त था कि नए मुख्यमंत्री का नाम कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव परिणाम आने के बाद यानी 19 अक्टूबर के बाद हो। यानी अगर तब उस पद के लिए अशोक गहलोत चुन लिए जाते हैं तो उन्हें राजस्थान में अपने पसंद का उत्तराधिकारी तय करने का मौका मिल सकता है। इससे पहले गहलोत अध्यक्ष चुने जाने के बाद भी सीएम की कुर्सी नहीं छोड़ना चाहते थे, लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा करने से मना कर दिया था।

गहलोत के सामने क्यों 'सरेंडर' कर सकती है कांग्रेस ?
ऐसे में अगर अब गहलोत को अध्यक्ष पद दिए जाने की संभावना खारिज नहीं किए जाने की बातें सामने आ रही हैं, तो उसके पीछे कहीं ना कहीं पार्टी नेतृत्व की उनके सामने लाचारी है। क्योंकि, गहलोत खेमे के विधायकों ने दिखा दिया है कि संख्या बल उन्हीं के साथ है। उनके समर्थन में पार्टी के दो-तिहाई से भी ज्यादा विधायक हैं। ऐसे में अगर गहलोत के खिलाफ सख्ती दिखाई गई तो विधानसभा चुनाव से एक साल पहले प्रदेश की सरकार भी संकट में पड़ सकती है। इसलिए, लगता है कि आलाकमान उन्हें अध्यक्ष का चुनाव लड़ने के लिए भी कह सकता है और सीएम की कुर्सी पर भी उन्हीं के पसंद के किसी व्यक्ति को बिठाने पर सहमति दे सकता है।

पायलट के लिए अब दिल्ली 'दूर' है!
वैसे सचिन पायलट भी दिल्ली पहुंचे हैं, लेकिन उनके लिए अब दिल्ली बहुत 'दूर' हो गई लगती है। यह भी जानकारी नहीं है कि वह आलाकमान से मिलेंगे भी या नहीं। क्योंकि, ना तो वे 2020 में विधायकों का संख्या बल जुटा पाए थे और ना ही अभी उनके पास आंकड़े दिखाई पड़ रहे हैं। कांग्रेस के सामने राजस्थान संकट ऐसे समय में आया है, जब राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी 'भारत जोड़ो यात्रा' कर रही है और दो दशकों से भी ज्यादा समय बाद अध्यक्ष पद का चुनाव घोषित किया गया है, जिसमें फिलहाल किसी गांधी के नजर आने की संभावना नहीं है।












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