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Magnum Opus: अलविदा सुरों की जादूगरनी! जब आशा की आवाज़ ने खामोशी को भी संगीत बना दिया

आज सुरों की दुनिया का वो सूरज ढल गया, जिसने अपनी सुरमई रौशनी से न जाने कितनी पीढ़ियों का सांगितिक शृंगार किया था। आशा भोसले सिर्फ एक नाम नहीं, एक एहसास है। एक ऐसी धड़कन, जो रेडियो, टेप रिकॉर्डर और आज की प्लेलिस्ट तक, हर दौर में हमारे साथ धड़कती रही। जब उनकी आवाज़ गूंजती थी, तो वक्त ठहर जाता था। आज, जब वो खामोश हुई हैं, तो ऐसा लगता है जैसे संगीत के सातों सुर कुछ पल के लिए सहम गए हों। जैसे घर का कोई अपना कोना खाली हो गया हो।

लता दीदी और आशा ताई हिंदी सिनेमा के आसमान में दो ऐसे सितारे थे, जिनसे संगीत की मुकम्मल तस्वीर बनती थी। आशा ताई का संगीत का सफ़र लता दीदी के अज़ीमो-तवील साये में ज़रूर रहा मगर वो बर-अक्स भी थी और बेमिसाल भी। आशा जी की अपनी ज़मीन थी, अपना आसमान-जहां वो नियम नहीं मानती थीं, बल्कि खुद नियम बनाती थीं।

Asha Bhosle Passes Away

वक्त के साथ सब कुछ बदल जाता है, लेकिन आशा जी की आवाज़ उन विरले चमत्कारों में थी जो समय को भी मात दे देती थी। 60 के दशक की चंचलता हो, 70 के दशक की मादकता या 90 के दशक की नफ़ासत, उन्होंने हर दौर को अपनी मनोहारी आवाज़ से नया अर्थ दिया। आज, उनकी उस जादुई विरासत के तीन ऐसे पहलुओं को याद करते हैं, जिन्होंने उन्हें "एक गायिका" से "एक युग" बना दिया।

मदहोशी, मर्यादा और वो रूहानी कशिश

आशा जी की आवाज़ में एक अनोखी "लचक" थी-एक ऐसा नशा, जो बिना शराब के मदहोश कर दे, लेकिन जिसमें कभी भी सस्तापन नहीं था। उनकी आवाज़ में सेंसुअसिटी थी, पर साथ ही एक क्लास, एक तहज़ीब भी।

जब "दिल चीज़ क्या है...", "इन आँखों की मस्ती..." या "हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी..." जैसे गीत बजते हैं, तो पर्दे पर दिखती अदाकारा से ज़्यादा असर उनकी आवाज़ छोड़ती है। तवायफ़ के किरदारों को उन्होंने सिर्फ गाया नहीं, उन्हें जिया। उनकी आवाज़ उस किरदार की रूह बन जाती थी - दर्द, नज़ाकत और अदाओं का ऐसा संगम, जो सीधे दिल में उतर जाता था।

"महबूबा-महबूबा...." से लेकर "पिया तू अब तो आजा..." , "ओ हसीना ज़ुल्फों वाली...." "ये मेरा दिल...." , "आ जाने जां..." तक ऐसे नगमों की एक लंबी फेहरिस्त है जब आशा जी की आवाज़ पर्दे पर कैबरे से ज़्यादा मादकता छोड़ जाती है। रुपहले पर्दे पर नर्तकी के लटके-झटके, अदाओं और एक्स्प्रेशन में जो आकर्षण हुआ करता था, उसमें चुंबकत्व आशा ताई के सुरों की सरगम से आता था। मौसिक़ी की मामूली समझ रखनेवाला भी उनकी आवाज़ को सुनता नहीं बल्कि महसूस करता है।

हर रंग में ढल जाने की बेमिसाल कला

अगर लता मंगेशकर की आवाज़ गंगा की तरह निर्मल थी, तो आशा मंगेशकर की आवाज़ समंदर की तरह अनंत थी-जिसमें हर लहर एक नया रंग लेकर आती थी। "पिया तू अब तो आजा" में वो शरारत थीं, "दम मारो दम" में वो बगावत थीं, "चुरा लिया है तुमने" में वो मोहब्बत की फुसफुसाहट थीं। "कजरा मोहब्बत वाला..." की नाटकीयता, "झुमका गिरा रे की..." कथात्मकता, या 'सुन-सुन-सुन दीदी तेरे लिए...." की चंचलता हो - आशा भोसले की हरफनमौला आवाज़ गाने को जीवंत बना देती है।

60 के दशक में शुरु हुआ सफर जब नब्बे के आखिर में "मुझको हुई न खबर..." गाती है तो एक बार फिर वही खनकता हुआ जादू क्रिएट हो जाता है। उन्होंने हर अंदाज़ को अपनी पहचान बना लिया। ओ.पी. नैयर की चंचल धुनों से लेकर आर.डी. बर्मन के वेस्टर्न एक्सपेरिमेंट तक-हर जगह उन्होंने खुद को ढाला, लेकिन कभी खोया नहीं। उन्होंने इंडी-पॉप गाया, नए संगीतकारों के साथ प्रयोग किए और अपनी आवाज़ को हमेशा ताज़ा बनाए रखा। गाँव की चौपाल से लेकर शहर के डिस्को तक, उनकी आवाज़ हर जगह फिट बैठती थी। सांगितिक विरासत की धनी आशा ताई शास्त्रीय गायन में पारंगत जरूर थीं, लेकिन वे मेथड-सिंगर नहीं थी। कोई स्टिरियोटायप उनके गायन की रेंज को बांधकर नहीं रख सका, वो हर युग की सुनहरी आवाज़ थीं, हर दौर में बेजोड़।


जब 'साँस' भी सुर बन गई

संगीत की दुनिया में कहा जाता है कि कुछ लोग गाते हैं, और कुछ लोग सुरों में सांस लेते हैं। आशा जी दूसरी श्रेणी में थीं। उनकी आवाज़ की वो 'ब्रेथी क्वालिटी'-जहाँ शब्दों के बीच की हल्की सी सांस भी एक एहसास बन जाती थी, उन्हें सबसे अलग बनाती थी। वो महज तकनीक से नहीं, दिल से गाती थीं। हर गीत में एक निजीपन होता था, हर धुन में एक तदात्मयता, हर आलाप में एक संवाद - गोया वो हर श्रोता से अलग-अलग बात कर रही हों। शायद यही कारण है कि उनकी आवाज़ कभी किताबी नहीं, हमेशा अपनी सी लगी।

Asha Bhosle - Magnum Opus

संघर्ष के सोपान से सफलता के शीर्ष तक

एक छोटी बच्ची, जिसने पिता के निधन के बाद घर चलाने के लिए गाना शुरू किया-वहीं बच्ची आगे चलकर भारतीय संगीत की सबसे बड़ी पहचान बन गई। तीन बच्चों की माँ होने के साथ-साथ रिकॉर्डिंग स्टूडियो में घंटों खड़े होकर जिस तरह उन्होंने अपनी कला को तराशा, वो आज के कलाकारों के लिए एक मिसाल है। लेकिन उनके सुरों में जितनी रंगिनिया‍ँ हैं, उनके जीवन में उतना ही एकाकीपन। असफल प्रेमसबंध, दो विवाह, संतान को खो देना... अपनी आवाज़ से लोगों के दिलों में मस्ती भर देने वाली आशा जी ने अपने जीवन में दुखों का समंदर भी देखा था।

एक युग का अंत: रिक्तता और अमर यादें

"हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर कोई पैदा।"

यह सच है कि कुदरत लता और आशा जैसे हुनरमंद इंसान सदियों में एक बार ही इस धरती पर भेजती है। उनकी जगह न कोई ले पाया है, न ही शायद कोई ले पाएगा। यह वो शून्य है जिसे कोई भी आधुनिक तकनीक या नया कलाकार नहीं भर सकता।

आज देश के हर छोटे कस्बे, हर गाँव और हर शहर की गलियों में एक अजीब सी उदासी है।आशा जी आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वो अपनी हज़ारों धड़कती हुई आवाज़ों के रूप में हमारे पास मौजूद रहेंगी। जब तक दुनिया में इश्क रहेगा, जब तक विरह रहेगा और जब तक पैर धुनों पर थिरकते रहेंगे, आशा भोंसले हमारे कानों में अपनी उसी 'सेंसुअस' और जादुई आवाज़ में गुनगुनाती रहेंगी। जाते-जाते बस इतना ही कह सकते हैं: "अभी न जाओ छोड़कर, कि दिल अभी भरा नहीं..."

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