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Arvind Trivedi: कैसे 'रामायण' के किरदार 'राम' से पहले 'रावण' और 'सीता' ने थाम लिया था BJP का कमल

मुंबई, 6 अक्टूबर: भाजपा की राजनीति भगवान श्रीराम के आसपास घूमती रही है और उसे इसका काफी सियासी फायदा भी मिला है। भाजपा की राजनीति को समझने वाले कुछ लोग चाहे वे उसके समर्थक हों या विरोधी उनका यह भी मानना रहा है कि रामानंद सागर की 'रामायण' ने इसकी राजनीति की धाक जमाने में बहुत ज्यादा मदद की है। तथ्यों को देखें तो 80 के दशक के आखिरी हिस्से में यह धारावाहिक दिखाई गई और उसके बाद के वर्षों में भाजपा का भी तेजी से उत्थान शुरू हो गया। लेकिन, दिलचस्प बात ये है कि टीवी के 'श्रीराम' पहले भाजपा के नहीं हुए थे। उसे पहले उस रामयाण के किरदार 'रावण' या अरविंद त्रिवेदी ने ही अपनाया था।

'राम' से पहले 'रावण' और 'सीता' हुए थे भाजपा में शामिल

'राम' से पहले 'रावण' और 'सीता' हुए थे भाजपा में शामिल

भारतीय टेलीविजन के इतिहास में धमाका मचाने वाली रामानंद सागर की प्रसिद्ध धारावाहिक रामायण में प्रभु श्रीराम की भूमिका निभाने वाले अभिनेता अरुण गोविल इसी साल मार्च में भाजपा में शामिल हुए हैं। रामायण और भगवान राम बीजेपी की राजनीति में रचे-बसे हैं। हालांकि, ये बात अलग है कि टीवी के 'श्री राम' अरुण गोविल ने राजनीति की शुरुआत बीजेपी की विरोधी यानी कांग्रेस के नजदीक रहकर शुरू की थी। लेकिन, टीवी के 'राक्षसराज रावण' और 'माता सीता' ने रामायण सीरियल में भूमिका निभान के चंद वर्षों बाद ही भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। टीवी के रामायण की सीता, दीपिका चिखलिया और रावण, अरविंद त्रिवेदी (लंकेश) की राजनीतिक विरासत पर विस्तार से चर्चा करें उससे पहले अरुण गोविल और कांग्रेस के रिश्ते पर गौर फरमाते हैं।

भाजपा से पहले कांग्रेस के हो चुके थे टीवी के 'श्रीराम'

भाजपा से पहले कांग्रेस के हो चुके थे टीवी के 'श्रीराम'

इस साल बंगाल चुनाव से पहले अरुण गोविल को बीजेपी में लाने का मकसद ही यही था की पार्टी वहां 'जय श्रीराम' के नारे के आधार पर ही चुनावी बैटिंग कर रही थी। हालांकि, इसका कितना लाभ मिला यह तो सब जान चुके हैं। लेकिन, कहते हैं कि भाजपा के होने से पहले टीवी के राम को कांग्रेस में लाने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी काफी कोशिशें की थीं। हालांकि, उस समय वे तैयार नहीं हुए। बाद में टाइम्स ऑफ इंडिया में एक रिपोर्ट छपी कि कांग्रेस उन्हें इंदौर से प्रत्याशी बनाना चाहती है। लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया। वहीं 1988 में इंडिया टुडे मैगजीन में छपी एक खबर के अनुसार वे कांग्रेस में शामिल तो हुए थे, लेकिन आम जनता में अपनी छवि को देखते हुए चुनावी राजनीति से दूर ही रहे।

'रावण' और 'सीता' दोनों ने जीता बीजेपी के टिकट पर चुनाव

'रावण' और 'सीता' दोनों ने जीता बीजेपी के टिकट पर चुनाव

जब अरुण गोविल कांग्रेस नेताओं के करीब जा रहे थे, तब दीपिका चिखलिया (सीता) और अरविंद त्रिवेदी (लंकेश) भारतीय जनता पार्टी के हो चुके थे। 1991 के लोकसभा चुनावों की ही बात है। बीजेपी ने दोनों को ही आरएसएस के लिए हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहे जाने वाले गुजरात से चुनावी मैदान में उतारा था। दीपिका चिखलिया 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव क्षेत्र रह चुके वडोदरा सीट से चुनाव (1991) लड़ी थीं। वहीं 'रावण' या दिवंगत बुजुर्ग अभिनेता अरविंद त्रिवेदी (लंकेश) ने साबरकांठा लोकसभा क्षेत्र से कमल निशान पर चुनाव लड़ा था। जनता पर इनके किरदारों का इतना असर था कि ये दोनों ही वह चुनाव जीतकर संसद पहुंचे गए।

मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय थे 'लंकेश'

मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय थे 'लंकेश'

1991 के लोकसभा चुनाव में बड़ौदा (वडोदरा) सीट से दीपिका को 49.98% वोट मिले थे और उनके खिलाफ कांग्रेस के प्रत्याशी रंजीत सिंह प्रताप सिंह गायगवाड़ सिर्फ 43.79% वोट ही जुटा पाए थे। यही स्थिति साबरकांटा सीट पर भी हुई थी। यहां भाजपा के अरविंद त्रिवेदी (लंकेश) ने अपनी लोकप्रियता के दम पर 48.28% वोट जुटा लिए थे और जनता दल (जी) के उम्मीदवार मागाभाई मणिभाई पटेल महज 37.86% वोट ही ले पाए थे। यहां राजमोहन गांधी ने भी जनता दल के टिकट पर किस्मत आजमाया था और 9.66% वोट पर ही सिमट गए थे। यह वो दौर था, जब भारतीय जनता पार्टी गुजरात में भी अभी जितनी ताकतवर नहीं हुई थी।

दीपिका चिखलिया ने शेयर की थी पुरानी तस्वीर

12 अप्रैल, 2020 को दीपिका चिखलिया टोपीवाला ने ट्विटर पर एक पुरानी तस्वीर शेयर की थी, जिसमें उन्होंने भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व और मौजूदा लीडरशिप दोनों की ओर से खुद को मिले आशीर्वाद को जाहिर करने की कोशिश की थी। उन्होंने तस्वीर के साथ लिखा था- 'एक पुरानी तस्वीर जब मैं बड़ौदा जो अब वडोदरा कहलाता है, चुनाव में खड़ी थी....सबसे दाहिने हमारे पीएम नरेंद्र मोदी जी, उनके बाद एलके आडवाणीजी और मैं और चुनाव इंचार्ज नलिन भट्ट......'

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