नज़रिया: कैराना की ना का अर्थ मोदी-योगी के लिए बहुत बड़ा है
उत्तर प्रदेश में कैराना संसदीय और नूरपुर विधानसभा क्षेत्र की मतगणना के रुझान साफ बता रहे हैं कि भाजपा के मुक़ाबले एकजुट विपक्ष निर्णायक बढ़त बना चुका है.
कैराना में भाजपा के सांसद रहे हुकुम सिंह के निधन से ख़ाली हुई सीट पर उनकी बेटी मृगांका सिंह राष्ट्रीय लोकदल की बेगम तबस्सुम हसन से काफ़ी पिछड़ती नजर आ रही हैं.
कैराना लोकसभा सीट पर बीजेपी की हालत पतली
तबस्सुम को समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी का भी परोक्ष समर्थन था. उनके पक्ष में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित उभार के रूप में सामने आई भीम आर्मी भी खुलकर मैदान में थी. जेल में बंद भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद रावण की हाथ की लिखी चिट्ठी बाँटी गई जिसमें एकजुट विपक्ष के उम्मीदवार को समर्थन देने की अपील की गई थी.
दूसरी तरफ, नूरपुर विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में कांग्रेस, बसपा और राष्ट्रीय लोकदल समर्थित समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार नईम-उल-हसन जीत के कगार पर पहुँच चुके हैं. उनके मुकाबले भाजपा की अवनि सिंह अपनी हार मानकर मतगणना स्थल से बाहर लौट चुकी हैं.
गोरखपुर और फूलपुर के संसदीय उप-चुनावों में हारने के बाद, अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना संसदीय और नूरपुर विधानसभा क्षेत्र के उप-चुनाव न सिर्फ बीजेपी और इसके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गए थे.
ये प्रतिष्ठा का प्रश्न विपक्ष के लिए भी था क्योंकि अगर सब मिलकर भी बीजेपी को न हरा पाए तो 2019 के लिए उनके सामने क्या उम्मीद बचेगी?
उत्तर प्रदेश में विपक्ष की एकजुटता को और अधिक व्यापक बनाने की गरज से चौधरी अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन को विपक्ष का साझा उम्मीदवार बनाया गया था. कांग्रेस ने भी शुरुआती टालमटोल के बाद उन्हें समर्थन दे दिया था.
इसी तरह से नूरपुर में सपा के उम्मीदवार नईमुल हसन को बाक़ी दलों ने समर्थन दिया था.
चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी के लिए ये उप-चुनाव राजनीतिक अस्तित्व का सवाल बन गया था, इसी के मद्देनज़र उन्होंने पूरी ताकत वहां झोंक दी थी.
सपा के लोगों ने भी इसमें उनकी भरपूर मदद करके चरण सिंह के ज़माने में कारगर रहे जाट-मुस्लिम-यादव समीकरण को एक बार फिर से कारगर बनाने की गरज से पूरी ताकत लगा दी थी.
बसपा लोकसभा हो या विधानभा के उप-चुनाव नहीं लड़ती. शुरुआत में कुछ संशय बनाने के बाद मतदान के दो दिन बाद मायावती ने अपने नेताओं-कोआर्डिनेटरों को राष्ट्रीय लोक दल और सपा के उम्मीदवारों के समर्थन का स्पष्ट संदेश दे दिया था. नतीजे बताते हैं कि विपक्ष की यह रणनीति कारगर रही.
लेकिन इस सबसे बड़ी तैयारी तो भाजपा की थी. गोरखपुर और फूलपुर में अपनी हार के लिए अति-आत्मविश्वास को ज़िम्मेदार बताकर ग़म गलत करने वाली भाजपा ने कैराना और नूरपुर को जीतने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी.
आदित्यनाथ कैबिनेट के आधे से अधिक मंत्री, सांसद, विधायक, भाजपा के केंद्रीय नेता वहां लगातार डेरा डाले रहे. यहां तक कि मतदान से एक दिन पहले आधे अधूरे एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के नाम पर रोड शो करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कैराना से सटे बागपत में बड़ी रैली को संबोधित किया था. मतदाताओं को लुभाने की हर संभव कोशिशें की गई थीं.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर का मामला ज़ोर-शोर से उठाकर भी हिंदू बनाम मुसलमान वाला माहौल नहीं बन सका. हिंदू एकता की कोशिश के तहत बीजेपी ने गूजर, लोध, राजपूत, सैनी और कश्यप जैसी जातियों के वोटरों को अपनी तरफ़ खींचा, लेकिन जाट-जाटव (दलित) भाजपा से दूर रहे, सपा के यादव वोटरों के टूटने का तो सवाल ही नहीं था.
मतदान के समय बहुत सारे इलाकों, खासतौर से विपक्ष के जनाधार वाले दलित-मुस्लिम बहुल इलाकों में ईवीएम मशीनों में बड़े पैमाने पर खराबी की शिकायतें मिलीं. विपक्ष का आरोप था कि खराब ईवीएम मशीनों के नाम पर 'बूथ जाम' की साज़िश की गई ताकि रोज़ेदार मुसलमान मतदाता वोट देने के लिए देर तक धूप में कतार में खड़ा रहने की जहमत उठाने के बजाय घर लौट जाएँ.
इसी तरह की शिकायतें दलित बहुल मतदान केंद्रों पर मिलीं. चुनाव आयोग ने 30 मई को कैराना में 73 मतदान केंद्रों पर दोबारा मतदान करवाया लेकिन ईवीएम मशीनों की खराबी के बावजूद विपक्ष की उम्मीदवार तबस्सुम हसन अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थीं. उन्होंने कहा भी कि इससे उनकी जीत के मतों का अंतर कुछ कम हो सकता है लेकिन जीत पक्की है.
नतीजों ने उन्हें सही साबित किया. गोरखपुर-फूलपुर के बाद अब कैराना और नूरपुर के उप-चुनावों में एकजुट विपक्ष की भारी जीत दिखाती है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 73 सीटें जीतने वाली पार्टी ये कमाल दोहरा नहीं पाएगी.
केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों, उनके जुमला साबित हो रहे चुनावी वादों का हिसाब मतदाता चुकता करने के मूड में दिखने लगा है. गन्ना किसानों की बेबसी, दलित उत्पीड़न और बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के शिकार लोग, एकजुट विपक्ष के पीछे गोलबंद होते दिख रहे हैं.
इन उप-चुनावों के नतीजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके विकल्प के रूप में भाजपा के दूसरे पोस्टर ब्वाय के रूप में उभर रहे या उभारे जा रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य के लिए खतरे के संकेत साबित हो सकते हैं.
सवा साल पहले भारी जीत के बाद सत्तारूढ़ हुए आदित्यनाथ के रहते उनकी अपनी संसदीय सीट गोरखपुर और उप-मुख्यमंत्री केशव मौर्य की फूलपुर सीट पर पराजय के बाद, कैराना और नूरपुर की सीटें भाजपा के हाथ से निकल जाने के बाद साफ़ हो गया है कि उनके राज में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
कैराना वही संसदीय क्षेत्र हैं जहां आदित्यनाथ और तत्कालीन सांसद हुकुम सिंह ने मिलकर 'हिंदुओं के पलायन' को राजनीतिक मुद्दा बनाया था हालांकि वहाँ विधानसभा चुनाव में बीजेपी लहर के बावजूद मृगांका सिंह बुरी तरह हार गई थीं.
लेकिन उससे सबक न लेकर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव हारने वाली मृगांका को लोकसभा उप-चुनाव में उतार दिया, शायद ये सोचा गया हो पिता के निधन की वजह से उन्हें कुछ वोट सहानुभूति के भी मिल जाएँगे.
इन उप-चुनावों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी अजित सिंह और उनके लोकदल के राजनीतिक अस्तित्व को ज़मीन दी है. यही नहीं राष्ट्रीय लोकदल और अखिलेश यादव की सपा के बीच बढ़ गई राजनीतिक दूरियों को पाटने में भी कैराना और नूरपुर के उप-चुनावों के नतीजे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.
इसके साथ ही अखिलेश यादव और उनकी 'बुआ' मायावती के बीच राजनीतिक रिश्तों की केमिस्ट्री भी और ज्यादा मजबूत होती दिखी है. सबसे बड़ा संकेत इन उप-चुनावों में जाट किसानों और मुसलमानों के बीच अतीत का भाईचारा जो पिछले कुछ चुनावों में टूटता दिख रहा था, कैराना और नूरपुर के उप-चुनावों में नए सिरे से पहले की तरह मजबूत होता दिखा है.
यह आने वाले दिनों में न सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए बल्कि इन इलाकों में सांप्रदायिक सद्भाव को फिर से मजबूत करने में कारगर साबित हो सकता है.
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